चौदह सितारे इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स) पार्ट- 8

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हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे तिब

अल्लामा इब्ने बाबूया अल नफ़मी किताब ख़साएल जिल्द 2 बाब 19 पृष्ठ 97 से 99 प्रकाशित ईरान में तहरीर फ़रमाते हैं कि हिन्दुस्तान का एक मशहूर तबीब ‘‘ मन्सूर दवांक़ी ’’ के दरबार में तलब किया गया। बादशाह ने हज़रत से उसकी मुलाक़ात कराई। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने इल्मे तशरीह अल अजसाम और अफ़आल उला आज़ा के मुताअल्लिक़ उससे उन्नीस सवालात किये। वह अगरचे अपने फ़न में पूरा कमाल रखता था लेकिन जवाब न दे सका। बिल आखि़र कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गया। अल्लामा इब्ने शहरे आशोब लिखते हैं कि इस तबीब से हज़रत ने 20 सवालात किये थे और अन्दाज़े से पुर अज़ मालूमात तक़रीर फ़रमाई कि वह बोल उठा ‘‘ मिन एना लका हाज़ा अल इल्म ’’ ऐ हज़रत यह बे पनाह इल्म आपने कहां से हासिल फ़रमाया ? आप ने कहा कि मैंने अपने बाप दादा से , उन्होंने हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) से उन्होंने जिब्राईल , उन्होंने ख़ुदा वन्दे आलम से इसे हासिल किया है। जिसने अजसाम व अरवाह को पैदा किया है। ‘‘ फ़क़ाला अल हिन्दी सदक़त ’’ उसने कहा बेशक आपने सच फ़रमाया। इसके बाद फिर उसने कलमा पढ़ कर इस्लाम क़ुबूल कर लिया और कहा , ‘‘ इन्नका आलम अहले ज़माना ’’ मैं गवाही देता हूँ कि आप अहदे हाज़िर के सब से बड़े आलिम हैं।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 1 पृष्ठ 45 प्रकाशित बम्बई)


हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) का इल्मुल क़ुरआन

मुख़्तसर यह है कि आपके इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर मुफ़स्सल रौशनी डालनी तो दुश्वार है जैसा कि मैंने पहले अर्ज़ किया है। अलबत्ता सिर्फ़ यह अर्ज़ कर देना चाहता हूँ कि इल्मुल क़ुरआन के बारे में दम ए साकेबा पृष्ठ 478 पर आपका क़ौल मौजूद है। वह फ़रमाते हैं कि , ख़ुदा की क़सम मैं क़ुरआने मजीद को अव्वल से आखि़र तक इसी तरह पर जानता हूँ गोया मेरे हाथ में ज़मीन व आसमान की ख़बरें हैं और वह ख़बरे भी हैं जो हो चुकी हैं और हो रही हैं और होने वाली हैं , और क्यों न हो जब कि क़ुरआने मजीद में हैं कि इस पर हर चीज़ अयां है। एक मक़ाम पर आपने फ़रमाया है कि हम अम्बिया और रसूलों के उलूम के वारिस हैं।(दमए साकेबा पृष्ठ 488 )


इल्मे नुजूम

इल्मे नुजूम के बारे में अगर आपके कमालात देखना हों तो कुतुबे तवाल का मुतालेआ करना चाहिये। आपने निहायत जलील उलेमा ए इल्म अल नुजूम से मुबाहेसा और मुनाज़ेरा कर के अंगुश्त बदन्दां कर दिया है। बेहारूल अनवार मनाक़िबे शहरे आशोब व दमए साकेबा वग़ैरा में आपके मनाज़िरे मौजूद हैं उलेमा का फ़ैसला है कि इल्मे नुजुम हक़ है लेकिन उसका सही इल्म आइम्मा ए अहले बैत के अलावा किसी को नसीब नहीं। यह दूसरी बात है कि हल्क़ा बगोशान मोअद्दते नूरे हिदायत से कसबे ज़िया कर लें।


इल्मे मन्तिक़ुत तैर

सादिके़ आले मोहम्मद (अ.स.) दीगर आइम्मा की तरह मन्तिक़ अल तैर से भी बा क़ायेदा वाक़िफ़ थे। जो परिन्दा या कोई जानवर आपस में बात चीत करता था उसे आप समझ लिया करते थे और ब वक़्ते ज़रूरत उसकी ज़बान में तकल्लुम फ़रमाया करते थे। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हों किताब तफ़सीरे लुबाब अल तावील जिल्द 5 पृष्ठ 113 व मआलम अल तन्ज़ील पृष्ठ 113, अजायबुल क़सस पृष्ठ 105, नूरूल अनवार पृष्ठ 311 प्रकाशित ईरान में है कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने क़बरह नामी परिन्दा जिसको चकोर या चनडोल कहते हैं कि बोलते हुए असहाब से फ़रमाया कि तुम जानते हो यह क्या कहता है ? असहाब ने सराहत की ख़्वाहिश की तो फ़रमाया यह कहता है ‘‘ अल्लाहुम्मा लाअन मबग़ज़ी मोहम्मद व आले मोहम्मद ’’ ख़ुदाया मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) से बुग़्ज़ करने वालों पर लानत कर। फ़ाख़्ता की आवाज़ पर आपने कहा कि इसे घर में न रहने दो यह कहती है कि ‘‘ फ़क़्द तुम फ़क़्द तुम ’’ ख़ुदा तुम्हें नेस्तो नाबूद करे , वग़ैरा वग़ैरा।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने खिलाफ़त के लिए तलवार क्युं नहीं उठाई ?

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने खिलाफ़त के लिए तलवार क्युं नहीं उठाई ?

मौला अली ع ने जब भी तलवार उठाई तो खिलाफ़त हासिल/पाने के लिए बल्कि मुनाफ़िकों से इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए उठाई!!!!!

हज़रत शाह अब्दुल हक़ मुहददिस देहलवी ने मदारिजुन्नबुवत में लिखा है कि:-

हुज़ूर ऐ अक़रम ﷺ ने फ़रमाया:- ऐ अली (ع), फ़ुलां यहूदी के चंद दिरहम मेरे ज़िम्मे हैं! जिसे उससे लश्कर ऐ असामा रज़ि’अल्लाह की तैयारी के लिए कर्ज़ लिए थे।
खबरदार! उसके हक़ को मेरी तरफ़ से तुम उतारना और फ़रमाया:- ऐ अली (ع), तुम उन आदमियों में पहले [शख्स] होंगे जो हौज़-ऐ-क़ौसर पर मुझसे मिलेंगे और मेरे बाद बहुत से नागवार बातें तुम्हें पेश/सामने आएंगी! [तो ऐसी सूरत में] तुम्हें लाज़िम है कि दिल तंग ना करना और सब्र करना। जब तुम देखो कि लोग दुनिया को पसंद करते हैं।
                                                            जिल्द 2, सफ़ाह 500
उर्दू में इस तरह से लिखा हुआ है:-
حضور  اکرم صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا- اے علی رضی اللہ عنہ، فلاں یہودی کے چند درہم میرے ذمہ ہے۔ جسے اس سے لشکر اسامہ رضی اللہ عنہ کی تیاری کیلئے قرض لیے تھے۔ خبردار اس کے حق کو میری طرف سے تم اتارنا اور فرمایا- اے علی رضی اللہ عنہ، تم ان اشخاص میں پہلے ہوگے جو حوض کوثر پر مجھ سے ملیں گے اور میرے بعد بہت سے ناگوار باتیں تمہیں پیش آئیں گی، تمہیں لازم ہے کہ دل تنگ نہ کرنا اور صبر کرنا۔ جب تم دیکھو کہ لوگ دنیا کو پسند کرتے ہیں۔
आप खुद भी देखें,सफ़ाह 500 पर छठी इबारत 👇
https://archive.org/details/35521645MadarijUnNabuwwatVol1Of2UrduTranslation/35521700-Madarij-un-Nabuwwat-Vol-2-of-2-Urdu-Translation/page/n497/mode/1up?view=theater

मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के विसाल के बाद उम्मत ने मौला अली ع से गद्दारी करी और मौला अली ع को बहुत से नागवार बातों वा मौकों का सामना करना पड़ा लेकिन आपने बहुत ही सब्र और हिक़मत से काम लिया।

🤔अक्सर लोगों का यह सवाल होता है कि मौला अली ع ने तलवार क्यों नहीं उठायी? जब आपका हक़ ग़स्ब किया गया तो?????

कंज़ुल उम्माल की रक़म नम्बर 31519,
जो कि कुछ इस तरह से है👇

“रसूल अल्लाह ﷺ ने मौला अली ع से कहा:- “जब लोग दुनिया को चाहने लगेंगे और मीरास को हड़प कर लेंगे और पैसों से इतनी मोहब्बत करने लगेंगे और अल्लाह یٰصَاحِبَیِ के दीन का इस्तेमाल आमदनी के लिए और ख़ुद के मतलब के लिए करने लगेंगे तो तुम क्या करोगे?????””

मौला अली ع ने जवाब दिया:

“मैं उनको उनके हाल पर छोड़ दूंगा और अल्लाह یٰصَاحِبَیِ और उसके रसूल की इताअत में रहूँगा! मैं दुनिया के मसलों में सब्र करूँगा जब तक आप से मिल न मिलूं”

फ़िर रसूल अल्लाह ﷺने कहा:- “बिल्कुल सही कहा और कहा: ऐ अल्लाह یٰصَاحِبَیِ अली को सब्र अता करना”

कंज़ुल उम्माल, जिल्द11, पेज नम्बर 143, रक़म नम्बर 31519

VIRTUES OF THE SAINTS

VIRTUES OF THE SAINTS

The virtues of the pious saints and friends of Allah have been clearly stated in The Holy Quran. Allah states:

‘They are amongst those, upon whom Allah has showered his blessings. They are Prophets, Martyrs and pious people. These are the best of companions. This is a blessing from Allah and Allah’s knowledge alone is sufficient’.

In another place it has been stated:

Listen for those who are the friends of Allah there is no fear nor should they be worried. Those people that have faith and are careful, there are glad tidings for them both in this life and the hereafter. There is no changing what Allah has decreed. In this is the greatest achievement’. (Surah Yunus)

Also addressing the Shaytaan Allah has said, ‘You have no control over my people’.

Allah also states, ‘Those that have undertaken afflictions in my path we will surely show them our path’.

With regards to the saints it has also been stated ‘Allah loves them and they love Allah’.

Also Allah says: Those people that have testified that Allah is our Lord, then they have remained steadfast upon this belief.

Angels descend upon them saying that they mustn’t be afraid nor must they worry. Listen to the glad tidings of that Paradise which has been promised to you. We are your friends in this world and the next. Everything will be provided for you. This is from the All Forgiving, Most Merciful Host’.

A great many more ayaat have been mentioned in the Quraan in relation to the lofty rank that the saints hold in the eyes of the Lord.

Countless Hadith have also been narrated on

realising the true rank of the saints: A hadith recorded by Sahih Bukhari states, it has been narrated by Abu Hurairah (RA) that the Blessed Prophet of Allah (SAW) said, “Allah says, those that hold enmity with my friends/saints, I inform them that they are picking a fight with me. When a person seeks nearness to me through his worship, there is no worship dearer to me than that I have made compulsory upon him. When my person remembers me constantly through non-obligatory non-obligatory prayers searching for my nearness, then I begin liking him.

When my love grows for him, I become his ears from which he hears, and his eyes with which he sees. I become his hand with which he grasps and his feet with which he walks. Whatever he asks
from me I give and from whatever he seeks refuge I give him refuge”.

In another tradition found in Sahihain, Abu Sae’ed Khudri (RA) has narrated that once a man came before Nabi (SAW) and asked, “Oh Prophet of Allah, who is the best from amongst the people?” The Prophet replied, “The best is he who gives his life and wealth in the path of Allah”. The man questioned, “Then who?” Nabi (SAW) stated further, “He who finds solitude in some cave only to worship his Lord”. In another tradition it is stated that the Prophet (SAW) said, “He who fears Allah and saves people from his own bad”

It has also been stated in Sahihain, Ibn Sa’d Saaidi says, “that a man passed by close to where Nabi (SAW) was. Nabi (SAW) asked the person seated beside him. “What can you tell about this man?” He said “He is from amongst the noble people and by Allah if he were to send a proposal for marriage it would be accepted immediately if he were to intermediate on anyone’s behalf his intermediating would be accepted such is his worthiness, at this Nabi (SAW) remained silent. Another man passed them where they were seated. Nabi (SAW) enquired enquired. “What do you see in this man?” He replied, “He is from amongst the
poor Muslims. If he were to send a proposal for marriage or mediate on anyone’s behalf neither would be accepted. People would take no notice of him. Nabi (SAW) then explained, “If the world was filled with men like he who passed by earlier, they would not be able to match the latter. He would be better than them all”.



Evidence supporting the Miracles

It is to be understood that the occurrence of miracles at the hands of the saints, by the command of Allah is not far fetched. The mind can accept it as nothing is outside the reach and commands of Allah. If He so wills anything is possible.

Evidence to support this fact is found in the Quran in numerous places.

In the incident with Maryam (A.S.) whenever Zakariya (A.S.) would enter her place of worship, he would find her surrounded by food. He questioned, “Oh Maryam, from where do you acquire all this?” She replied, “It is all from Allah. He sustains whom he wishes without any reckoning”.

On another occasion Allah had commanded Maryam (A.S) “Oh Maryam shake the branch of the tree, fresh dates will be showered upon you”.
Miracles of the Saints

Also mentioned in Surah Kahaf when Hadhrat Moosa (A..S) witnessed many a miracle at the hands of Hadhrat Khidhr (A.S.)

In the story of Hadhrat Sulayman (A.S) and Bilquees, when Aasif Ibn Barkhaya summoned the throne of Bilquees before Sulayman.

The above mentioned are some of the miracles performed by the saints of Allah, by the will of Allah and are stated clearly in the Quran.

This fact has also been endorsed in the Ahadith of the Blessed Prophet of Allah (SAW). There is the story of Hadhrat Juraij to be found in Sahih Bukhari and Sahih Muslim. Hadhrat Juraij was only a child when questioned to name his father. He astounded the people by saying, “My fathers name is such and such”.

It has been narrated that once a man piled his possessions on to the back of a cow. The cow turned to him and spoke “I have not been created to carry loads. I was created to work in the fields”. On hearing the cow the surrounding people cried ‘Subhanallah!’ This cow speaks. When this incident was related to Nabi (SAW) he verified the story that it was correct. This hadith has also been mentioned in Sahih Bukhari and Sahih Muslim.

मूसा जाबिर बिन हय्यान

आपका पूरा नाम अबू मूसा जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल समद अल सूफ़ी अल तरसूसी अल कूफ़ी है। आप 742 ई 0 में पैदा हुए और 803 ई 0 में इन्तेक़ाल फ़रमा गए। बाज़ मोहक़्क़ेक़ीन ने आपकी वफ़ात 813 ई 0 बताई है लेकिन इब्ने नदीम ने 777 ई 0 लिखा है।

इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक हिस्ट्र में है कि उस्तादे आज़म जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल्लाह , अब्दुल समद कूफ़ै में पैदा हुए। वह तूसी उल नस्ल थे और आज़ाद नामी क़बीले से ताअल्लुक़ रखते थे , ख़्यालात में सूफ़ी थे और यमन के रहने वाले थे। अवाएल उम्र में इल्मे तबीआत की तालीम अच्छी तरह हासिल कर ली और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इब्ने इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से इमाम उल फ़न हो गए।

तारीख़ के देखने से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की अज़मत का एतराफ़ करते हुए कहा है कि सारी कायनात में कोई ऐसा नहीं जो इमाम की तरह सारे उलूम पर बोल सके।

तारीख़े आइम्मा में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तसनीफ़ात का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमीया , जफ़र रमल पर लिखी थी। हज़रत के शार्गिद व मशहूर मारूफ़ कीमिया गर जाबिर बिन हय्यान जो यूरोप में जबर के नाम से मशहूर हैं , जिनको जाबिर सूफ़ी का लक़ब दिया गया था और जुनूनन मिस्री की तरह वह भी इल्मे बातिन से ज़ौक़ रखते थे। इन जाबिर बिन हय्यान ने हज़ारों वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा इब्ने ख़लकान किताब दफ़ियात इला अयान जिल्द 1 पृष्ठ 130 प्रकाशित मिस्र में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के मक़ालात इल्मे कीमिया और इल्मे जफ़र व फ़ाल में मौजूद हैं और आपके शार्गिद थे जाबिर बिन हय्यान सूफ़ी तरसूसी जिन्होंने हज़ार वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा ख़ैरूद्दीन ज़रकली ने भी अल आलाम जिल्द 1 पृष्ठ 182 प्रकाशित मिस्र में यही कुछ लिखा है। इसके बाद तहरीर किया है कि उनकी बेशुमार तसानीफ़ हैं जिनका ज़िक्र इब्ने नदीम ने अपनी फ़ेहरिस्त में किया है। अल्लामा मोहम्मद फ़रीद वजदी ने दायरा ए मआरेफ़ुल क़ुरआन अल राबे अशर की जिल्द 3 पृष्ठ 109 प्रकाशित मिस्र में भी लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रसायल को जमा कर के एक किताब हज़ार सफ़हे की तालीफ़ की थी। अल्लामा इब्ने ख़ल्दून ने भी मुक़दमा ए इब्ने ख़ल्दून मतबूआ मिस्र पृष्ठ 385 में इल्मे कीमिया का ज़िक्र करते हुए जाबिर बिन हय्यान का ज़िक्र किया है और फ़ाज़िल हंसवी ने अपनी ज़ख़ीम तसनीफ़ किताब और किताब ख़ाना ग़ैर मतबूआ में बा हवाला ए मुक़द्दमा इब्ने ख़ल्दून पृष्ठ 579 प्रकाशित मिस्र लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान इल्मे कीमिया के ईजाद करने वालों का इमाम है बल्कि इस इल्म के माहेरीन ने इसको जाबिर से इस हद तक मख़सूस कर दिया है कि इस इल्म का नाम ‘‘ इल्मे जाबिर ’’ रख दिया है।(अल जव्वाद शुमारा 11 जिल्द 1 पृष्ठ 9 )

मुवर्रिख़ इब्नुल क़त्फ़ी लिखते हैं कि जाबिर बिन हय्यान को इल्मे तबीआत और कीमिया में तक़द्दुम हासिल है। इन उलूम में उसने शोहरा ए आफ़ाक़ किताबें तालीफ़ की हैं। इनके अलावा उलूमे फ़लसफ़ा वग़ैरा में शरफ़े कमाल पर फ़ाएज़ थे और यह तमाम कमालात से भर पूर होना इल्मे बातिन की पैरवी का नतीजा था। मुलाहेज़ा हो ,(तबक़ातुल उमम , पृष्ठ 95 व अख़बारूल हुक्मा पृष्ठ 111 प्रकाशित मिस्र)


पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15 में है कि वही ख़ुश क़िस्मत मुसलमान है जिसे हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी का शरफ़ हासिल था। इसके मुताअल्लिक़ जनवरी 25 ई 0 में साईंस प्रोग्ररेस नवीशता ए जे 0 होलम यार्ड एम 0 ए 0 एफ़ 0 आई 0 सी 0 आफ़ीसरे आला शोबा ए र्साइंस कफ़टेन कालेज ब्ररिस्टल ने लिखा है कि इल्मे कीमिया के मुतअल्लिक़ ज़माना ए वस्ता की अकसर तसानीफ़ मिलती हैं। जिसमें ‘‘ गेबर ’’ का ज़िक्र आता है और आम तौर पर गेबर या जेबर दर अस्ल ‘‘ जाबिर ’’ हैं। चुनान्चे जहां कहीं भी लातीनी कुतुब में गेबर का ज़िक्र आता है वहां मुराद अरबी माहिरे कीमिया जाबिर बिन हय्यान ही है। जिसे जे के बजाय गे आसानी से समझ में आ जाता है , लातानी में (जे) से मिलती जुल्ती आवाज़ और बाज़ इलाक़ों मसलन मिस्र वग़ैरा में (जे) को अब भी बतौर (जी) यानी गाफ़ इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा ख़लीफ़ा हारून के ज़माने में साईंस कमेस्ट्री वग़ैरा का चरचा बहुत हो चुका है और इस इल्म के जानने वाले दुनिया के गोशे गोशे से खिंच कर दरबारे खि़लाफ़त से मुन्सलिक हो रहे थे। जाबिर इब्ने हय्यान का ज़माना भी कमो बेश इसी दौर में था। पिछले 20, 25, साल में इंगलिस्तान और जर्मनी में जाबिर के मुतअल्लिक़ बहुत सी तहक़ीक़ात हुई हैं। लातीनी ज़बाना में इल्मे कीमिया के मुताअल्लिक़ चंद कुतुब सैकड़ों साल से इस मुफ़क्किर के नाम से मन्सूब हैं। जिसमें मख़सूस 1. समा , 2. बरफ़ेकशन , 3. डी इन्वेस्टीगेशन परफ़ेक्शन , 4. डी इन्वेस्टीगेशन वर टेलेक्स , 5. टीटा बहन , लेकिन इन किताबों के मुताअल्लिक़ अब तक उक तूलानी बहस है और इस वक़्त तक मुफ़क़्के़रीने योरोप इन्हें अपने यहां की पैदावार बताते हैं। इस लिये उन्हें इसकी ज़रूरत महसूस होती है। जाबिर को हर्फ़ (जी) (गाफ़) गेबर से पुकारें और बजाय अरबी नस्ल के उसे यूरोपियन साबित करें। हांलाकि समा के कई प्रकाशित शुदा ऐडीशनों में गेबर को अरब ही कहा गया है। रसल के अंगे्रज़ी तरजुमे में उसे एक मशहूर अरबी शाहज़ादा और मन्तक़ी कहा गया है।


1541 ई 0 में की नूरन बर्ग कि एडिशन में वह सिर्फ़ अरब है। इसी तरह और बहुत से क़ल्मी नुसख़े ऐसे मिल जाते हैं जिनमें कहीं उसे ईरानियों के बादशाह से याद किया गया है किसी जगह उसे शाह बन्द कहा गया है। इन इख़्तेलाफ़ात से समझ में आता है कि जाबिर बर्रे आज़म एशिया से न था बल्कि इस्लामी अरब का एक चमकता सितारा था।

इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री के मुताबिक़ जाफ़र बर मक्की के ज़रिये से जाबिर बिन हय्यान का ख़लीफ़ा हारून रशीद के दरबार में आना जाना शुरू हो गया चुनान्चे उन्होंने ख़लीफ़ा के नाम से इल्मे कीमिया में एक किताब लिखी जिसका नाम ‘‘ शुगूफ़ा ’’ रखा। इस किताब में उसने इल्मे कीमिया के जली व ख़फ़ी पहलूओं के मुताअल्लिक़ निहायत मुख़्तसर तरीक़े , निहायत सुथरा तरीक़े अमल और अजीबो ग़रीब तजरबात बयान किये। जाबिर की वजह से ही कुस्तुनतुनया से दूसरी दफ़ा यूनानी कुतुब बड़ी तादात में लाई गई।

मन्तिक़ में अल्लामा ए दहर मशहूर हो गया और 90 साल से कुछ ज़्यादा उम्र में उसने तीन हज़ार किताबें लिखीं और इन किताबों में से वह बाज़ पर नाज़ करता था। अपनी किसी तसनीफ़ के बारे में उसने लिखा है कि रूए ज़मीन पर हमारी इस किताब के मिस्ल एक किताब भी नहीं है न आज तक ऐसी किताब लिखी गई है और न क़यामत तक लिखी जायेगी।(सरफ़राज़ 2 दिसम्बर 1952 ई 0 )

फ़ाज़िल हंसवी अपनी किताब ‘‘ किताब व किताब ख़ाना ’’ में लिखते हैं कि जाबिर के इन्तेक़ाल के दो बरस बाद इज़्ज़ उद दौला इब्ने मुइज़्ज़ उद दौला के अहद में कूफ़े के शारेह बाबुश शाम के क़रीब जाबिर की तजरूबे गाह का इन्केशाफ़ हो चुका है। जिसको खोदने के बाद बाज़ क़दीमी मख़तूतात ब्रिटिश मियूज़ियम में अब तक मौजूद हैं। जिनमें से किताब उल ख़वास क़ाबिले ज़िक्र है। इसी तरह फ़ुस्ते वस्ता में बाज़ किताबों का तरजुमा लातीनी में किया गया। इन किताबों के अलावा इन अनुवादों के सिबअईन भी हैं जो नाक़िसों ना तमाम है।

‘‘ इसी तरह अल बहस अनल कमाल ’’ का तरजुमा भी लातीनी में किया जा चुका है। यह किताब लातीनी ज़बान में कीमिया पर यूरोप की ज़बान में सब से पहली किताब है। इसी तरह और दूसरी किताबें भी अनुवादित हुई हैं। जाबिर ने कीमिया के अलावा तबीयात , हैय्यत इल्मे रोया , मन्तिक़ , तिब और दूसरे उलूम पर भी किताबें लिखीं। इसकी एक किताब समीयत पर भी है जो कुत्बे ख़ाना ए तैमूरिया क़ाहेरा मिस्र में मौजूद है। इनमें चन्द ऐसे मक़ालात को जो बहुत मुफ़ीद थे बाद करह हुरूफ़ ने रिसाला ए मक़ततफ़ जिल्द 58. 59 में शाया किये हैं। मुलाहेज़ा हो ,(मोअज्जमुल मतबूआत अल अरबिया अल मोअर्रेबा जिल्द 3 हरफ़ जीम पृष्ठ 665 )

जबिर ब हैसियत एक तबीबी के काम करता था लेकिन इसकी तिब्बी तसानीफ़ हम तक न पहुंच सकीं। हालां कि इस मक़ाले का लिखने वाला यानी डाक्टर माक्स मी यरहाफ़ ने जाबिर की किताब को जो समूूम पर है हाल ही में मालूम कर लिया।

जाबिर की एक किताब जिसको मय मतन अरबी और तरजुमा फ़्रानसीसी पोल कराओ मुशर्तरक ने 1935 ई 0 में शाया किया है ऐसी भी है जिसमें उसने तारीख़ इन्तेशार आराद अक़ाएद व अफ़कार हिन्दी यूनानी और इन तग़य्यूरात का ज़िक्र किया है जो मुसलमानों ने किए हैं। इस किताब का नाम ‘‘ एख़राज माफ़िल क़ूव्वत इल्ल फ़ेल ’’ है।(अल जवाद जिल्द 10 पृष्ठ 9 प्रकाशित बनारस)

प्रोफ़ेसर रसकार की रद मेरे बयान से यह यक़ीनन वाज़ेह हो गया कि मुवर्रेख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ है कि जाबिर बिन हय्यान इस्लाम का मोअजि़्ज़ कीमिया गर हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का शार्गिद था। लेकिन मिस्टर प्रोफ़ेसर रसकार ने इल्मे कीमिया के बारे में जो रिसाला शाया किया है उसमें जाबिर इब्ने हय्यान के उन दावों को ग़लत और जाली बताया है जो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी की तरफ़ मन्सूब है। इसकी दलील यह है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को इल्मे कीमिया और साईंस से क्या वास्ता और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की हैसियत का इमाम पारे , गन्धक , खटाई और फुकनी के इस्तेमाल में मसरूफ़ हो यह कैसे हो सकता है। मैं मौसूफ़ के जवाब में कहता हूँ कि मौसूफ़ ने कोई माक़ूल वजह इन्कार की बयान नहीं फ़रमाई। तारीख़ों को सुबूत पेश करना सुबूत के लिये काफ़ी है और उनके इन्कार से अदम शर्मिंन्दगी की दलील नहीं क़ायम की जा सकती। यह कब ज़ुरूरी है कि जाबिर बिन हय्यान जैसे ज़की व ज़ेहीन शार्गिद को बच्चों की तरह बैठ कर अमल कर के दिखाया हो। ज़ैहीन तालिबुल इल्मों को ज़बानी तालीम दी जाती है और अगर इसी तरह तालीम दी हो जिस तरह एतेराज़ करने वालों का ख़्याल है , तब भी कोई हर्ज नहीं है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जैसा उस्ताद उलूम को फ़ैलाने के लिये पारा और गन्धक , खटाई और फुकनी में कुछ देर मसरूफ़ रह सकता है और यह कोई एतेराज़ की बात नहीं हो सकती , मुम्किन है कि हज़रत ने जुमला उलूम के उसूल तालीम फ़रमा दिये हों और जाबिर ने उन्हें वसअत दे दी हो। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हो , किताब मनाक़िब में है कि हज़रत अली फ़रमाते हैं , अल मनी रसूल अल्लाह (स अ व व ) अलीफ़ बाब , आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे उलूम के एक हज़ार बाब तालीम फ़रमाये और मैंने हर बाब से हज़ार हज़ार बाब खुद पैदा किये। किताब मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 58 में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने इल्मे नहो के उसूल अबु असवद दवेली को तालीम फ़रमाये फिर उसने तमाम तफ़सीलात मुकम्मल किये , हो सकता है कि इसी उसूल पर जाबिर को तालीम दी गई हो।

जाबिर बिन हय्यान की वफ़ात इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान की उम्र 90 साल से कुछ ज़्यादा थी। मिस्टर जाफ़र बारहवी ने उनकी विलादत और वफ़ात के बारे में सरफ़राज़ 17 नवम्बर 1952 ई 0 में जो कुछ तहरीर किया है उसी को नक़ल करते हुए मिस्टर क़मर रज़ा ने पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15, 16, 26 जुलाई 1953 ई 0 में लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान 722 ई 0 में पैदा हुए और उन्होंने 803 ई 0 में इन्तेक़ाल किया और बाज़ का कहना है कि 813 ई 0 तक ज़िन्दा रहे। इसके बाद लिखते हैं कि इब्ने नदीम ने उनकी वफ़ात 777 ई 0 में बताई है और मेरे नज़दीक यही ठीक है। मेरी समझ में नहीं आता कि मौसूफ़ ने इब्ने नदीम के फ़ैसले को क्यों कर तसलीम कर लिया , इस लिये कि अगर विलादत का सन् सही है तो फिर इब्ने नदीम का बयान मानने लायक़ नहीं क्यों कि अगर वह 722 ई 0 में पैदा हुए थे और 777 ई 0 में वफ़ात पा गये तो गोया उनकी उम्र सिर्फ़ 55 साल की हुई जो इतने साहेबे कमाल के लिये क़रीने क़यास नहीं है। मेरे नज़दीक़ इन्साईकिलो पीडिया वाले की तहक़ीक़ सही है वह 90 साल से कुछ ज़्यादा उनकी उम्र बताता है जो हिसाब के एतेबार से सही है क्यों कि विलादत 722 ई 0 और वफ़ा 813 ई 0 में तसलीम करने के बाद उनकी उम्र 91 साल होती है और यह उम्र ऐसे बा कमाल के लिये होनी मुनासिब है।