हदीस नं.:-2 “अली को याद करना इबादत है”। सन्दर्भ:-📚📚 (कंज उल उमाल 11) (पेज 601)
हदीस नं.:-3 “अली का मुझसे वही रिश्ता है जो मूसा का हारून से था, सिवाय इसके कि मेरे बाद कोई नबी नहीं है।” सन्दर्भ :-📚📚 (सहीह बुखारी जिल्द 3 पेज 1142) (सहीह मुस्लिम जिल्द 31 पेज 5931)
हदीस:- 4 खैबर का दिन, “कल मैं अलम उसे दूंगा जो अल्लाह और उसके रसूल का महबूब तारीन है सन्दर्भ:-📚📚 (सहीह मुस्लिम जिल्द 31,पेज 5917)
हदीस:- 5 “मेरे बाद जिन चीजों में एकतिलाफ़ होगी, उनमें अली की अदालत सबसे अच्छी है।” 📚📚( कँजुल उमाल 13, पेज 120)
हदीस संख्या:- 6 “अली तुममें से सबसे अच्छा शासक है।” 📚📚(कंजुल उमाल 13, पेज 120)
हदीस नंबर:- 7 “मैं आदम की औलाद का सरदार हूं, (अली) अरबों का सरदार हूं।” सन्दर्भ :-📚📚 (मुस्तद्रक अल-हकम vol 3, पेज 123)
हदीस नंबर:- 8 “यौमे खनदक़ अली का वार सकलैन की इबादत से बेहतर है।” सन्दर्भ :-📚📚 (मुस्तद्रक अल-हकीम vol 3 पेज 34)
हदीस नंबर :- 9 “अली के घर को छोड़कर, मस्जिद ए नबवी के अंदर खुलने वाले सभी दरवाजे बंद कर दिए जाने चाहिए।” सन्दर्भ:- (मुस्तद्रक अल-हकीम vol 3, पेज 125)
हदीस संख्या:- 10 “अली मुझसे है और मैं अली से हूँ”। सन्दर्भ :-📚📚 (मुसनद अहमद इब्न हम्बल vol 5, पेज 606) (सहीह तिर्मिज़ी vol 13, पेज 168)
हदीस संख्या:- 11 लश्कर को रवाना करते वक्त रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया, “ऐ अल्लाह जब तक मैं अली को दोबारा न देख लूं, मुझे मौत न देना।” सन्दर्भ:-📚📚 (सहीह तिर्मिज़ी जिल्द 13 पेज 178)
हदीस संख्या:- 12 अली हक़ के साथ हैं और हक़ अली के साथ हैं. सन्दर्भ:-📚📚 (सहीह तिर्मिज़ी जिल्द 31,पेज 166)
हदीस संख्या:- 13 अहल अल-सुन्नत के मुफासिर इमाम जलाल अल-दीन सुयुती रहमत उल्लाह ने अपनी तफ़सीर में लिखा है जब कुरान की यह आयत नाजिल हुई – ऐ रसूल (ﷺ ) पहुंचा दीजिए जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम पर नाज़िल किया गया है… (सूरह माइदा 67) इस आयत के बाद, आखिरी हज से लौटने पर, खुम ग़दीर की जगह पर, पैगंबर ﷺ ने सहाबा राजी ० के मजमे में मौला अली का हाथ बुलंद कर के ऐलान किया कि :- “जिस जिस का मै मौला अली इस इस का मौला “
अल्लाह ﷻ जब किसी चीज की कसम खाता है या किसी चीज की बुलंदी बयान फरमाता है या किसी चीज को अपनी तरफ मानसून करता है तो यकीनन वो सै(चीज) बड़ी बा,अजमत व बुलंद ओ बाला होती है, इसी लिए अल्लाह ﷻ किसी काफिर की या किसी काफिर से जुड़ी चीज की कसम नहीं खाता क्यों की कुफ्र और उससे जुड़ी चीजें गलाजत है, मगर जिसकी तरफ या जिसको अच्छा खुद रब्ब ए करीम कहे उसकी अजमत का अंदाजा भी नहीं लगाया जासकता और वो चीज पाक होती है और उससे जुड़े लोग भी पाक होते है,,
सुरत नं: 93 : سورة الضحى – आयत नं: 6 पर अल्लाह ﷻ कुरआन ए करीम मै इरशाद फरमाता है: َلَمۡ یَجِدۡکَ یَتِیۡمًا فَاٰوٰی ۪﴿۶ तरजूमा (अय हबीबी) क्या उसने आपको यतीम नहीं पाया फिर उसने (आपको मोअजिज व मुकर्रम) ठिकाना दिया
हर तारीख व हदीस की किताबों मै मौजूद है के जब आका हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ की वालिदा बीबी आमिना رضي الله عنها और आपके दादाजान सैयेदुना अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه का विशाल हुआ तो आप ﷺ की उमर ए पाक बहोत छोटी थी यानी बचपनी की उमर ए मुबारक थी और तबसे लेकर जवानी मुबारक तक और सैयेदा बीबी खदीजतुल कुबरा رضي الله عنها से शादी होने तक अल्लाह ﷻ के हबीब ﷺ सैयेदुना अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै रहे! उस्सी घर मै खाते, अस्सी घर मै सोते, तो अल्लाह ﷻ जिस घर को कुरआन मै अपनी तरफ मनसूब करे के ” अय हबीब हमने आपको किया खूब ठिकाना दिया” क्या वो घर किसी काफिर का घर हो सकता है? अगर काफिर का घर है तो कहना पड़ेगा के अल्लाह ﷻ ने एक काफिर के घर को अपनी तरफ मनसूब किया, माजअल्लाह अश्तगफैरुल्लाह.,
फिर आगे कुरआन ए करीम सुरत नं: 4 : سورة النساء – आयत नं: 144 पर अल्लाह ﷻ इरशाद फरमाते है: یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا لَا تَتَّخِذُوا الۡکٰفِرِیۡنَ اَوۡلِیَآءَ مِنۡ دُوۡنِ الۡمُؤۡمِنِیۡنَؕ اَتُرِیۡدُوۡنَ اَنۡ تَجۡعَلُوۡا لِلّٰہِ عَلَیۡکُمۡ سُلۡطٰنًا مُّبِیۡنًا ﴿۱۴۴ ﴾ तरजूमा अय ईमान वालों! मुसलमानो के सिवा काफिरों को दोस्त ना बनाओ, क्या तुम चाहते हो के (ना फरमानों की दोस्ती के जरिए) अपने खिलाफ अल्लाह की सरीह हुजत कम कर लो
इस आयत ए करीमा से पता चलता है की मुसलमानो के लिए काफिरों की दोस्ती को नापसंद फरमाया है, तो जरा सोचिए और अपनी हक गोही से फैसला कीजए की अल्लाह ﷻ को केसे गवारा होगी अपने प्यारे महबूब जिसके लिए ये दोनो जहां को खल्क किया और इमाम उल अंबिया बना कर भेजा उस प्यारे मोहम्मद मुस्तफा ﷺ के लिए एक काफिर के घर को चुना, जिस अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै हुजूर ए अकरम मोहम्मद मुस्तफा ﷺ कमोबैस चोतीस34 शाल रहे, और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै खाना खाया, अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै इस्लाम की पहली दावत, दावत ए जुलअसिरा हुवी और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ का पहला निकाह पढ़ाया और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ के निकाह का हक मेहर अपनी जेब से अदा किया, और जो लोग अबू तालिब رضي الله عنه को काफिर कहते है माजअल्लाह वो हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ की शान ए पाक मै नफी व गुस्ताखी कर रहे है., _______________ इमाम इब्ने हजर अस्कलानी رضي الله عنه ने ‘अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा’ की आठवीं जिल्द में सफा नंबर 498 पर रकम नंबर 10175 के तहत सहाबा किराम की फेहरिस्त में हजरत अबू तालिब رضي الله عنه का नाम शामिल किया है और जो खिदमात रसूलल्लाह ﷺ के लिया हज़रात अबू तालिब رضي الله عنه ने की वो भी तहरीर फ़रमाई, और साथ ही साथ हज़रात अबू तालिब رضي الله عنه के अशार जो रसूलल्लाह ﷺ की शान ए पाक मै लिखे है वो भी तहरीर फरमाए:
और जब अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه का विशाल हुआ तो उन्होंने मोहम्मद ﷺ के मूतअलिक अबू तालिब رضي الله عنه को वसीयत की, पास उन्होंने आप ﷺ की कफालत की, और आप ﷺ की अच्छी तरबियत की आप ﷺ को अपने साथ शाम का सफर किया, उस वक्त आप ﷺ नौजवान थे, और जब आप ﷺ मबअउश(नबूवत का ऐलान) हुए तो वोह आप ﷺ की नुसरत व ताइद मै उठ खड़े हुवे, और आप ﷺ के दुस्मानो से आप ﷺ का दिफाअ किया, और आप ﷺ की बहोत ज्यादा तारीफे की, जिसमै से हजरत अबू तालिब رضي الله عنه का ये कोल भी है जब हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने अहले मक्का के लिए बारिश की दुआ की तो उन्हें बारिश से सेराब किया गया,
तो हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने कहा: وأبض يستسقى الفمام بوخهه ثمال اليتامى عصمة للأرامل यानी” वोह रोशन जबीं जिसके चेहरा कुरैश के वसिले से बारिश तलब की जाती है यतीमो का फरियाद रस और बेवाओं की ढाल है |
وشقّ له من اسمه ليخلّه فذو العرش محمود وهٰذا محمّد यानी” और उसने अपने नाम से उसका नाम मस्तक किया ताके आप ﷺ को अजमत अता करे,पास अर्श का मालिक महमूद है और ये मोहम्मद ﷺ है | अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा जिल्द: 8 सफाह नं: 498 रकम नं: 10175 ______________ हजरत अबू तालिब رضي الله عنه नबी पाक ﷺ को आगोश मै लिए बगैर ना सोते और ना ही आपﷺ को लिए बगैर घर से बाहर निकलते, अयसी मोहब्बत अबू तालिब رضي الله عنه अपनी औलाद से भी ना करते थे, नबी पाक ﷺ ने फरमाया: जब तक मेरे चाचा अबू तालिब رضي الله عنه हयात रहे मुझे काफिर की तरफ से कोई अजियत नही पोहंची,, अहले सुन्नत किताब: उसनुल मुतालिब फि निजाते अबि तालिब नं: 68 _______________ हजरत अब्दुल हक मोहद्दीस देहलवी رضي الله عنه अपनी किताब (मदारीज उल नबूवत) मे तहरीर फरमाते है की: हजरत अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه के बाद हजरत अबू तालिब رضي الله عنه जो हुजूर ﷺ के हकीकी चाचा थे, हुजूर ﷺ के अहदे किफालत में लाए गए अगर चे जुबैर बिन अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه भी हुज़ूर ﷺ के हकीकी चाचा थे लेकिन हजरत अबदुल्लाह رضي الله عنه और हजरत अबू तालिब رضي الله عنه के दरमियान मुहब्बत बहुत ज्यादा थी, हजरत अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه उन्हें वसीयत फरमा गए थे के हुजूर ﷺ की मुहाफिजत खूब अच्छी तरह करना उस वक्त हुजूर ﷺ की उम्र मुबारक आंठ8 शाल की थी, नो9 दस10 और छे6 शाल भी कहा गया है, एक रिवायत मै ये है के हुजूर ﷺ को उस बात का इख्तियार दिया गया था के आप ﷺ अपने चाचाओं मैसे किस की किफालत मै जाना पसंद फरमाते है तो हुजूर ﷺ ने हजरत अबू तालिब رضي الله عنه की किफालत पसंद गरमाई थी, हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर ﷺ की किफालत व मुहाफिज़त जहूरे नबूवत से पहले और उसके बाद खूब अच्छी तरह अंजाम दी, वो हुजूर ﷺ के बगैर खाना तक ना खाते और हुजूर ﷺ का बिस्तर मुबारक अपने दायने पहलू मै बिछाते घर के अंदर और बाहर हुजूर ﷺ को अपने हमराह रखते| मदारिज उल नबूवत जिल्द: 2 सफाह नं: 42 तसनीफ: हजरत अब्दुल हक मोहद्दीस देहलवी رضي الله عنه ________________ मुफ्ती अहमद यार खान नईमी رحمتہ اللہ علیہ फरमाते है: हजरत अबू तालिब رضي الله عنه पर लानत हरगिज जायज नहीं इस लिए की उनके कुफ्र पर मरने की कोई दलील नहीं बल्कि सैख अब्दुल رضي الله عنه ने मदारिज मे उनके ईमान पर मौत की रिवायत नकल की है नेज रूहुल बयाने एक जगा उनका बाद ए मौत जिंदा होना और ईमान लाना साबित किया बा फर्ज ए मुहाल अगर उनकी मौत कुफ्र पर हुई भी हो तब भी चूं की उन्होंने हुजूर ﷺ की बहोत खिदमत की और हुजूर ﷺ को उनसे बहोत मोहब्बत थी इस लिए उनको बुरा कहना हुजूर ﷺ की इजा(तकलीफ) का बाइस होगा उनका जिक्र खैर ही से करो या खामोश रहो तफसीरे नईमी पारा: 2 सफाह नं: 114
The entire world and everything in it has been created for the benefit of humans, such that if any one thing were missing, some human need would be affected. However, humans were not created for anything in this world. If humans were to cease to exist, nothing in the world would be harmed or missing. This teaches us that just as a stable and its provisions are for the horse, yet the horse is only meant for the rider, similarly, the entire universe—earth, sky, plants, and stones—is for the comfort of humans. But humans themselves were created only for the worship and servitude of their Creator, Allah ﷻ.
For worship, two things are necessary:
(1) Knowledge of the way of worship, which is called Ilm (knowledge).
(2) Interest, enthusiasm, and passion for worship, which is called Tazkiyah, Tasawwuf (spiritual purification), or Islah-e-Batin (purification of the soul). This involves cleaning the heart, separating from bad traits, and developing a love for good.
The first is gained through learning and teaching in religious institutions, and this is called Shari’ah (Islamic law). The second is acquired by being in the company of the pious, following the path of the Ahl Allah (people of Allah), and this is called Tariqah (spiritual path). In reality, Tariqah is the spirit and essence of Shari’ah—the true treasure. Without it, even with knowledge, actions would be ineffective, or they may be dull and temporary, while the inner and outer world remains unsatisfactory.
The ultimate purpose of human life is the connection with Allah ﷻ, which drives the actions of knowledge and the obedience and worship of the Supreme Lord, the Most Wise and Just.
Source: Author Name: Sufi Muhammad Hussain (Khalifa of Maulana Abdurehman Raypuri), Book Name: Tazkiya Nafs ma Islah-e-Haal, Maqadama: Maulana Abdul Qayyum Haqqani, Nazar-e-Thaani: Maulana Muhammad Zaman Kalachwi, al-Qasim Academy, Jamia Abu Hurraira, ● Posted by FJ in FB 17.11.24