जो लोग हिदायत चाहते है वो लोग मौला अली को अपना वली बना ले

फरमान ए रसूल ए खुदा ﷺ
जो लोग हिदायत चाहते है वो लोग मौला अली को अपना वली बना ले,,,

حضرت زید بن ارقم رضی اللہ عنہ فرماتے ہیں : رسول اللہ ﷺ نے ارشاد فرمایا : جو شخص میری زندگی جیسی زندگی گزارنا چاہتا ہے ، جس کا اللہ نے مجھ سے وعدہ کیا ہے ، اس کو چاہئے کہ وہ حضرت علی رضی اللہ عنہ کو اپنا والی بنا لے کیونکہ وہ تمہیں کبھی بھی ہدایت سے باہر نہیں نکالیں گے اور گمراہی میں داخل نہیں ہونے دیں گے ۔
٭٭ یہ حدیث صحیح الاسناد ہے لیکن شیخین رحمۃ اللہ علیہما نے اس کو نقل نہیں کیا ۔”

हजरत जैद बिन अरकम (राजी अल्लाह अन्हो) फरमाते है:
*रसूलल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: जो शक्स मेरी जिंदगी जेसी जिंदगी गुजाना चाहता है, जिसका अल्लाह ने मुझसे वादा किया है उसको चाहिए के वो हजरत अली (करम अल्लाहु वजहुल करीम) को अपना वली बना ले क्यूं के वो तुम्हे कभी भी हिदायत से बाहर नहीं निकालेंगे और गुमराही में दाखिल नहीं होने देंगे*

(मुस्तदर्क सहिहैन हदीस नं: #4642)

शान ए फातिमा बिन्ते असद बिन हाशिम (रजी अल्लाह अन्हा)

हजरत सईद ने उनसे : ऐ अबू मोहम्मद ! आप हमे फातिमा बिन्ते असद बिन हाशिम, हजरत अली इब्ने अबू तालिब (रजी अल्लाह अन्हो) की वालिदा के बारे मै कुछ बताए – उन्होंने कहा : जी हां – मेरे वालिद मोहतरम ने मुझे बताया के अमीर उल मोमिनिन हजरत अली इब्ने अबू तालिब (रजी अल्लाह अन्हो) फरमाते है : जब फातिमा बिन्ते असद बिन हाशिम (रजी अल्लाह अन्हा) का इन्तेकाल हुआ तो रसूलल्लाह (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) ने उनको अपनी कमीज़(जुबा मुबारक) कफन के लिए दिया और उनका जनाजा पढ़ाया और 70 तकबीरें पढ़ी – और आप (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) बाज़ात खुद उनकी कबर मे उतरे और कबर मे इर्द गिर्द इस तरह इशारे फरमा रहे थे गोया के उसको खुला कर रहे हों , फिर जब आप (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) कबर से बहार निकले तो आप (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) की आंखों से आंसू बह रहे थे – फिर आप (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) ने उनकी कबर पर मिट्टी डाली , आप वहां से तशरीफ ले आए तो हजरत उमर बिन खत्ताब (रजी अल्लाह अन्हो) ने अर्ज की : या रसूलल्लाह (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) जितनी शफकत आपने इस खातून पर फरमाई है, मैने किसी और पर आपको ऐसे शफकत फरमाते नहीं देखा – आप (सलअल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम) ने फरमाया : ऐ उमर ! ये औरत मेरी उस मां की तरह थी जिसने मुझे जनम दिया है , बेशक अबू तालिब (रजी अल्लाह अन्हो) काम काझ किया करते थे और उनका दस्तरख्वान होता था , ये औरत उस मैसे बचा कर मेरे लिए रख लिया करती थी और दोबारा मुझे दिया करती थी – और जिब्राइल (अलैहिस्सलाम) ने मुझे बताया के अल्लाह ताअला ने उसको जन्नती कर दिया है और मुझे जिब्राइल (अलैहिस्सलाम) ने बताया के अल्लाह ताअला ने 70 हजार फरिश्तों को उनके लिए दुआ ए मगफिरत के लिए मुकर्रर फरमाए है|

अल मुस्तद्रक लिल हाकिम जिल्द: 4 हदीस नं: 4574

चौदह सितारे अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर पार्ट 3

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आपके वालिदे माजिद की वफ़ात हसरते आयात

जब आपकी उम्र तक़रीबन 38 साल की हुई तो वलीद बिन अब्दुल मलिक ने आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को 95 हिजरी में ज़हरे दग़ा से शहीद कर दिया। आपने फ़राएज़े तजहीज़ो तकफ़ीन सर अंजाम दिये। आप ही ने नमाज़ पढ़ाई। मुल्ला जामी लिखते हैं ंकि हज़रत इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ.स.) ने अपने बाद आपको अपना वसी मुक़र्रर फ़रमाया क्यों कि आप ही तमाम औलादे में अफ़ज़ल व अरफ़ा थे। उलेमा का बयान है कि अपने वालिदे माजिद की ज़ाहिरी वफ़ात के बाद इमाम इमामे ज़माना क़रार पााए आर आप दरजाए इमामत के फ़राएज़ की अदायगी की ज़िम्मेदारी आयद हो गई।

 

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की इल्मी हैसियत

किसी मासूम की इल्मी हैसियत पर रौशनी डालना बहुत दुश्वार है क्यों कि मासूम और इमामे ज़माना को इल्मे लदुन्नी होता है। वह ख़ुदा की बारगाह से इल्मी सलाहियतों से भरपूर पैदा होता है हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) चूंकि इमामे ज़माना मासूमे अज़ली थे इस लिये आपके इल्मी कमालात , इल्मी कारनामे और आपकी इल्मी हैसियत की वज़ाहत नामुम्किन है। ताहम मैं उन वाक़ियात में से कुछ वाक़ेयात लिखता हूँ जिनर उलमा ने उबूर हासिल कर सके हैं।

अल्लामा इब्ने शहरे आशोब लिखते हैं कि हज़रत का ख़ुद इरशाद है कि ‘‘ अलमना मन्तिक़ अल तैरो अवतैना मिन कुल्ले शैइन ’’ हमें ताएरों तक की ज़बान सिखाई गई है और हमे हर चीज़ का इल्म अता किया गया है।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 11 )

रौज़ातुल पृष्ठ में है कि ‘‘ बा ख़ुदा सौगन्द कि माख़ाजनाने खुदाएम दर आसमान व ज़मीन ’’ ख़ुदा की क़सम हम ज़मीन और आसमान में ख़ुदा वन्दे आलम के ख़ाज़िने इल्म हैं और हम ही शजराए नबूवत और मादने हिकमत हैं। वही हमारे यहां आती रही और फ़रिश्तें हमारे यहां आते रहते हैं। यही वजह है कि दुनिया के ज़ाहिरी अरबाबे इक़तेदार हम से जलते और हसद करते हैं। लिसानुल वाएज़ीन में है कि अबू मरीयम अब्दुल ग़फ़्फ़ार का कहना है कि मैं एक दिन हज़रत मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि 1. मौला कौन सा इस्लाम बेहतर है ? फ़रमाया , जिससे अपने बरादरे मोमिन को तकलीफ़ न पहुँचे। 2. कौन सा ख़ुल्क़ बेहतर है ? फ़रमाया , सब्र और माफ़ कर देना। 3. कौन सा मोमिन कामिल है ? फ़रमाया जिसका इख़्लाक़ बेहतर हो। 4. कौन सा जेहाद बेहतर है ? फ़रमाया , जिसमें अपना ख़ून बह जाऐ। 5. कौन सी नमाज़ बेहतर है ? फ़रमाया , जिसका क़ुनूत तवील हो। 6. कौन सा सदक़ा बेहतर है ? फ़रमाया , जिससे नाफ़रमानी से निजात मिले। 7. बादशाहाने दुनिया के पास जाने में क्या राय है ? फ़रमाया , मैं अच्छा नहीं समझता। 8. पूछा क्यों ? फ़रमाया , इस लिये की बादशाहों के पास की आमदो रफ़्त से तीन बातें पैदा होती हैं , 1. मोहब्बते दुनिया , 2. फ़रामोशिए मर्ग , 3. क़िल्लते रज़ाए ख़ुदा। 9. पूछा फिर मैं न जाऊं ? फ़रमाया , मैं तलबे दुनिया से मना नहीं करता अलबत्ता तलबे मआसी से रोकता हूँ।

अल्लामा तबरीसी लिखते हैं कि यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है और इसकी शोहरते आम्मा कि आप इल्मो ज़ोहद और शरफ़ में सारी दुनिया से फ़ौकी़यत ले गये। आपसे इल्मे क़ुरआन इल्मे इल आसार , इल्मे अल सुनन और हर क़िस्म के उलूम , हुक्मे आदाब वग़ैरा में कोई भी फ़ौक़ नहीं गया। हत्ता कि आले रसूल (स. अ.) में भी अबुल आइम्मा के अलावा आपके बराबर उलूम के मज़ाहिरे में कोई नहीं हुआ। बड़े बड़े सहाबा और नुमायां ताबेईन और अज़ीमुल क़द्र फ़ुक़हा आपके सामने ज़ानुए अदब तह करते रहे। आपको आं हज़रत (स अ ) ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी के ज़रिए से सलाम कहलाया था और इसकी पेशीन गोई फ़रमाई थी कि यह मेरा फ़रज़न्द ‘‘ बेक़ारूल उलूम ’’ होगा। इल्म की गुत्थियों को इस तरह सुलझायेगा कि दुनियां हैरान रह जायेगी। आलाम उल वरा पृष्ठ 157 , अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा शिब्लन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि इल्मे दीन , इल्मे अहादीस , इल्मे सुनन और तफ़सीरे कु़रआन व इल्म अल सीरत व उलूमो फ़ुनून , अदब वगै़रा के ज़ख़ीरे जिस क़द्र इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से ज़ाहिर हुय इतने इमाम हुसैन (अ.स.) और इमाम हसन (अ.स.) की औनाद में से किसी से ज़ाहिर नहीं हुए। मुलाहेज़ा हो किताब अल इरशाद पृष्ठ 286 , नूरूल अबसार पृष्ठ 131 अरजहुल मतालिब पृष्ठ 447 , अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के इल्मी फ़यूज़ व बरकात और कमालात व एहसानात से उस शख़्स के अलावा जिसकी बसीरत ज़ाइल हो गई हो , जिसका दिमाग़ ख़राब हो गया हो और जिसकी तबीयत व तीनत फ़ासिद हो गई हो। कोई शख़्स इन्कार नहीं कर सकता। इसी वजह से आपके बारे में कहा जाता है कि आप ‘‘ बाक़रूल उलूम ’’ इल्म के फैलाने वाले और जामेउल उलूम हैं। आप ही उलूमे मआरिफ़ में शोहरते आम्मा हासिल करने और उसके मदारिज बुलन्द करने वाले हैं। आपका दिल साफ़ , इल्मो अमल रौशन व ताबिन्दा , नफ़्स पाक और खि़ल्क़त शरीफ़ थी। आपके कुल अवक़ात इताअते ख़ुदावन्दी में बसर होते थे। जिनके बयान करने से वसफ़ करने वालों की ज़बानें गूंगी और आजिजा़ मांदा हैं। आपके ज़ोहद व तक़वा आपके उलूमो मआरिफ़ आपके इबादात व रियाज़ात और आपके हिदायात व कमालात इस कसरत से हैं कि उनका बयान इस किताब में ना मुम्किन हैं।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्दून लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) अल्लामा ज़मान और सरदारे कबीर उस शान थे। आप उलूम में बड़े तवाहुर और वसीउल इत्तेला थे।(वफ़यात उल अयान , जिल्द 1 पृष्ठ 450 )

अल्लामा ज़हबी लिखते हैं कि आप बनी हाशिम के सरदार और मुतबहे इल्मी की वजह से बाक़िर मशहूर थे। आप इल्म की तह तक पहुँच गये थे। आपने इसके दक़ाएक़ को अच्छी तरह समझ लिया था।(तज़केयल हफ़्फ़ाज़ जिल्द 1 पृष्ठ 111 )

अल्लामा शबरावी लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के इल्मी तज़किरे दुनिया में मशहूर हुए और आपकी मदहो सना में बा कसरत शेर लिखे गये। मालिक ज़ेहनी ने यह तीन शेर लिखे हैं।

तरजुमा:- जब लोग क़ुरआने मजीद का इल्म हासिल करना चाहें तो पूरा क़बीला ए क़ुरैश उसके बताने से आजिज़ रहेगा क्यों कि वह खुद मोहताज हैं और अगर फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के मुहं से कोई बात निकल जाय तो बे हदो हिसाब मसाएल व तहक़ीक़ात के ज़ख़ीरे मोहय्या कर देंगे। यह हज़रात वह सितारे हैं जो हर क़िस्म की तारीकियों में चलने वालों के लिये चमकते हैं और उनके अनवार से लोग रास्ते पाते हैं।(इलतहाफ़ पृष्ठ 42 व तारीख़ुल आइम्मा पृष्ठ 413 )

अल्लामा शहरे आशोब का बयान है कि सिर्फ़ एक रावी मोहम्मद बिन मुस्लिम ने आप से तीस हज़ार (30,000) हदीसें रवायत की हैं।(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 11 )

 

 

आपके बाज़ इल्मी हिदायात व इरशादात

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि जाबिर जाफ़ेई का बयान है कि एक दिन हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से मिला तो आपने फ़रमाया ,

ऐ जाबिर मैं दुनियां से बिल्कुल बेफ़िक्र हूं क्यों कि जिसके दिल में दीने ख़ालिस हो वह दुनियां को कुछ नहीं समझता और तुम्हें मालूम होना चाहिये कि दुनिया छोड़ी हुई सवारी , उतारा हुआ कपड़ा और इस्तेमाल की हुई औरत है।

मोमिन दुनियां की बक़ा से मुत्मिईन नहीं होता और उसकी देखी हुई चीज़ों की वजह से नूरे ख़ुदा उससे पोशिदा नहीं होता।

मोमिन को तक़वा इख़्तेयार करना चाहिये कि वह हर वक़्त उसे मुतानब्बे और बेदार रखता है।

सुनो दुनिया एक सराय फ़ानी है। ‘‘ नज़लत बेही दारे तहलत मिनहा ’’ इसमें आना जाना लगा रहता है , आज आये और कल गये और दुनिया एक ख़्वाब है जो कमाल के मानन्द देखी जाती है और जब जाग उठो तो कुछ नहीं आपने फ़रमाया , तकब्बुर बहुत बुरी चीज़ है यह जिस क़द्र इंसान में पैदा होगा उसी क़द्र उसकी अक़ल घटेगी।

कमीने शख़्स का हरबा गालियां बकना है।

एक आलिम की मौत को इबलीस नब्बे (90) आबिदों के मरने से बेहतर समझता है।

एक हज़ार आबिदों से वह एक आलिम बेहतर है जो अपने इल्म से फ़ायदा पहुंचा रहा हो।

मेरे मानने वाले वह हैं जो अल्लाह की इताअत करें।

आंसुओ की बड़ी की़मत है रोने वाला बख़्शा जाता है और जिस रूख़सार पर आंसू जारी हों वह ज़लील नहीं होता।

सुस्ती और ज़्यादा तेज़ी बुराईयों की कुंजी है। ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन इबादत पाक दामनी है। इनसान को चाहिये कि अपने पेट और अपनी शर्मगाहों को महफ़ूज़ रखें।

दुआ से क़ज़ा भी टल जाती है। नेकी बेहतरीन ख़ैरात है।

बदतरीन ऐब यह है कि इन्सान को अपनी आंख की शहतीर दिखाई न दे और दूसरों की आंख का तिन्का नज़र न आये। यानी अपने बड़े गुनाह की परवाह न हो और दूसरों के छोटे अयूब उसे बड़े नज़र आयें और खुद अमल न करे। सिर्फ़ दूसरों को तामील दे।

जो ख़ुशहाली में साथ दे और तंग दस्ती में दूर रहे , वह तुम्हारा भाई और दोस्त नहीं है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 272 )

अल्लामा शिबलंजी लिखते हैं कि , हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया कि जब कोई नेमत मिले तो कहो अलहम्दो लिल्लाह और जब कोई तकलीफ़ पहुँचे तो कहो ‘‘ लाहौल विला कु़व्वता इल्लाह बिल्ला ’’ और जब रोज़ी तंग हो तो कहो ‘’ अस्तग़ फ़िरूल्लाह ’’। दिल को दिल से राह होती है , जितनी मोहब्बत तुम्हारे दिल में होगी इतनी ही तुम्हारे भाई के और दोस्त के दिल में भी होगी।

तीन चीज़ें ख़ुदा ने तीन चीज़ों में पोशीदा रखी है।

1. अपनी रज़ा अपनी इताअत मे किसी फ़रमा बरदारी को हक़ीर न समझो। शायद इसी में खुदा की रज़ा हो।

2. अपनी नाराज़़ी अपनी माअसीयत में – किसी गुनाह को मामूली न जानों शायद ख़ुदा उसी से नाराज़ हो जाय।

3. अपनी दोस्ती या अपने वली – मख़लूक़ात में किसी शख़्स को हक़ीर न समझो , शायद वह वली उल्लाह हो।(नूरूल अबसार पृष्ठ 131 व इतहाफ़ पृष्ठ 93 )

अहादीसे आइम्मा में है। इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) फ़रमाते हैं , इन्सान को जितनी अक़्ल दी गई है उसी के मुताबिक़ उससे क़यामत में हिसाब व किताब होगा।

एक नफ़ा पहुँचाने वाला आलिम सत्तर हज़ार आबिदों से बेहतर है।

ख़ुदा उन उलमा पर रहम व करम फ़रमाए जो अहयाए इल्म करते और तक़वा को फ़रोग़ देते हैं।

इल्म की ज़कात यह है कि मख़लूके ख़ुदा को तालीम दी जाय।

क़ुरआन मजीद के बारे में तुम जितना जानते हो उतना ही बयान करो।

बन्दों पर ख़ुदा का हक़ यह है कि जो जानता हो उसे बताए और जो न जानता हो उसके जवाब में ख़ामोश हो जाए।

इल्म हासिल करने के बाद उसे फैलाओ इस लिये कि इल्म को बन्द रखने से शैतान का ग़लबा होता है।

मोअल्लिम और मुताकल्लिम का सवाब बराबर है।

जिस तालीम की ग़रज़ यह हो कि वह उलमा से बहस करे , जोहला पर रोब जमाए और लोगों को अपनी तरफ़ माएल करे वह जहन्नमी है।

दीनी रास्ता दिखलाने वाला और रास्ता पाने वाला दोनों सवाब की मीज़ान के लिहाज़ से बराबर हैं।

जो दीनियात में ग़लत कहता हो उसे सही बता दो।

ज़ाते इलाही वह है जो अक़ले इंसानी में समा न सके और हुदूद में महदूद न हो सके। इसकी ज़ात फ़हम व अदराक से बाला तर है। ख़ुदा हमेशा से है और हमेशा रहेगा।

ख़ुदा की ज़ात के बारे में बहस न करो वरना हैरान हो जाओगे।

अज़ल की दो क़िस्मे हैं , एक अज़ल महतूम , दूसरे अज़ल मौकूफ़ , दूसरी से ख़ुदा के सिवा कोई वाक़िफ़ नहीं।

ज़मीने हुज्जते ख़ुदा के बग़ैर बाक़ी नहीं रह सकती।

उम्मते बे इमाम की मिसाल भेड़ बकरी के उस ग़ल्ले की है , जिसका कोई भी निगरान हो।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से रूह की हक़ीक़त और माहीयत के बारे में पूछा तो फ़रमाया कि रुह हवा कि मानिन्द मुताहर्रिक है और यह रीह से मुश्ताक़ है , हम जिन्स होने की वजह से उसे रुह कहा जाता है। यह रुह जो जानदारों की ज़ात के साथ मख़सूस है , वह तमाम रूहों से पाकीज़ा तर है। रूह मख़लूक़ और मसनूह है और हादिस और एक जगह से दूसरी जगह मुनतक़िल होने वाली है। वह ऐसी लतीफ़ शै है जिसमें न किसी क़िस्म की गरानी और सगीनी है न सुबकी , वह एक बारीक एक रक़ीक़ शै है जो क़ालिबे क़सीफ़ में पोशीदा है। इसकी मिसाल इस मशक जैसी है जिसमें हवा भर दो , हवा भरने से वह फूल जायेगी लेकिन उसके वज़न में इज़ाफ़ा न होगा। रूह बाक़ी है और बदन से निकलने के बाद फ़ना नहीं होती। यह सूर फुंकने के वक़्त फ़ना होगी।

आपसे ख़ुदा वन्दे आलम के सिफ़ात के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया कि , वह समी बसीर है और आलाए समा व बसर के बग़ैर सुनता और देखता है।

रईसे मोतज़ला उमर बिन अबीद ने आपसे पूछा कि ‘‘ मन यहाल अलैहा ग़ज़बनी ’’ से कौन सा ग़ज़ब मुराद है ? फ़रमाया उक़ाब और अज़ाब की तरफ़ इशारा फ़रमाया गया है।

अबुल ख़ालीद क़ाबली ने आपसे पूछा कि क़ौले ख़ुदा ‘‘ फ़ामनू बिल्लाह व रसूलहे नूरूल लज़ी अन्ज़लना ’’ में नूर से क्या मुराद है ? आपने फ़रमाया , ‘‘ वल्लाहा अलन नूर अल आइम्मते मिन आले मोहम्मद ’’ ख़ुदा की क़सम नूर से हम आले मोहम्मद मुराद हैं।

आप से दरयाफ़्त किया गया कि ‘‘ यौमे नदउ कुल्ले उनासिम बे इमामेहिम ’’ से कौन लोग मुराद हैं ? आपने फ़रमाया वह रसूल अल्लाह हैं और उनके बाद उनकी औलाद से आइम्मा होंगे। उन्ही की तरफ़ आयत से इशारा फ़रमाया गया है। जो उन्हें दोस्त रखेगा और उनकी तसदीक़ करेगा। वही नजात पायेगा और जो उनकी मुख़ालेफ़त करेगा जहन्नम में जायेगा।

एक मरतबा ताऊसे यमानी ने हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर यह सवाल किया कि वह कौन सी चीज़ है जिसका थोड़ा इस्तेमाल हलाल था , और ज़्यादा इस्तेमाल हराम ? आपने फ़रमाया की नहरे तालूत का पानी था , जिसका सिर्फ़ एक चुल्लू पीना हलाल था और उससे ज़्यादा हराम। पूछा वह कौन सा रोज़ा था जिसमें ख़ाना पीना जायज़ था ? फ़रमाया वह जनाबे मरयम का ‘‘ सुमत ’’ था जिसमें सिर्फ़ न बोलने का रोज़ा था , खाना पीना हलाल था। पूछा वह कौन सी शै है जो सर्फ़ करने से कम होती है बढ़ती नहीं ? फ़रमाया की वह उम्र है। पूछा वह कौन सी शै है जो बढ़ती है घटती है नहीं ? फ़रमाया वह समुद्र का पानी है। पूछा वह कौन सी चीज़ है जो सिर्फ़ एक बार उड़ी और फिर न उड़ी ? फ़रमाया वह कोहे तूर है जो एक बार हुक्मे ख़ुदा से उढ़ कर बनी इसराईल के सरों पर आ गया था। पूछा वह कौन लोग हैं जिनकी सच्ची गवाही ख़ुदा न झूटी क़रार दी ? फ़रमाया वह मुनाफ़िक़ों की तसदीक़े रिसालत है जो दिल से न थी। पूछा बनी आदम का 1/3 हिस्सा कब हलाक हुआ ? फ़रमाया ऐसा कभी नहीं हुआ। तुम यह पूछो की इन्सान का 1 /4 हिस्सा कब हलाक हुआ तो मैं तुम्हें बताऊं कि यह उस वक़्त हुआ जब क़ाबील ने हाबील को क़त्ल किया क्यों कि उस वक़्त चार आदमी थे। आदम , हव्वा , हाबील , क़ाबील। पूछा फिर नस्ले इंसानी किस तरह बढ़ी ? फ़रमाया जनाबे शीस से जो क़त्ले हाबील के बाद बतने हव्वा से पैदा हुए।