अफज़लियत ए मौला अली अलैहिस्सलाम…

अफज़लियत ए मौला अली अलैहिस्सलाम…

✍️ इमाम काज़ी अबू बकर अल बाक़लानी रह० [मतवफ्फह 403 हिजरी] ने ‘मनाकिब अइम्मा ए अरबा’ में रकम नंबर 351 के तहत लिखते हैं कि-
” والقَوْلُ بِتَفْضِيل عَليٍّ رِضْوَانُ الله عنه مَشْهُورٌ عِنْدَ كَثِيرٍ مِنَ الصَّحَابَةِ كالذي يَرْوِي عن عَبْدَ الله بن عَبَّاس وحُذَيْفَة بن اليمان وعمار وجابر بن عبدالله وأبي الهيثم بن التّيهان وغيرِهم، وإنْ كانَتْ الرِوَايَةُ في تفضيل أبي بكرٍ أشهر عند أصْحَاب الحَدِيث..”

यानि ‘और मौला अली [अलैहिस्सलाम] की अफ़ज़लियत का कौल कसीर सहाबा किराम रिजवानुल्लाह अलैहिम अजमआईन में मशहूर था जैसा कि अब्दुल्ला बिन अब्बास, हुजैफा बिन यमान, अम्मार बिन यासिर, जाबिर बिन अब्दुल्लाह, अबू हैसिम बिन तैहान रजिअल्लाह अन्हुम व बाकी लोगों से मरवी है।
और जहां तक ताल्लुक रहा अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत का तो यह कौल असहाब उल हदीस (यानि मुहद्दिसीन) में ज्यादा मशहूर है।’
                       – सफा नंबर 294 पर

फिर रकम नंबर 369 के तहत लिखते हैं कि-
فكذلِكَ قد رَوَى عن عَبدِ الله بَنْ عَباس والحَسَن بَنْ عَلي وأُبَيّ وزَيْدِ وعَمَّارَ بَنْ يَاسر، وسلمان الفارسي، وجَابِرَ ابْنِ عبد الله ، وأبي الهَيْثم بن التّيهان الأنصاري، وحذيفة بن اليمان، وعمرو ابن الحمق، وأبي سعيد الخُذري، وغيرهم من الصحابةِ رَضِيَ الله عنهم، كانوا يقولون: إِنَّ عَلياً خَيْرُ البَشَرِ ، وخَيْرُ النَّاسِ بعد رسول الله، وأعْلَمُهم، وأوَّلُهم إسلاماً، وأحبهم إلى رسول الله ، إلى نَظَائِرِ هذه، فيَجِبُ دَلالَهُ قَوْلِهِم على تَفْضِيله.

यानि ‘अब्दुल्ला बिन अब्बास, हसन बिन अली, अबू दरदा, ज़ैद बिन अरक़म, अम्मार बिन यासिर, सलमान फारसी, जाबिर बिन अब्दुल्ला, अबू हैसिम बिन तैहान, हुजैफा बिन यमान, अम्र बिन अल हमक़, अबू साईद खुदरी और दीगर सहाबा किराम और गैरहिम रजिअल्लाह अन्हुम अजमाईन से रिवायत किया गया है कि इन्होंने फरमाया- अली [अलैहिस्सलाम] दर-हक़ीकत खैरुल-बसर (इंसानों में सबसे बेहतरीन शख्स) और रसूल ए खुदा सल्ल० के बाद लोगों में सबसे बेहतर हैं और लोगों में सबसे ज्यादा इल्म रखने वाले और सबसे पहले इस्लाम लाने वाले और रसूल-अल्लाह सल्ल० के नजदीक सबसे ज्यादा महबूब हैं।’
         – सफा नंबर 294.

फिर रकम नंबर 617 के तहत लिखते हैं कि-
“وقد روى أن قوماً من الصحابة كانوا يذهبون إلى تفضيل على على أبي بكر..”

यानि ‘नि:संदेह (बिना किसी शक ओ शुबह) के सहाबा किराम की एक जमाआत हजरत अली [रजिअल्लाह अन्हु] को हजरत अबू बकर पर तफ़्ज़ील का मज़हब रखती थी।’
           – सफा नंबर 471.
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इमाम बाक़लानी की किताब ‘मनाकिब अइम्मा ए अरबा’ का आनलाइन पीडीएफ लिंक 👇
https://archive.org/details/Heliopolis1957_gmail_20180407_1604/page/n295/mode/1up?view=theater

इमाम शमशुद्दीन ज़हबी की किताब ‘सियर अलामिन नुबला’ की जिल्द नंबर 17 में सफा नंबर 190 पर इमाम बाक़लानी की तौसीक देखें 👇
https://archive.org/details/saanz/17/page/n190/mode/1up?view=theater
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मसला ए अफजलियत पर चौथी सदी के मशहूर मुज़द्दिद व मुहद्दिस इमाम बाक़लानी की इन सभी बातों पर गौर किया जाए तो दो बातें सामने आता है कि-
1) अगर इमाम बाक़लानी की बात सही है तो पता चलता है कि हजरत अबू बकर की अफजलियत पर इजमा नहीं है बल्कि अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत पर खुद में इख्तिलाफ है क्योंकि बहुत से सहाबा किराम मौला अली अलैहिस्सलाम को सबसे अफजल मानते थे तो इस तरह से अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत पर इजमा वाली बात का सत्यानाश हो जाता है।

2) अगर मान लिया जाए कि नबी करीम सल्ल० के बाद उम्मत में सबसे अफजल हजरत अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु ही हैं और इनकी अफजलियत पर इजमा है तो फिर अपने इन चौथी सदी के मुज़द्दिद व मुहद्दिस इमाम बाक़लानी पर फतवा लगाना पड़ेगा कि इन्होंने सहाबा किराम पर झूठी तोहमत लगाया और इस तरह से अपने इन अकाबिरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, कैसे इमाम और कैसे हमारे अकाबिर हैं…
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चौदह सितारे  अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर पार्ट 2

wp-17301830975646182326091623356331हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी की बाहमी मुलाक़ात

यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि हज़रत मोहम्मद (स. अ.) ने अपनी ज़ाहेरी ज़िन्दगी के एख़्तेमाम पर इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की विलादत से तक़रीबन 46 साल पहले जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी के ज़रिए से इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को सलाम कहलाया था। इमाम (अ.स.) का यह शरफ़ इस दरजे मुम्ताज़ है कि आले मोहम्मद (स. अ.) में से कोई भी इसकी हमसरी नहीं कर सकता।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 272 )

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि सरवरे काएनात(स. अ.) एक दिन अपनी आग़ोशे मुबारक में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को लिये हुए प्यार कर रहे थे नागाह आपके साहबी ए ख़ास जाबिर बिन अब्दुल्लाह हाज़िर हुए। हज़रत ने जाबिर को देख कर फ़रमाया ऐ जाबिर मेरे इस फ़रज़न्द की नस्ल से एक बच्चा पैदा होगा जो इल्मो हिकमत से भर पूर होगा। ऐ जाबिर ! तुम उसका ज़माना पाओगे और उस वक़्त तक ज़िन्दा रहोगे जब तक वह सतहे अर्ज़ पर न आ जाये। ऐ जाबिर ! देखो जब तुम उस से मिलना तो उसे मेरा सलाम कह देना। जाबिर ने इस ख़बर और इस पेशीनगोई को कमाले मसर्रत के साथ सुना और उसी वक़्त से इस बहज़त आफ़रीं साअत का इन्तेज़ार करना शुरू कर दिया। यहां तक कि चश्मे इंतेज़ार पत्थरा गई और आंखों का नूर जाता रहा। जब तक आप बीना थे हर मजलिस व महफ़िल में तलाश करते रहे और जब नूरे नज़र जाता रहा तो ज़बान से पुकारना शुरू कर दिया। आपकी ज़बान पर जब हर वक़्त इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) का नाम रहने लगा तो लोग यह कहने लगे कि जाबिर का दिमाग़ जा़ैफ़े पीरी की वजह से अज़कार रफता हो गया है लेकिन बहर हाल वह वक़्त आ ही गया कि आप पैग़ामे अहमदी और सलामे मोहम्मदी पहुँचाने में कामयाब हो गए। रावी का बयान है कि हम जनाबे जाबिर के पास बैठे हुए थे कि इतने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) तशरीफ़ लाए आपके हमराह आपके फ़रज़न्द इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) भी थे। इमाम (अ.स.) ने अपने फ़रज़न्द अरजुमन्द से फ़रमाया कि चचा जाबिर बिन अब्दुल्लाह अनसारी के सर का बोसा दो। उन्होंने फ़ौरन तामील इरशाद फ़रमाया , जाबिर ने इनको अपने सीने से लगा लिया और कहा कि इब्ने रसूल (अ.स.) आपको आपके जद्दे नाम दार हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा(स. अ.) ने सलाम फ़रमाया है। हज़रत ने कहा ऐ जाबिर इन पर और तुम पर मेरी तरफ़ से भी सलाम हो। इसके बाद जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अनसारी ने आप से शफ़ाअत के लिये ज़मानत की दरख़्वास्त की। आपने उसे मनज़ूर फ़रमाया और कहा कि मैं तुम्हारे जन्नत में जाने का ज़ामिन हूँ।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 वसीला अल नजात पृष्ठ 338 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 373 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 181, नूरूल अबसार पृष्ठ 14, रेजाल कशी पृष्ठ 27 तारीख़ तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 96 मजालिस अल मोमेनीन पृष्ठ 117 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई का बयान है कि आँ हज़रत ने यह भी फ़रमाया था कि ‘‘ अन बकारक बादा रौयते ही यसरा ’’ कि ऐ जाबिर मेरा पैग़ाम पहुँचाने के बाद बहुत थोड़ा ज़िन्दा रहोगे चुनान्चे ऐसा ही हुआ।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 273 )


सात साल की उम्र में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) का हज्जे ख़ाना ए काबा

अल्लामा जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि रावी बयान करता है कि मैं हज के लिये जा रहा था , रास्ता पुर ख़तर और इन्तेहाई तारीक था। जब मैं लक़ो दक़ सहरा में पहुँचा तो एक तरफ़ से कुछ रौशनी की किरन नज़र आई मैं उसकी तरफ़ देख ही रहा था कि नागाह एक सात साल का लड़का मेरे क़रीब आ पहुँचा। मैंने सलाम का जवाब देने के बाद उस से पूछा कि आप कौन हैं ? कहां से आ रहे हैं और कहां का इरादा है और आपके पास ज़ादे राह क्या है ? उसने जवाब दिया , सुनो में ख़ुदा की तरफ़ से आ रहा हूँ और ख़ुदा की तरफ़ जा रहा हूँ। मेरा ज़ादे राह ‘‘ तक़वा ’’ है मैं अरबी उल नस्ल , कुरैशी ख़ानदान का अलवी नजा़द हूँ। मेरा नाम मोहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब है। यह कह कर वह नज़रों से ग़ायब हो गए और मुझे पता न चल सका कि आसमान की तरफ़ परवाज़ कर गये या ज़मीन में समा गये।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 183 )


हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और इस्लाम में सिक्के की इब्तेदा

मुवर्रिख़ शहीर ज़ाकिर हुसैन तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 42 में लिखते हैं कि अब्दुल मलिक बिन मरवान ने 75 हिजरी में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की सलाह से इस्लामी सिक्का जारी किया। इससे पहले रोम व ईरान का सिक्का इस्लामी ममालिक में भी जारी था।

इस वाक़िये की तफ़सील अल्लामा दमीरी के हवाले से यह है कि एक दिन अल्लामा किसाई से ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी ने पूछा कि इस्लाम में दिरहम व दीनार के सिक्के कब और क्यों कर राएज हुए ? उन्होंने कहा कि सिक्कों का इजरा ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक बिन मरवान ने किया है लेकिन इसकी तफ़सील से ना वाक़िफ़ हूँ और मुझे नहीं मालूम कि इनके इजरा और ईजाद की ज़रूरत क्यों महसूस हुई। हारून रशीद ने कहा कि बात यह है कि ज़माना ए साबिक़ में जो कागज़ वग़ैरा ममालिके इस्लाकिया में मुस्तमिल होते थे वह मिस्र में तैय्यार हुआ करते थे जहां उस वक़्त नसरानियो की हुकूमत थी और वह तमाम के तमाम बादशाहे रूम के मज़हब पर थे। वहां के कागज़ पर जो ज़र्ब यानी (ट्रेड मार्क) होता था। उसमें ब ज़बाने रोम (अब इब्न रूहुल क़ुदस) लिखा होता था। ‘‘ फ़लम यज़ल ज़ालेका कज़ालेका फ़ी सदरूल इस्लाम कल्लाह बेमआनी अलेहा काना अलैहा ’’ और यही चीज़ इस्लाम में जितने दौर गुज़रे थे सब में रायज थी। यहां तक कि जब अब्दुल मलिक बिन मरवान का ज़माना आया तो चूंकि वह बड़ा जे़हीन और होशियार था लेहाज़ा उसने तरजुमा करा के गर्वनरे मिस्र को लिखा कि तुम रूमी ट्रेड मार्क को मौकूफ़ व मतरूक कर दो यानी कागज़ कपड़े वग़ैरा जो अब तय्यार हों उनमें यह निशान न लगने दो बल्कि उन पर यह लिखवाओ ‘‘ शहद अल्लाह अन्हा ला इलाहा इला हनो ’’ चुनान्चे इस अमल पर अमल दरामद किया गया। जब इन नये मार्क के कागज़ों का जिन पर कलमाए तौहीद सब्त था रवाज पाया तो क़ैसरे रोम को बे इन्तेहा नागवार गुज़रा। उसने तोहफ़े तवाएफ़ भेज कर अब्दुल मलिक बिन मरवान ख़लीफ़ा ए वक़्त को लिखा कि कागज़ वग़ैरा पर जो मार्क पहले था वही बदस्तूर जारी करो। अब्दुल मलिक ने हदिये लेने से इन्कार कर दिया और सफ़ीर को तोहफ़ों और हदाया समैत वापस भेज दिया और उसके ख़त का जवाब तक न दिया।

क़ैसरे रोम ने तहाएफ़ को दुगना कर के भेजा और लिखा कि तुमने मेरे तहाएफ़ कम समझ कर वापस कर दिया इस लिये अब इज़ाफ़ा कर के भेज रहा हूँ इसे क़ुबूल कर लो और कागज़ से नया मार्क हटा दो। अब्दुल मकिल ने फिर हदीये वापस किये और मिसले साबिक़ कोई जवाब न दिया। इसके बाद क़ैसरे रोम ने तीसरी मरतबा ख़त लिखा और तहाएफ़ व हदाया भेजे और ख़त में लिखा कि तुम ने मेरे ख़तों के जवाबात नहीं दिये और न मेरी बात क़ुबूल की। अब मैं क़सम खा कर कहता हूँ कि अगर तुम ने अब भी रूमी ‘‘ ट्रेड मार्क ’’ को अज़ सरे नौ रवाज न दिया और तौहीद के जुमले कागज़ से न हटाय तो मैं तुम्हारे रसूल को गालियां , सिक्का ए दिरहम व दीनार पर नक़्श करा के तमाम ममालिके इस्लामिया में रायज करूंगा और तुम कुछ न कर सकोगे। देखो अब जो मैंने लिखा है उसे पढ़ कर ‘‘ अर फ़स जबिनेका अरक़न ’’ अपनी पेशानी का पसीना पोछ डालो और जो मैं कहता हूँ उस पर अमल करो ताकि हमारे और तुम्हारे दरमियान जो रिश्ताए मोहब्बत क़ायम है बदस्तूर बाक़ी रहे।

अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने जिस वक़्त इस ख़त को पढ़ा उस के पाओं तले से ज़मीन निकल गई। हाथ के तोते उड़ गये और नज़रो में दुनिया तारीक हो गई। उसने कमाले इज़तेराब में उलेमा , फ़ुज़ला , अहले राय और सियासत दोनों को फ़ौरन जमा कर के उनसे मशविरा तलब किया और कहा कि ऐसी बात सोचो की सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे या सरासर इस्लाम कामयाब हो जाय। सब ने सर तोड़ कर बहुत देर तक ग़ौर किया लेकिन कोई ऐसी राय न दे सके जिस पर अलम किया जा सकता। ‘‘ फ़ल्म यहजद अन्दा अहदा मिन्हुम राया यामल बेही ’’ जब बादशाह उनकी किसी राय से मुतमईन न हो सका तो और ज़्यादा परेशान हुआ और दिल में कहने लगा मेरे पालने वाले अब क्या करूं। अभी वह इसी तरद्दुद में बैठा था कि उसका वज़ीरे आज़म इब्ने ‘‘ ज़न्बआ ’’ बोल उठा। बादशाह तू यक़ीनन जानता है कि इस अहम मौक़े पर इस्लाम की मुश्किल कुशाई कौन कर सकता है लेकिन अमदन उसकी तरफ़ रूख़ नहीं करता। बादशाह ने कहा , ‘‘ वैहका मन ’’ ख़ुदा तुझसे समझे , बता तो सही वह कौन हैं ? वज़ीरे आज़म ने अर्ज़ की ‘‘ एलैका बिल बाक़िर मिन अहले बैतुन नबी ’’ मैं फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की तरफ़ इशारा कर रहा हूँ और वही इस आड़े वक़्त में काम आ सकते हैं। अब्दुल मलिक बिन मरवान ने ज्यों ही आपका नाम सुना ‘‘ क़ाला सदक़त ’’ कहने लगा , ख़ुदा की क़सम तुम ने सच कहा और सही रहबरी की है।

इसके बाद उसी वक़्त फ़ौरन अपने आमिले मदीने को लिखा कि इस वक़्त इस्लाम पर एक सख़्त मुसिबत आ गई है , और इसका दफ़आ होना इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के बग़ैर ना मुमकिन है , लेहाज़ा जिस तरह हो सके उन्हें राज़ी कर के मेरे पास भेज दो , देखो इस सिलसिले में जो मसारिफ़ होंगे , वह हुकूमत के ज़िम्मे होंगे।

अब्दुल मलिक ने दरख़्वास्त तलबी , मदीने इरसाल करने के बाद शाहे रोम के सफ़ीर को नज़र बन्द कर दिया और हुक्म दिया कि जब तक मैं इस मसले को हल न कर सकूँ इसे राजधानी से जाने न देना।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की खि़दमत में अब्दुल मलिक बिन मरवान का पैग़ाम पहुँचा और आप फ़ौरन आज़िमे सफ़र हो गये और अहले मदीना से फ़रमाया कि चूंकि इस्लाम का काम है लेहाज़ा मैं अपने तमाम कामों पर इस सफ़र को तरजीह देता हूँ। अलग़रज़ आप वहां से रवाना हो कर अब्दुल मकिल के पास पहुँचे। चुंकि वह सख़्त परेशान था इस लिये उसने आप के इस्तक़बाल के फ़ौरन बाद अर्ज़े मुद्दआ कर दिया। इमाम (अ.स.) ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया , ‘‘ ला याज़म हाज़ा अलैका फ़ानहु लैसा बे शैइन ’’ ऐ बादशाह घबरा नहीं यह बहुत ही मामूली सी बात है। मैं इसे अभी चुटकी बजाते हल किए देता हूँ। बादशाह सुन मुझे बा इल्मे इमामत मालूम है कि ख़ुदाये क़ादिरो तवाना क़ैसरे रोम को इस फ़ेले क़बीह पर क़ुदरत ही न देगा और फिर ऐसी सूरत में जब कि उसने तेरे हाथों में उस से ओहदा बर होने की ताक़त दे रखी है। बादशाह ने अर्ज़ किया , यब्ना रसूल अल्लाह (स. अ.) वह कौन सी ताक़त है जो मुझे नसीब है और जिसके ज़रिये से मैं कामयाबी हासिल कर सकता हूँ ?

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया कि तुम इसी वक़्त हक़ाक और कारीगरों को बुलाओ और उनसे दिरहम और दीनार के सिक्के ढलवाओ और मुमालिके इस्लामिया में रायज कर दो। उसने पूछा की उनकी क्या शक्लो सूरत होगी और वह किस तरह ढलेंगे ? इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि सिक्के के एक तरफ़ कलमा ए तौहीद दूसरी तरफ़ पैग़म्बरे इस्लाम का नामे पसमी और ज़र्ब सिक्के का सन् लिखा जाए। उसके बाद उसके औज़ान बतायें आपने कहा कि दिरहम के तीन सिक्के इस वक़्त जारी हैं एक बग़ली जो दस मिसक़ाल के दस होते हैं। दूसरे समरी ख़फ़ाक़ जो छः मिसक़ाल के दस होते हैं। तीसरे पांच मिसक़ाल के दस यह कुल 21 मिसक़ाल होते हैं। इसको तीन पर तक़सीम करने पर हासिले तक़सीम 7 सात मिसका़ल हुए। इसी सात मिसक़ाल के दस दिरहम बनवां और इसी सात मिसक़ाल की क़ीमत के सोने के दीनार तैय्यार कर जिसका खुरदा दस दिरहम हो। सिक्का दिरहम का नक़्श चूंकि फ़ारसी में है इसी लिये इसी फ़ारसी में रहने दिया जाय और दीनार का सिक्का रूमी हरफ़ों में है लेहाज़ा उसे रूमी ही हरफ़ों में कन्दा कराया जाय और ढालने की मशीन ‘‘ साचा ’’ शीशे का बनाया जाय ताकि सब हम वज़न तैय्यार हो सकें।

अब्दुल मलिक ने आपके हुक्म के मुताबिक़ तमाम सिक्के ढलवा लिये और सब काम दुरूस्त कर लिया। इसके बाद हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर दरयाफ़्त किया कि अब क्या करूं ? ‘‘ अमरहा मोहम्मद बिन अली ’’ आपने हुक्म दिया कि इन सिक्कों को तमाम ममालिके इस्लामिया में रायज कर दे और साथ ही एक हुक्म नाफ़िज़ कर दे जिसमें यह हो कि इसी सिक्के को इस्तेमाल किया जाय और रूमी सिक्के खि़लाफ़े क़ानून क़रार दिये गये। अब जो खि़लाफ़ वरज़ी करेगा उसे सख़्त सज़ा दी जायेगी और ब वक़्ते ज़रूरत उसे क़त्ल भी किया जायेगा। अब्दुल बिन मरवान ने तामीले इरशाद के बाद सफ़ीरे रूम को रिहा कर के कहा कि अपने बादशाह से कहना कि हमने अपने सिक्के ढलवा कर रायज कर दिये और तुम्हारे सिक्के को ग़ैर क़ानूनी क़रार दे दिया। अब तुम से जो हो सके कर लो।

सफ़ीरे रोम यहां से रिहा हो कर जब अपने क़ैसर के पास पहुँचा और उस से सारी दास्तान बताई तो वह हैरान रह गया और सर डाल कर देर तक खा़मोश बैठा सोचता रहा। लोगों ने कहा , बादशाह तूने जो कहा था कि मैं मुसलमानों के पैग़म्बर को सिक्कों पर गालियां कन्दा कर दूंगा। अब इस पर अमल क्यों नहीं करते ? उसने कहा अब गालियां कन्दा कर के क्या कर लूगां। अब तो उनके ममालिक में मेरा सिक्का ही नहीं चल रहा और लेन देन ही नहीं हो रहा है।(हयातुल हैवान दमीरी अल मतूफ़ी 808 हिजरी जिल्द 1 पृष्ठ 63 तबआ मिस्र 136 हिजरी)


वलीद बिन अब्दुल मलिक की आले मोहम्मद (अ.स.) पर ज़ुल्म आफ़रीनी

तारीख़े अबुल फ़िदा में है कि हिजरी 86 में वलीद बिन अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ख़लीफ़ा मुक़र्रर हुआ। तारीख़े कामिल में है कि 91 हिजरी में उसने हज्जे काबा अदा किया। मुवर्रेख़ीने इस्लाम का बयान है कि जब वलीद बिन अब्दुल मलिक हज से फ़ारिग़ हो कर मदीना ए मुनव्वरा आया तो एक दिन मिम्बरे रसूल (स अ ) पर ख़ुत्बा देते हुए उसकी नज़र इमाम हसन (अ.स.) के बेटे हसने मुसन्ना पर पड़ी हसने मुसन्ना पर पड़ी जो ख़ाना ए सय्यदा में बैठे हुए आयना देख रहे थे। ख़ुत्बे से फ़राग़त के बाद उसने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ को तलब कर के कहा कि तुमने हसन बिन हसन (अ.स.) वग़ैरा को क्यों अब तक इस मकान में रहने दिया और क्यों न उनको यहां से निकाल बाहर किया। मैं नहीं चाहता कि आइन्दा फिर इन लोगों को यहां देखूं। ज़रूरत है कि यह मकान इन से ख़ाली करा लिया जाय और इसे ख़रीद कर मस्जिद में शामिल कर दिया जाय। हसन मुसन्ना और फातेमा बिन्ते इमाम हुसैन (अ.स.) और उनकी औलाद ने घर छोड़ने से इन्कार किया। वलीद ने हुक्म दिया कि मकान को उन लोगों पर गिरा दो। फिर लोगों ने ज़बर दस्ती असबाब निकाल कर फेकना और उसे उजाड़ना शुरू कर दिया। मजबूरन यह हज़रात मुख़द्देराते आलियात समैत रोजे़ रौशन में घर से निकल कर बैरूने मदीना सुकूनत पज़ीर हुए। कुछ दिनों के बाद इसी क़िस्म का वाक़िया जनाबे हफ़सा के मकान का भी पेश आया जो औलादे हज़रत उमर के क़ब्ज़े में था। चुनान्चे जब उन से कहा गया कि घर से बाहर निकलो तो उन्होंने मन्ज़ूर न किया और उसकी क़िमत भी क़ुबूल न की। हज्जाज बिन यूसुफ़ उस वक़्त मदीने में मौजूद था उसने चाहा कि मकान को गिरा दे मगर जब इस बात की इत्तेला वलीद बिन अब्दुल मलीक को हुई तो उसने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ आमिले मदीना को लिखा कि औलादे उमर बिन ख़त्ताब की रज़ा जोई में कमी न करो और उनका एहतेराम मल्हूफ़े ख़ातिर रखो। अगर वह मकान फ़रोख़्त करने पर राज़ी न हो तो उनके रहने के लिये मकान का एक हिस्सा छोड़ दो और उनकी आमदो रफ़्त के लिये मस्जिद की जानिब एक दरवाज़ा भी रहने दो।

(किताब जज़बुल क़ुलूब पृष्ठ 173 व वफ़ा अल वफ़ा जिल्द 1 पृष्ठ 363)