Day: November 2, 2024
मेरे बाद कोई नबी होता तो (ऐहले’सुन्नत के दोम/2 ख़लीफ़ा) उमर बिन खत्ताब होते! यह झूठी/कमज़ोर हदीस है।
❌मेरे बाद कोई नबी होता तो (ऐहले’सुन्नत के दोम/2 ख़लीफ़ा) उमर बिन खत्ताब होते! यह झूठी/कमज़ोर हदीस है।❌
❌ऐहले’सुन्नत के अक़ाबिरों ने इस हदीस को झूठा/कमज़ोर करार दिया है।❌
अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो वोह उमर बिन खत्ताब होते!
इस हदीस की सेहत और इस पर मेरा एक सवाल!!!!!
उमर बिन खत्ताब के फज़ायल में गढ़ी गई हदीसों में से यह भी एक मनगढ़ंत हदीस है कि नबी-ऐ-क़रीम ﷺ ने फ़रमाया कि मेरे बाद अगर कोई नबी होता तो वोह उमर बिन खत्ताब होते।
यह हदीस सुनन तिर्मिज़ी में है और इमाम तिर्मिज़ी ने इस हदीस को ‘गरीब’ कहा है। तिर्मिज़ी के अलावा यह हदीस बहुत सी कुतबों में है।
यह हदीस सिर्फ़ एक ही सनद से आयी है वोह भी इसमें एक रावी मिसरह बिन हाआन है। इस रावी के बारे में इमाम ज़हबी ने लिखा है कि इमाम इब्ने हिब्बान ने इसे “लईन” यानी लानती करार दिया है और जब क़ाबा शरीफ़ पर हमला हुआ तो यह उस लश्कर में भी शामिल था।
जामे तिर्मिज़ी, जिल्द 2, हदीस नम्बर 3688,
शरह ऐ मिश्कात, जिल्द 7, सफ़ाह नम्बर 415, हदीस नम्बर 5789,
मजमू उज ज़वायद, जिल्द 9, सफ़ाह नम्बर 657, हदीस नम्बर 1433,
मीज़ान उल ऐतदलाल, जिल्द 7, सफ़ाह नम्बर 422, हदीस नम्बर 8555,
मीज़ान उल ऐतदलाल, जिल्द 5, सफ़ाह नम्बर 418, हदीस नम्बर 6756,
फज़ायल ऐ सहाबा, सफ़ाह नम्बर 221, हदीस नम्बर 675-676,
अब इस हदीस की सेहत जानने के बाद भी अगर कोई नही मानता तो मेरा उन लोगों से सवाल है कि:-
अगर यह हदीस सही है तो फ़िर इसमें कोई शक नहीं कि उमर बिन खत्ताब की फज़ीलत सारे सहाबियों पर साबित है तो फ़िर नबी-ऐ-क़रीम ﷺ के बाद लोगों को सकीफ़ा में जमा होने की क्या ज़रुरत थी? लोगों को मिलकर इन्हें पहला खलीफ़ा बना देना चाहिए था और ना बनाकर लोगों ने बहुत बड़ी ग़लती की है!!!!! क्योंकि मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के बाद अगर यह नबी नहीं बन सकते वोह भी सिर्फ़ इसलिए कि मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ खातिमुन्नबी हैं, वरना इन्ही का नम्बर/दर्जा था तो सिलसिला ऐ नबूवत नहीं तो सिलसिला ऐ खिलाफ़त में तो इन्हीं का नम्बर/दर्जा है।
जैसे फ़र्ज़ी खलीफ़ा वैसे फ़र्ज़ी-फ़र्ज़ी लोगों से हदीसें लेकर खुद फ़ंस गये।
❌ऐहले’सुन्नत के अक़ाबिरों ने इस हदीस को झूठा/कमज़ोर करार दिया है।❌ 👇






























आल-ऐ-मोहम्मद ﷺ की एक दिन की मोहब्बत एक साल की इबादत से बेहतर है..

आल-ऐ-मोहम्मद ﷺ की एक दिन की मोहब्बत एक साल की इबादत से बेहतर है..
डॉ ताहिर उल कादरी ने अपनी किताब ‘अल इजाबा फ़ि मनाकिबल क़ुरबा’ के सफ़ाह नं 39 से 40 पर रक़म नंबर 18 के तहत लिखते हैं कि…
“हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद رَضِىَ الـلّٰـهُ عَـنْهُ से रिवायत है कि हुज़ूर नबी अकरम ﷺ ने फ़रमाया कि-
حُبّ ال محمد يومًا خير من عبادة سنة ومن مات عليه دخل الجنة.
“ऐहलैबयत ऐ मुस्तफ़ा ﷺ की एक दिन मोहब्बत पूरे साल की इबादत से बेहतर है और जो इसी मोहब्बत पर फ़ौत हुआ वोह जन्नत में दाखिल होगा।”
– मुस्नद फ़िरदौस (इमाम देलमी),
जखाएरुल उक़बा (इमाम मुहिब्बुद्दीन
तबरी),
अल मवद्दतुल फ़िल कुरबा (सय्यद
हमदानी),
नूरुल अंबसार (इमाम सबलंजी),
फज़ायल ऐ ऐहलैबयत (इमाम जलालुद्दीन
सुयूती),
अल इजाबा फ़ि मनाकिबल क़ुरबा
(डॉ मोहम्मद ताहिर उल कादरी).
हज़रत अमीर ऐ कबीर सय्यद अली हमदानी रह० (मतवफ़्फ़ह 786 हिजरी) की “अल मवद्दतुल फ़िल कुरबा” के सफ़ाह 67 पर रक़म 16 देखें 👇
https://archive.org/details/AlmowadatFilQurbaByAmeerKabeerSyedAliHamadani/page/n67/mode/1up?view=theater
इमाम देलमी (मतवफ़्फ़ह 509 हिजरी) की अल फ़िरदौस की दूसरी जिल्द में सफ़ाह 142 पर रक़म नंबर 2721 देखें 👇
https://archive.org/details/al-firdoos/2_%D8%A7%D9%84%D9%81%D8%B1%D8%AF%D9%88%D8%B3_%D8%A8%D9%85%D8%A7%D8%AB%D9%88%D8%B1_%D8%A7%D9%84%D8%AE%D8%B7%D8%A7%D8%A8_%D9%85%D8%B3%D9%86%D8%AF_%D9%81%D8%B1%D8%AF%D9%88%D8%B3/page/n141/mode/1up?view=theater
माविया पालतू गधा और गुमराह है.
माविया पालतू गधा और गुमराह है.
✍️ अहले हदीस, सलफियों और देवबंदियों के favorite मुवर्रिख इमाम इब्ने तैमिया ने “मिन्हाज उस सुन्नह” की जिल्द नंबर 4 में सफा नंबर 402 पर लिखा है-
وقال أحمد : من لم يربع بعلي في الخلافة فهو أضل من حمار أهله.
यानि “इमाम अहमद बिन हंबल कहते हैं कि जो कोई भी हज़रत अली [अलैहिस्सलाम] की खिलाफत को ना मानें वो घर के पालतू गधों से ज्यादा गुमराह है।”
आप खुद भी इस लिंक्स पर मिन्हाज उस सुन्नह को डाउनलोड कर सकते हैं और इस लिंक्स से सीधे relative page (सफा 402) को पढ़ सकते हैं👇
https://archive.org/details/minhaj_sona/msn4/page/n400/mode/1up?view=theater
इमाम इब्ने तैमिया ने इमाम अहमद बिन हंबल के जिस कौल को नकल किया है उसी इबारत को अहले हदीस के एक और आलिम-ए-दीन शेखुल हदीस मौलाना मुहम्मद अब्दुर्रशीद नोमानी ने अपनी किताब ‘हजरत अली रजि. और किसास ए उस्मान’ में सफा 13 पर अरबी मतन और उसके उर्दू तर्जुमा के साथ नकल किया है कि-
“اسی لئے امام احمد اور دوسرے کابر علما کا قول ہے کہ
من لم يرتع بعـات والخلافة فهواضـل من حمار اهله.
جوحضرت علی رضی اللہ تعالعہ عنہ کو چوتھا خلیفہ نہ مانے وہ اپنے گھر کے گدھے سے زیادہ گم کردہ راہ ہے.”
आप खुद भी देखें सफा नं 13 पर👇
https://archive.org/details/s_024_201809/page/n5/mode/2up
इमाम इब्ने ज़ौजी ने ‘मनाकिब अल इमाम अहमद बिन हंबल’ में सफा नं 220 पर इमाम अहमद का यही कौल नकल किया है।
देखें सफा 220 पर 👇
https://archive.org/details/20200125_20200125_1520/page/n260/mode/1up?view=theater
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इमाम अहमद बिन हंबल (जिसे अहले सुन्नत का हर मसलक अपना इमाम मानता है मगर अहले हदीस सबसे ज्यादा) और इमाम इब्ने तैमिया के फतवों के मुताबिक ये बात वाजेह हो गया है कि- जो हज़रत अली [अलैहिस्सलाम] की खिलाफत को ना मानें वो घर के पालतू गधों से ज्यादा गुमराह है…
और यह बात सभी जानते हैं कि माविया कभी भी मौला अली अलैहिस्सलाम की खिलाफत को नहीं माना इसलिए मौला अली अलैहिस्सलाम को माविया ने कभी अपना अमीरुल मोमिनीन तस्लीम नहीं किया और मौला अली अलैहिस्सलाम से जंग की जैसा कि हजरत शाह अब्दुल हक़ मुहददिस देहलवी रह० ने बहुत साफ लफ्जों में अपनी किताब मदारिज-उन-नबूवत की दूसरी जिल्द में सफा नं 266 पर लिखा है कि- “माविया ने [हजरत अली अलैहिस्सलाम से सुलह के दौरान] कहा कि लफ्ज़ अमीरुल-मोमिनीन काट दो और [सिर्फ अपना नाम] लिखो अली बिन अबी तालिब..,अगर मैं अली को अमीरुल-मोमिनीन जानता तो अली के साथ जंग ना करता और अली की पैरवी व इताआत करता।”
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जाहिर हुआ कि माविया पालतू गधा की तरह और गधे से ज्यादा गुमराह था।
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हदीस : इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम का जहूर


