चौदह सितारे  हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन पार्ट 6

कूफ़े में आपका ख़ुत्बा

किताब लहूफ़ पृष्ठ 68 में है कि कूफ़ा पहुँचने के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) ने लोगों को ख़ामोश रहने का इशारा किया, सब ख़ामोश हो गये, आप खड़े हुए ख़ुदा की हम्दो सना की। हज़रत बनी सालिम का ज़िक्र किया उन पर सलवात भेजी फिर इरशाद फ़रमाया, ऐ लोगों ! जो मुझे पहचानता है वह तो पहचानता ही है, जो नहीं पहचानता उसे मैं बताता हूँ। मैं अली इब्नुल हुसैन बिन अली बन अबी तालिब (अ.स.) हूँ। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसकी बेहुरमती की गई, जिसका सामान लूट लिया गया, जिसके अहलो अयाल क़ैद कर दिये गये। मैं उसका फ़रज़न्द जो साहिले फ़ुरात पर ज़ब्हा कर दिया गया और बग़ैर कफ़न व दफ़न छोड़ दिया गया और शहादते हुसैन (अ.स.) हमारे फ़ख़ के लिये काफ़ी है। ऐ लोगों ! मैं तुम्हे ख़ुदा की क़सम देता हूँ ज़रा सोचो तुम ने ही मेरे पदरे बुज़ुर्गवार को ख़त लिखा और फिर तुम ने ही उनको धोखा दिया, तुम ने ही उनके साथ अहदो पैमान किया और उनकी बैअत की और फिर तुम ने ही उनको शहीद कर दिया । तुम्हारा बुरा हो कि तुम ने अपने लिये हलाकत का सामान इकट्ठा कर लिया, तुम्हारी राहें किस क़द्र बुरी हैं, तुम किन आख़ों से रसूल (स. अ.) को देखोगे। जब रसूल बाज़ पुर्स करेंगे कि तुम लोगों ने मेरी इतरत को क़त्ल किया और मेरे अहले हरम को ज़लील किया “ इस लिये तुम मेरी उम्मत से नहीं ” ।

मस्जिदे दमिश्क़ (शाम) में आपका ख़ुत्बा

मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 135, बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 233, रियाजुल कुद्स जिल्द 2 पृष्ठ 328 और रौज़ातुल अहबाब वग़ैरा में है कि जब हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ. स.) अहले हरम समेत दरबारे यज़ीद में दाखिल किये गये और उनको मिम्बर पर जाने का मौक़ा मिला तो आप मिम्बर पर तशरीफ़ ले गये और अम्बिया की तरह शीरी ज़बान में निहायत फ़साहत व बलाग़त के साथ ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया । ऐ लोगों ! जो मुझे पहचानता है वह तो पहचानता ही है, जो नहीं पहचानता उसे मैं बताता हूँ कि मैं कौन हूँ सुनो मैं अली बिन हुसैन बिन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसने हज किये हैं उसका फ़रज़न्द जिसने तवाफ़े काबा किया है और सई की है। मैं पिसरे ज़मज़म व पृष्ठ हूँ मैं फ़रज़न्दे फ़ात्मा ज़हरा (स. अ.) हूँ मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो पसे गरदन से ज़िब्हा किया गया। मैं उस प्यासे का फ़रज़न्द हूँ जो प्यासा ही दुनिया से उठा। मैं उसका फ़रज़न्द जिस पर लोगों ने पानी बन्द कर दिया हालां कि तमाम मख़लूक़ात पर पानी जायज़ क़रार दिया। मैं मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) का फ़रज़न्द हूँ। मैं उसका फ़रज़न्द जो करबला में शहीद किया गया। मैं उसका फ़रज़न्द जिसके अनसार ज़मीन में आराम की निन्द सो गये मैं उसका पिसर जिसके अहले हरम क़ैद कर दिये गये। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके बच्चे बग़ैर जुर्मों ख़ता ज़िब्हा कर डाले गये। मैं उसका बेटा हूँ जिसके खेमों में आग लगा दी
गई। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो ज़मीने करबला पर शहीद कर दिया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसको न गुस्ल दिया गया और न कफ़न । मैं उसका फ़रज़न्द जिसका सर नोके नैज़ा पर बुलन्द किया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके अहले हरम की करबला में बेहुरमी की गई। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसका जिस्म ज़मीने करबला पर छोड़ दिया गया और सर दूसरे मक़ामात पर नोके नैज़ा पर बुलन्द कर के फिराया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके इर्द गिर्द सिवाए दुश्मन के कोई और न था । मैं उसका फ़रज़न्द जिसके अहले हरम को क़ैद कर के शाम तक फिराया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो बे यारो मददगार था। फिर इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया लोगों ख़ुदा हम को पाँच चीजो से फ़ज़ीलत बख़्शी है। 1. ख़ुदा की क़सम हमारे ही घर से फ़रिश्तों की आमदो रफ़्त रही और हम ही मादने नबूवत व रिसालत हैं। 2. हमारी ही शान में कुरआन की आयतें नाज़िल कीं और हम ने लोगों की हिदायत की। 3. शुजाअत हमारे ही घर की कनीज़ है, हम कभी किसी की कुव्वत व ताक़त से नहीं डरे और फ़साहत हमारा ही हिस्सा है। जब फ़सहा (ज्ञानी) फ़क़रो मुबाहात करे। 4. हम ही सिरातल मुस्तक़ीम और हिदायत का मरकज़ हैं और इसके लिये इल्म का सर चश्मा हैं जो इल्म हासिल करना चाहे और दुनियां के मोमेनीन के दिलों में हमरी मोहब्बत है। 5. हमारे ही मरतबे आसमानों और ज़मीनों में बुलन्द हैं। अगर हम न होते तो ख़ुदा दुनिया ही को पैदा न करता। हर फ़ख़ हमारे फ़ख़ के सामने पस्त है। हमारे दोस्त रोज़े क़यामत सेरो
” ” ” सेराब होंगे और हमारे दुश्मन रोज़े क़यामत बद बख़्ती में होंगे। जब लोगों ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का कलाम सुना तो चीख़ मार कर रोने और पीटने लगे और उनकी आवाज़ें बे साख़्ता बुलन्द होने लगीं। यह हाल देख कर यज़ीद घबरा उठा कि कहीं कोई फ़ितना न खड़ा हो जाये। इसके लिये उसने र अमल में फ़ौरन मोअज्ज़न को हुक्म दिया कि अज़ान शुरू कर के इमाम के ख़ुत्बे को मुकता कर दे। जब मोअज्ज़न गुलदस्ता ए अज़ान पर गया और कहा अल्लाहो अकबर ” (ख़ुदा की जात सब से बुज़ुर्ग व बरतर है) इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया तुने एक बड़ी ज़ात की बढ़ाई बयान की एक अज़ीमुश्शान ज़ात की अज़मत का इज़हार किया और जो कुछ कहा हक़ कहा। फिर मोअज्जन ने कह अश हदोअन ला इलाहा अल्लल्लाह ” ( मैं गवाही देता हूँ कि नहीं कोई माबूद सिवाए अल्ला के) इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैं भी इस मक़सद की हर गवाह के साथ गवाही देता हूँ और हर इन्कार करने वाले के खिलाफ़ इक़रार करता फिर मोअज्जन ने कहा “ अश हदो अन्ना मोहम्मदन रसूल अल्लाह ” ( मैं गवाही देता हूँ कि मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) अल्लाह के रसूल हैं) फ़बका अलीउन यह सुन कर हज़रत अली बिन हुसैन (अ.स.) रो पड़े और फ़रमाया ऐ यज़ीद मैं तुझे ख़ुदा का वास्ता दे कर पूछता हूँ बता हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) मेरे नाना थे या तेरे ? यज़ीद ने कहा आपके । आपने फ़रमाया, फिर क्यों तूने उनके अहले बैत को शहीद किया? यज़ीद ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने महल में ८८ “
” ला हाजतः ली बिल सलवातः मुझे नमाज़ से कोई ” यह कहता हुआ चला गया वास्ता नहीं है। इसके बाद मिन्हाल बिन उमर खड़े हुए और कहा ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आपका क्या हाल है? फ़रमाया ऐ मिन्हाल ऐसे शख़्स का क्या हाल पूछते हो जिसका बाप निहायत बे दर्दी से शहीद कर दिया गया। जिसके मददगार ख़त्म कर दिये गये हों, जो अपने चारों तरफ़ अहले हरम को क़ैद देख रहा हो जिनका न परदा रह गया न चादरें रह गई, जिनका न कोई मद्दगार है। तुम तो देख ही रहे हो कि मैं मुक़य्यद हूँ, ज़लील रूसवा किया गया हूँ, ना कोई मेरा नासिर है न मद्दगार मैं और मेरे अहले बैत लिबासे कुहना में मलबूस हैं, हम पर नये लिबास हराम कर दिये गये हैं। अब जो मेरा हाल पूछते हो तो मैं तुम्हारे सामने मौजूद हूँ तुम देख ही रहे हो हमारे दुश्मन हमें बुरा भला कहते हैं और हम सुब्हो शाम मौत का इन्तेज़ार करते हैं। फिर फ़रमाया अरब व अजम इस पर फ़न करते हैं कि हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) इन में से थे और क़ुरैश अरब पर इस लिये फ़ख़ करते हैं कि आं हज़रत ( स.अ.व.व.) क़ुरैश थे और हम इन के अहले बैत हैं लेकिन हम को क़त्ल किया गया, हम पर ज़ुल्म किया गया, हम पर मुसीबतों के पहाड़ टूट गये और हम को क़ैद कर के दर बदर फिराया गया गोया हमारा हसब बहु गिरा हुआ है और बहुत ज़लील है, गोया हम इज़्ज़तों की बुलन्दी पर नहीं चढ़े और बुज़ुर्गियों के फ़रश पर जलवा अफ़रोज़ नहीं हुए । आज गोया तमाम यज़ीद और इसके लशकर का हो गया आले मुस्तफ़ा (स.अ.व.व.) यज़ीद की अदना गुलाम
हो गई है। यह सुनना था कि हर तरफ़ से रोने पीटने की सदाए बुलन्द हो गईं। यज़ीद बहुत ख़ाएफ़ हुआ कि कोई फ़ितना न खड़ा हो जाए इसने इस शख़्स से ८८ कहा जिसने इमाम को मिम्बर पर तशरीफ़ ले जाने को गया था, वयहका अरदत बसअव दह ज़वाली मलकी ” तेरा बुरा हो तू इनको मिम्बर पर बिठा कर मेरी सलतनत ख़त्म करना चाहता है। इसने जवाब दिया, ब खुदा मैं यह न जानता था 66 कि यह लड़का इतनी बुलन्द गुफ़्तुगू करेगा। यज़ीद ने कहा क्या तू नहीं जानता कि यह अहले बैते नबूवत और मादने रिसालत की एक फ़रद है मोअज्ज़न से न रहा गया और उसने कहा कि ऐ यज़ीद ! ” 66 ” यह सुन कर अज़कान कज़ालका फ़लम्मा क़लत अबाह ” जब तू यह जानता था तो तूने इनके पदरे बुजुर्गवार को क्यों शहीद किया? मोअज्ज़न की गुफ़्तुगू सुन कर यज़ीद बरहम हो गया “ फ़मर बज़र अनक़ह ” और मोअज्ज़न की गरदन मार देने का हुक्म दिया।

मदीने के क़रीब पहुँच कर आपका ख़ुत्बा

मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 88 में है कि एक साल तक क़ैद खाने शाम की सऊबत बरदाश्त करने के बाद जब अहले बैते रसूल (अ.स.) की रिहाई हुई और यह काफ़ला करबला होता हुआ मदीना की तरफ़ चला तो क़रीबे मदीना पहुँच कर इमाम (अ.स.) ने लोगों को ख़ामोश हो जाने का इशारा किया सब के सब ख़ामोश हो गये, आपने फ़रमाया:
हम्द उस ख़ुदा की जो तमाम दुनिया का परवरदिगार है, रोज़े जज़ा का मालिक है। तमाम मख़्लूक़ात का पैदा करने वाला है जो इतना दूर है बुलन्द आसमान से भी बुलन्द है और इतना क़रीब है कि सामने मौजूद है और हमारी बातों को सुनता है। हम ख़ुदा की तारीफ़ करते हैं और उसका शुक्र बजा लाते हैं। अज़ीम हादसों, ज़माने की हौलनांक गरदिशों, दर्द नाक ग़मों, ख़तरनाक आफ़तों शदीद तकलीफ़ों और क़ल्बो जिगर को हिला देने वाली मुसीबतों के नाज़िल होने के वक़्त ऐ लोगों ! खुदा और सिर्फ़ खुदा के लिये हम्द है। हम बड़े बड़े मसाएब में मुबतिला किए गए, दीवारे इस्लाम में बहुत बड़ा रखना ( शिग़ाफ़ ) पड़ गया। हज़रत अबू अब्दुल्लाह हुसैन (अ.स.) और उनके अहले बैत शहीद कर दिये गये। इनकी औरतें और बच्चे क़ैद कर दिये गये और लशकरे यज़ीद ने इनके सर हाय मुबारक को बुलन्द नैजों पर रख कर शहरों में फिराया । यह वह मुसीबत है जिसके बराबर कोई मुसीबत नहीं । ऐ लोगों ! तुम में से कौन मर्द है जो शहादते हुसैन (अ.स.) के बाद खुश रहे या कौन सा दिल है जो शहादते हुसैन (अ. स.) से ग़मगीन न हो या कौन सी आंख है जो आंसू को रोक सके। शहादते हुसैन (अ.स.) पर सातों आसमान रोए । समन्दर और उसकी मौजे रोईं, आसमान और उसके अरकान रोए, ज़मीन और उसके अतराफ़ रोए । दरख़्त और उसकी शाखें रोईं, मछलियां और समन्दर के गिरदाब रोए । मलाएक मुक़रेबीन और तमाम आसमान वाले रोए । ऐ लोगों ! कौन सा कल्ब है जो शहादते हुसैन (अ.स.) की ख़बर सुन कर फट न जाए। कौन सा कल्ब है जो
महजून न हो। कौन सा कान है जो इस मुसीबत को सुन कर जिससे दीवारे इस्लाम में रखना पड़ा, बहरा न हो । ऐ लोगों ! हमारी यह हालत थी कि हम कशाँ कशाँ फिराये जाते थे। दर बदर ठुकराए जाते थे। ज़लील किए गये शहरों से दूर थे गोया हम को औलादे तुर्क दकाबिल समझ लिया गया था हालां कि न हम ने कोई जुर्म किया था न किसी की बुराई का इरतेक़ाब किया था न दीवारे इस्लाम में कोई रखना डाला था और न इन चीज़ों के खिलाफ़ किया था जो हम ने अपने आबाओ अजदाद से सुना था, ख़ुदा की क़सम अगर हज़रत नबी (स. अ.) भी इन लोगों ( लशकरे यज़ीद) को हम से जंग करने के लिये मना करते तो यह न मानते जैसे कि हज़रत नबी (स.अ.) ने हमारी वसीअत का ऐलान किया और इन लोगों ने न माना बल्कि जितना उन्होंने किया है इस से ज़्यादा सुलूक करते। हम ख़ुदा के लिये हैं और खुदा की तरफ़ हमारी बशाग़त है।




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