
आपका इस्मे गेरामी
इमाम शिब्लन्जी लिखते हैं कि विलादत के बाद सरवरे कायनात ( स.व.व.अ.) ने इमाम हुसैन (अ.स.) की आंखों में लोआबे दहन लगाया और अपनी ज़बान उनके मूंह में दे कर बड़ी देर तक चुसाया इसके बाद दाहिने कान में अज़ान और बायें में अक़ामत कही फिर दुआए ख़ैर फ़रमा कर हुसैन नाम रखा। (नूरूल अबसार पृष्ठ 113) उलेमा का बयान है कि यह नाम इस्लाम से पहले किसी का भी नहीं था। वह यह भी कहते हैं कि यह नाम ख़ुदा ख़ुदा वन्दे आलम का रखा हुआ है। (अरजहुल मतालिब व रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 236 ) किताब आलाम अल वरा तबरसी में है कि यह नाम भी दीगर आइम्मा के नामों की तरह लौहे महफ़ूज़ में लिखा हुआ है।
आपका अक़ीक़ा
इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम रखने के बाद सरवरे कायनात ( स.व.व.अ.) ने हज़रत फ़ात्मा (अ.स.) से फ़रमाया कि बेटी जिस तरह हसन (अ.स.) का अक़ीक़ा किया गया है उसी तरह इसके अक़ीक़े का भी इन्तेज़ाम करो और इसी तरह बालों के हम वज़न चांदी तसद्दुक़ करो जिस तरह हसन (अ.स.) के लिये कर चुकी हो । अल ग़रज एक मेंढा मंगवाया गया और रस्मे अक़ीक़ा अदा कर दी गई। (मतालेबुस सूऊल सुनन 241)
बाज़ माअसरीन ने अक़ीक़े के साथ ख़त्ने का ज़िक्र किया है जो मेरे नज़दीक क़तअन ना क़ाबिले क़ुबूल है क्यों कि इमाम का मख़्तून पैदा होना मुसल्लेमात से है।
कुन्नियत व अलक़ाब
आपकी कुन्नियत सिर्फ़ अबु अब्दुल्लाह थी अल बत्ता अलक़ाब आपके बेशुमार हैं जिनमें सय्यद, सिब्ते असग़र शहीदे अकबर और सय्यदुश शोहदा ज़्यादा मशहूर हैं। अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई का बयान है कि सिब्ते और सय्यद ख़ुद रसूले करीम (स.व.व.अ.) के मोअय्यन करदा अलक़ाब हैं। (मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 321)
आपकी रज़ाअत
उसूले काफ़ी बाब मौलूदुल हुसैन (अ. स.) पृष्ठ 114 में है कि इमाम हुसैन (अ. स.) ने पैदा होने के बाद न हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) का शीरे मुबारक नोश किया और न किसी दाई का दूध पिया । होता यह था कि जब आप भूखे होते तो सरवरे कायनात तशरीफ़ ला कर ज़बाने मुबारक दहने अक़दस में दे देते थे और इमाम हुसैन (अ.स.) उसे चूसने लगते थे। यहां तक कि सेरो सेराब हो जाते थे। मालूम होना चाहिये कि इसी से इमाम हुसैन (अ.स.) का गोश्त पोस्त बना और लोआबे दहने रिसालत से हुसैन (अ.स.) परवरिश पा कर कारे रिसालत अंजाम देने
की सलाहियत के मालिक बने। यही वजह है कि आप रसूले करीम ( स.व.व.अ.) से बहुत मुशाबेह थे। (नूरूल अबसार पृष्ठ 113)
ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से विलादते इमाम हुसैन (अ. स.) की तहनियत व ताज़ियत
अल्लामा हुसैन वाएज़ काशेफ़ी रक़म तराज़ हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) की विलादत के बाद ख़ल्लाक़े आलम ने जिब्राईल को हुक्म दिया कि ज़मीन पर जा कर मेरे हबीब मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स.व.व.अ.) को मेरी तरफ़ से हुसैन (अ.स.) की विलादत पर मुबारक बाद दे दो और साथ ही साथ उनकी शहादते उज़मा से भी उन्हें मुत्तला कर के ताज़ियत अदा कर दो। जनाबे जिब्राईल ब हुक्मे रब्बे जलील ज़मीन पर वारिद हुए और उन्होंने आं हज़रत (अ.स.) की खिदमत में पहुँच कर तहनियत अदा की। इसके बाद अर्ज़ परदाज़ हुए कि ऐ हबीबे रब्बे करीम आपकी खिदमत में शाहदते हुसैन (अ.स.) की ताज़ियत भी मिन जानिब अल्लाह अदा की जाती है। यह सुन कर सरवरे कायनात का माथा ठन्का और आपने पूछा कि जिब्राईल माजेरा क्या है? तहनियत के साथ ताज़ियत की तफ़सील बयान करो। जिब्राईल (अ.स.) ने अर्ज़ की एक वह दिन होगा जिस दिन आपके इस चहिते फ़रज़न्द “ हुसैन के गुलूए मुबारक पर ख़न्जरे आबदार रखा जायेगा और आपका “
मैदाने करबला में यक्काओ तन्हा तीन दिन का
यह नूरे नज़र बे यारो मद्दगार भूखा प्यासा शहीद होगा। यह सुन कर सरवरे आलम (अ. स.) महवे गिरया हो गये। आपके रोने की ख़बर ज्यों ही अमीरल मोमेनीन (अ.स.) को पहुँची वह भी रोने लगे आलमे गिरया में दाखिले खाना ए सय्यदा हो गए। जनाबे सय्यदा (अ.स.) ने जो हज़रत अली (अ.स.) को रोता देखा तो दिल बेचैन हो गया। अर्ज़ कि अबुल हसन रोने का सबब क्या है? फ़रमाया बिन्ते रसूल (अ. स.) अभी जिब्राईल आये हैं और वह हुसैन की तहनियत के साथ साथ उसकी शहादत की ख़बर भी दे गये हैं हालात से बा ख़बर होने के बाद फ़ात्मा का गिरया गुलूगीर हो गया। आपने हुज़ूर (स.व.व.अ.) की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ कि बाबा जान यह कब होगा? फ़रमाया जब न मैं हूंगा न तुम होगी न अली होंगे न हसन होंगे। फ़ात्मा (अ.स.) ने पूछा बाबा मेरा बच्चा किस ख़ता पर शहीद होगा ? फ़रमाया फ़ात्मा (स.व.व.अ.) बिल्कुल बे जुर्म व बे ख़ता सिर्फ़ इस्लाम की हिमायत में शहीद होगा। फात्मा ( स.व.व.अ.) ने अर्ज़ कि बाबा जान जब हम में से कोई न होगा तो इस पर गिरया कौन करेगा और उसकी सफ़े मातम कौन बिछायेगा ।
रावी का बयान है कि इस सवाल का हज़रत रसूले करीम (स.व.व.अ.) अभी जवाब न देने पाये थे कि हातिफ़े ग़यबी की आवाज़ आई, ऐ फ़ात्मा ग़म न करो, तुम्हारे इस फ़रज़न्द का ग़म अब्द उल आबाद तक मनाया जायेगा और इसका मातम क़यामत तक जारी रहेगा।
एक रवायत में है कि रसूल करीम ( स.व.व.अ.) ने फ़ात्मा के जवाब में यह फ़रमाया था कि ख़ुदा कुछ लोगों को हमेशा पैदा करता रहेगा, जिसके बूढ़े, बूढ़ों पर और जवान जवानों पर और बच्चे बच्चों पर और औरतें औरतों पर गिरया व ज़ारी करते रहेंगे।
फ़ितरूस का वाक़या
अल्लामा मज़कूर बाहवालाए हज़रत शेख़ मुफ़ीद अल रहमा रक़म तराज़ हैं कि इसी तहनियत के सिलसिले में जनाबे जिब्राईल बे शुमार फ़रिश्तों के साथ ज़मीन की तरफ़ आ रहे थे। नागाह उनकी नज़र ज़मीन के एक ग़ैर मारूफ़ तबके पर पड़ी, देखा कि एक फ़रिश्ता ज़मीन पर पड़ा हुआ ज़ारो क़तार रो रहा है। आप उसके क़रीब गए और आपने उससे माजरा पूछा। उसने कहा ऐ जिब्राईल मैं वही फ़रिश्ता जो पहले आसमान पर सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की क़यादत करता था। मेरा नाम फ़ितरूस है। जिब्राईल ने पूछा तुझे यह किस जुर्म की सज़ा मिली है? उसने अर्ज़ की, मरज़ीए माबूद के समझने में एक पल की देरी की थी, जिसकी यह सज़ा भुगत रहा हूँ। बालो पर जल गए हैं, यहां कुंजे तन्हाई में पड़ा हूँ। ऐ जिब्राईल ख़ुदारा मेरी कुछ मद्द करो। अभी जिब्राईल जवाब न देने पाये थे कि उसने सवाल किया, ऐ रूहुल अमीन आप कहां जा रहे हैं? उन्होंने फ़रमाया कि नबी आख़ेरूज़ ज़मां हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स.व.व.अ.) के यहां एक फ़रज़न्द पैदा हुआ है
जिसका नाम ” हुसैन ” है। मैं ” है । मैं ख़ुदा की तरफ़ से उसकी अदाए तहनियत के लिये जा रहा हूँ। फ़ितरूस ने अर्ज़ कि ऐ जिब्राईल ख़ुदा के लिये मुझे अपने हमराह लेते चलो, मुझे इसी दर से शिफ़ा और नजात मिल सकती है। जिब्राईल उसे साथ ले कर हुज़ूर की खिदमत में उस वक़्त पहुँचे जब कि इमाम हुसैन (अ. स.) आग़ोशे रसूल (स.व.व.अ.) में जलवा फ़रमा रहे थे। जिब्राईल ने अर्ज़े हाल किया। सरवरे कायनात (स.व.व.अ.) ने फ़रमाया कि फ़ितरूस के जिस्म को हुसैन (अ.स.) के जिस्म से मस कर दो, शिफ़ा हो जायेगी । जिब्राईल ने ऐसा किया और फ़ितरूस के बालो पर उसी तरह रोईदा हो गये जिस तरह पहले थे। वह सेहत पाने के बाद फ़ख़ो मुबाहात करता हुआ अपनी मंज़िले असली आसमाने सेयुम पर जा पहुँचा और मिसले साबिक़ सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की क़यादत करने लगा।
बाद अज़ शहादते हुसैन (अ.स.) चूँ बरां क़ज़िया मतला शुद
यहां तक कि वह ज़माना आया जिसमें इमाम हुसैन (अ. स.) ने शहादत पाई और इसे हालात से आगाही हुई तो उसने बारगाहे अहदियत में अर्ज़ कि “ मालिक मुझे इजाज़त दी जाय कि मैं ज़मीन पर जा कर दुश्मनाने हुसैन (अ. स.) से जंग करूं। इरशाद हुआ कि जंग की कोई ज़रूरत नहीं अलबत्ता तू सत्तर हज़ार फ़रिश्ते ले कर ज़मीन पर चला जा और उनकी क़ब्रे मुबारक पर सुबह व शाम गिरया ओ मातम किया कर और इसका जो सवाब हो उसे उनके रोने वालों पर हिबा कर दे। चुनान्चे फ़ितरूस ज़मीने करबला पर जा पहुँचा और ता क़याम क़यामत शबो रोज़ रोता
रहेगा। ” (रौज़तुल शोहदा अज़ 236 ता पृष्ठ 238 प्रकाशित बम्बई 1385 हिजरी व ग़नीमतुल तालेबीन शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी)

