चौदह सितारे पार्ट 68

इमाम हसन (अ.स.) और तफ़सीरे क़ुरआन

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई बा हवाला ए तफ़सीर वसीत वाहिदी लिखते हैं कि एक शख़्स ने इब्ने अब्बास और इब्ने उमर से एक आयत से मुताअल्लिक ८८

८८ ” शाहिद व मशहूद ” के मानी दरयाफ़्त किये। इब्ने अब्बास ने शाहिद से यौमे जुमा और मशहूद से यौमे अरफ़ा बताया और इब्ने उमर ने यौमे जुमा और यौमुल नहर कहा। इसके बाद वह शख़्स इमाम हसन (अ.स.) के पास पहुँचा। आपने शाहिद से रसूले ख़ुदा (स.व.व.अ.) और मशहूद से यौमे क़यामत फ़रमाया और दलील से आयत पढ़ी। 1. या अय्योहन नबी अना अरसलनाका शाहिदो मुबशशिरो नज़ीरा ऐ नबी हम ने तुम को शाहिदो मुबशशिर और नज़ीर बना कर भेजा। 2. “ ज़ालेका यौमे मजमूआ लहा अन्नास व ज़ालेका यौमे मशहूद ” क़यामत का वह दिन होगा, जिसमें तमाम लोग एक मक़ाम पर जमा कर दिये जायेंगे और यही यौमे मशहूर है। साएल ने सब के जवाब सुन्ने के बाद कहा फ़काना का ैल अल हसन अहसन ” इमाम हसन (अ. स.) का जवाब दोनों से कहीं बेहतर है। (मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 225) “

इमाम हसन (अ.स.) की साया ए रहमत से महरूमी

मुर्रेख़ीन का बयान है कि इमाम हसन (अ.स.) की उम्र जब सात 7, साल पांच 5, माह और तेरह 13 दिन की हुई तो आपके सर से रहमतुल लिल आलेमीन का साया 28 सफ़र 11 हिजरी को उठ गया। अभी आप नाना का सोग मनाने से फ़राग़त हासिल न कर सके थे कि 3 जमादिउस्सानी 11 हिजरी को आपकी वालेदा
माजेदा हज़रत फ़ात्मा ज़हरा ( स.व.व.अ.) ने भी इन्तेक़ाल फ़रमाया । इस गाम बालाए ग़म ने इमाम हसन (अ.स.) को बे इन्तेहा सदमा पहुँचाया।

मुशहबेहते रसूल (स.अ.व.व.)

अल्लामा अली मुत्तक़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रते अली (अ.स.) फ़रमाया करते थे कि हसन रसूले करीम (स. अ.) की शक्लो शबाहत से बहुत ज़्यादा मुशाबेह है। अनस बिने मालिक का बयान है कि इमाम हसन (अ. स.) के जिस्म का निस्फ़ बालाई हिस्सा रसूल अल्लाह ( स.व.व.अ.) से और निस्फ़ हिस्सा ज़ेरी अमीरल मोमेनीन (अ.स.) से मुशाबेहत है।

एक रवायत में है कि आं हज़रत ( स.व.व.अ.) फ़रमाया करते थे कि हसन में ख़ुदा ने हैबत और सरदारी और हुसैन में जुर्रत व हिम्मत वदीअत की है। (कन्जुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 107)

इमाम हसन (अ.स.) की इबादत

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) फ़रमाते हैं कि इमाम हसन (अ. स.) ज़बरदस्त आबिद बेमिसाल ज़ाहिद, अफ़ज़ल तरीन आलिम थे। आप ने जब भी हज फ़रमाया पैदल फ़रमाया। कभी कभी पा बरहैना हज को जाते थे। आप अकसर मौत, अज़ाबे क़ब्र, सिरात और बेअसत व नशूर को याद कर के रोया करते थे। जब आप वज़ू करते थे तो आपके चेहरे का रंग ज़र्द हो जाया करता था और जब नमाज़ के लिये खड़े होते थे तो बेद की मिस्ल कांपने लगते थे। आपका मामूल था कि जब दरवाज़ए मस्जिद पर पहुँचते तो खुदा को मुखातिब करके कहते, मेरे पालने वाले तेरा गुनाहगार बन्दा तेरी बारगाह में आया है ऐ रहमानों रहीम अपनी अच्छाईयों के सदक़े में मुझ जैसे बुराई करने वाले को माफ़ कर दे। आप जब नमाज़े सुबह से फ़ारिग़ होते थे तो उस वक़्त तक वजाएफ़ में मशगूल रहते थे जब तक सूरज तुलू न हो जाये । ( रौज़ातुल वाएज़ीन व बेहारूल अनवार)

आपका जोहद

इमाम शाफ़ेई लिखते हैं कि इमाम हसन (अ. स.) ने अक्सर अपना सारा माल राहे ख़ुदा में तकसीम कर दिया और बाज़ मरतबा निस्फ़ माल तक़सीम फ़रमाया। वह अज़ीम ज़ाहिदो परहेज़गार थे।