
सुलह हसन (अ.स.) और जंगे हुसैन (अ. स.)
सुलह और जंग दो मुतज़ात मुताबइन लफ़्ज़ हैं। सुलह का लफ़ज़ कलामे अरब में उस वक़्त इस्तेमाल होता है जब फ़साद बाक़ी न रहे और मुसालेह उस क़रारदाद को कहते हैं जिससे नज़ा दूर हो जाय और साहेबाने सियासत के नज़दीक़ सुलह उसको कहते हैं जिसके बाद कुछ शरारत पर लड़ाई रोक दी जाय। (सवानेह इमाम
हसन पृष्ठ 99 बा हवालाए मोअज्जम अल तालिब पृष्ठ 555 ) और जंग उसे कहते हैं जिसके दामन में सुलह का इम्कान न हो। सुलह इम्काने जंग मफ़्कूद होने पर और जंग इमकाने सुलह के फ़क़दान पर होती है और इस इम्कान और अदम इमकान नीज़ मौक़े के समझने का हक़ साहबे मामेला को होता है। यही वजह है कि आं हज़रत ( स.व.व.अ.) ने मौके सुलह पर सुलह हुदैबिया किया और मौक़ाए जंग पर बेशुमार जेहाद किये और हज़रत अली (अ.स.) ने मौक़ाए सुलह में ख़ामोशी और गोशा नशीनी इख़्तेयार की और मौक़ाए जंग में जमल और सिफ़्फ़ीन का कारनामा पेश किया।
इमाम हसन (अ.स.) के लिये जंग मुम्किन न थी इस लिये उन्होंने सुलह की और इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये सुलह मुम्किन न थी इस लिये उन्होंने जंग की और अज़ रूए हदीस अपने मक़ाम पर दोनों अमल सहीह और मम्दूह हुये। १७७ 2,छं,| यह दोनों इमाम हसन (अ. स.) और इमाम हुसैन (अ. स.) हर हाल में वाजिब अल इताअत हैं चाहे जंग करें या सुलह । (बेहार) यानी दोनों के हालात और सवालात में फ़र्क़ था। इमाम हसन (अ.स.) के पास उस वक़्त बिल्कुल मुईन व मददगार न थे। जब माविया ने ख़लऐ खिलाफ़त का सवाल किया था नीज़ माविया का सवाल यह था कि खिलाफ़त छोड़ दो या अपनी और अपने मानने वालों की तबाही व बरबादी बरदाश्त करो। इमाम हसन (अ.स.) ने हालात की रौशनी में खिल खिलाफ़त को मुनासिब समझा और सुलह कर ली। आप इरशाद फ़रमाते थे “
” फ़क़द तराकतोहू लम इरादतन ले इसलाहल उम्मता व हक़ देमाअल मुसलमीन मैंने ख़िलाफ़त जान बूझ कर इस लिये तर्क कर दी ताकि इस्लाह व सुकून हो सके और ख़ून न बहे | (कामिल व बेहार)
इमाम हुसैन (अ.स.) के पास बेहतरीन जां निसार जां बाज़ मौजूद थे और यज़ीद का सवाल यह था कि बैअत करो या सर दो। (तबरी रौज़तुल सफ़ा) इमाम हुसैन (अ. स.) ने हालात की रौशनी में सर देने को मुनासिब समझा और बैअत से इन्कार कर के जंग के लिये तैय्यार हो गये।
यक़ीन करना चाहिये कि अगर इमाम हसन (अ.स.) से भी बैअत का सवाल होता तो वह भी वहीं कुछ करते जो इमाम हुसैन (अ.स.) ने किया है। आपके मददगार होते या न होते, क्यों कि आले मोहम्मद (अ. स.) किसी ग़ैर की बैयत हरामे मुतलक़ समझते थे। अल्लामा जलाल हुसैनी मिसरी ने “अल हुसैन’ , बा हवालाए वाक़ेए हिर्रा लिखा है कि वाक़ेए करबला के बाद किसी हुकूमत ने आले मोहम्मद के किसी अहद में बैअत का सवाल नहीं किया।
बा हुक्मे हक़ कहीं सुलह कर लेते हैं दुश्मन से ।
कहीं पर जंगे खामोशी जवाबे संग होती है ।।
जमाना यह सबक़ ले फ़ात्मा के दिल के टुकड़ों से।
कहां पर सुलह होती है कहां पर जंग होती है । ।
इमाम हसन (अ. स.) पर कसरते अज़वाज का इल्ज़ाम यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.व.व.अ.) की जद्दोजेहद और अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की सई व कोशिश से इसलाम दुनिया में फैला जो लोग इब्तेदाए बेसत में मुसलमान हुये और जिन्होंने हयाते पैग़म्बर तक इस्लाम क़ुबूल किया उनके मज़हबी इन्केलाब में हज़रत अली (अ.स.) के दस्ते बाज़ू का बड़ा दखल है। उमवी और अब्बासी नस्लों में इस्लाम की दरामद और अली (अ.स.) की जेहादी कुव्वत रहीने मिन्नत है। ज़रूरत थी कि इन नस्लों के चश्मों चिराग़ जब आगे चल कर फ़रोग़ पाते तो अली (अ.स.) का क़सीदा पढ़ते, क्यों कि उन्हीं के सदक़े में उन्हें सिराते मुस्तकीम नसीब हुई थी लेकिन यह होता उसी वक़्त जब कि बा जबरो इक़राह इस्लाम क़बूल न किया होता। यहां हाल यह था ज़बान पर अल्लाह दिल में बागड़ बिल्ला यही वजह है कि नस्लों की हर फ़र्द ने फ़रोग़ पाते ही मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स.व.व.अ.) और उनकी आले पाक की मुखालेफ़त अपना शेवा बना लिया था । अमीरे माविया जो बक़ौले मुवर्रेख़ीन इस्लाम व फ़िरंग, सियाना, बदनियत गुनाहों से बे परवाह, खुदा से बे खौफ़ था । ( महाज़राते असफ़हानी, तारीख़े अमीर अली) को नहीं इक़तेदार हासिल हुआ। उसने आले मोहम्मद (अ.स.) को तबाह करने के लिये वह तमाम मसाएल मोहय्या किये जिनके बाद बानिये इस्लाम और उनकी आल की इज़्ज़त व आबरू, जान माल का तहफ़्फ़ुज़ ना मुमकिन सा हो गया। जंगे जमल व सिफ़्फ़ीन वग़ैरा इसकी चीरा दस्तियों से रूनूमां हुई। इमाम
हसन (अ.स.) की सुलह इसी की ज़्यादतियों का नतीजा थीं मुवर्रेख़ीन का बयान है कि सुलह हसन (अ.स.) के बाद माविया मुसल्लेमुल सुबूत बादशाह बन गया। फिर इसने अपनी ताक़त के ज़ोर से मोहम्मद ( स.व.व.अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.) के खिलाफ़ हदीसों के गढ़ने और तारीख़ का धारा मोड़ने की मुहिम शुरू कर दी और मोहम्मद ( स.व.व.अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.) को बदनाम करने में कोई दक़ीक़ा फ़रो गुशात नहीं किया। इस मौके पर चन्द चीज़ों की तरफ़ इशारा करता हूँ ।
1. पैग़म्बरे इस्लाम (स.व.व.अ.) को मेराजे जिस्मानी नहीं हुई। (शरह शिफ़ा)
2. आप में जिन्सी हवस इस दर्जा थी कि शबो रोज़ अपनी ग्यारह बीवियों के पास जाते थे। (सम्त अल शमीम महिब, तबरी जिल्द 2, पृष्ठ 94 तबआ हलब)
3. आपके दिल पर अक्सर पर्दे पड़ जाया करते थे। (सही मुस्लिम व अबू दाऊद ) 4. आपकी चार लड़कियां थीं। (तवारीख़े इस्लाम)
5. आप के बाप दादा काफ़िर थे और आखिर वक़्त तक मुसलमान न हुये ।
6. उस्मान ग़नी जुन्नुररैन थे।
7. अबू तालिब बिल्कुल मुफ़लिस थे।
8. अली ने उस्मान को क़त्ल किया।
9. अली बहुत ज़बरदस्त डाकू थे। (मरऊजे अल ज़हब मसअवी )
10. अली व फ़ात्मा नमाज़े सुबह नहीं पढ़ते थे। (हयातुल औलिया, जिल्द 3 पृष्ठ 144 तबाअ मिस्र 1933 ई0)
11. अली की बेटी उम्मे कुलसूम का अक़द ख़लीफ़ाए दोयम से हुआ था। 12. अफ़सानए सकीना बिन्तुल हुसैन, इमाम हसन की कसरते अज़वाज और कसरते तलाक़ का अफ़साना भी ऐसी नस्ले बनी उमय्या ख़ुसूसन माविया की पैदावार है। खिलाफ़त को छोड़ने के बवजूद वह इसके दस्ते ज़ुल्म से महफ़ूज़ नहीं रह सके। मुख़्तलिफ़ क़िस्म के इलज़ामात उन पर हज़बे आदत लगते रहे और फिर इन तमाम चीज़ों को तवारीख़ और अहादीस में जगह देने की सई करता रहा उसके बाद ज़रा सुकून हासिल करते ही किताब अल इख़बारूल माज़ीयीन तदवीन कराई और इसमें उल्टी सीधी बातें लिखवा दीं।



