चौदह सितारे पार्ट 72

शरारते सुलह का हशर

मुर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि अमीरे माविया जो मैदाने सियासत का खिलाड़ी और मकरो जौर की सलतनक का ताजदार था इमाम हसन (अ.स.) से वादा और [E मुहायदा के बाद ही सब से मुकर गया । वलमयफ़ लहु मावीयतालयाअ महाआहद अलैह ” तारीखे कामिल इब्ने असीर जिल्द 3 पृष्ठ 162 में है कि माविया ने किसी एक चीज़ की भी परवाह न की और किसी पर अमल न किया। इमाम अबुल हसन अली बिन मोहम्मद लिखते हैं कि जब माविया के लिये अमरे सलतनत उसतवार हो गया तो इस ने अपने हाकिमों को जो मुख़्तलिफ़ शहरों और इलाकों में थे, यह फ़रमान भेजा कि अगर कोई शख़्स अबु तुराब और उसके अहले बैत की फ़ज़ीलत की रवायत करेगा तो मै उससे बरीउज्ज़िम्मा हूं। जब यह ख़बर तमाम मुल्कों में फैल गई और लोगों को माविया का मंशा मालूम हो गया तो तमाम ख़तीबों ने मिम्बर पर से सब्बो शितम और मनक़सते अमीरल मोमेनीन पर ख़ुत्बा देना शुरू कर दिया। कूफ़े में ज़्याद इब्ने अबीहा जो कई बरस तक हज़रत अली (अ.स.) के अहद में उनके अलम में रह चुका था वह शीआने अली को अच्छी तरह से जानता था। मर्द, औरतों, जवानों और बूढ़ों से अच्छी तरह आगाह था इसे हर एक रहाईश और कोनों और गोशों में बसने वालों का पता था। इसे कूफ़े और बसरे दोनों का गर्वनर बना दिया गया था। इसके ज़ुल्म की हालत यह थी कि शियाने अली को क़त्ल करता और बाज़ों की आंखों को फोड़ देता और बाज़ों के हाथ पांव कटवा देता था। इस ज़ुल्में अज़ीम से सैकड़ों तबाह हो गये। हज़ारों जंगलों और पहाड़ों में जा छुपे । बसरे में आठ हज़ार आदमियों का क़त्ल वाके हुआ जिनमें बैयालिस हाफ़िज़ और क़ारीये कुरआन थे। इन पर मोहब्बते अली का जुर्म आयद किया गया था। हुक्म यह था कि अली (अ.स.) के बजाय उस्मान के फ़ज़ाएल बयान किये जायें और अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल के मुताअल्लिक यह फ़रमान था कि एक फ़ज़ीलत के एवज़ दस दस मुनक़सत व मज़म्मत तसनीफ़ की जाए यह सब कुछ अमीरल मोमेनीन (अ. स.) से बदला लेने और यज़ीद के लिये ज़मीने खिलाफ़त हमवार करने की ख़ातिर था ।

कूफ़े से इमाम हसन (अ.स.) की मदीने को रवानगी सुलह के मराहिल तय होने के बाद इमामे हसन (अ.स.) अपने भाई इमाम हुसैन (अ. स.) और अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र और अपने अतफ़ाल व अयाल को ले कर मदीने की तरफ़ रवाना हो गये।
तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन की जिल्द 1 पृष्ठ 34 में है कि जब आप कूफ़े से मदीना के लिये रवाना हुए तो माविया ने रास्ते में एक पैग़ाम भेजा और वह यह था कि आप ख़्वारिज से जंग करने के लिये तय्यार हो जायें क्यों कि उन्होंने मेरी बैयत होते ही फिर सर निकाला है। इमाम हसन (अ.स.) ने जवाब दिया कि अगर खूंरेज़ी मक़सूद होती तो मैं तुझ से क्यों सुलह करता। जस्टिस अमीर अली अपनी तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि ख़्वारिज हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर को मानते और हज़रत अली (अ.स.) और उस्मान ग़नी को नहीं तसलीम करते थे और बनी उमय्या को मुरतिद कहते थे।

सुलह हसन (अ. स.) और उसकी वजह व असबाब

उस्ताजुल आलाम हज़रत अल्लामा सय्यद अदील अख़्तर आलल्लाहो मक़ामा (साबिक़ प्रिन्सपल मदरसातुल वाएज़ीन लखनऊ ) अपनी किताबे तसकीन अल फ़तन फ़ी सुलह अल हसन के पृष्ठ 158 में तहरीर फ़रमाते हैं

इमामे हसन (अ.स.) की पालीसी बिल्कुल जैसा कि बार बार लिखा जा चुका है कुल अहले बैत की पालीसी एक और सिर्फ़ एक थी। (विरासत अल बैब पृष्ठ 249) वह यह कि हुक्मे खुदा और हुक्मे रसूल (स.व.व.अ.) की पाबन्दी उन्हीं के एहकाम का इजरा चाहिए हैं। इस मतलब के लिये जो बरदाश्त करना पडे, मज़कूरा बाला हालात में इमाम हसन (अ.स.) के लिये सिवाए सुलह क्या चारा हो सकता था।इसको ख़ुद साहेबाने अक़्ल समझ सकते हैं। किसी इस्तेदलाल की चन्दा ज़रूरत नहीं है। यहां पर अल्लामा इब्ने असीर की यह इबारत (जिसका तरजुमा दर्ज किया जाता है) काबिलेगौर है।

कहा गया है कि इमाम हसन (अ. स.) ने हुकूमत माविया को इस लिये सुर्पुद की जब माविया ने ख़िलाफ़त हवाले करने के मुताअल्लिक़ आपको ख़त लिखा उस वक़्त आपने ख़ुत्बा पढ़ा और खुदा की हम्दो सना के बाद फ़रमाया कि देखो हम को शाम वालों से इस लिये नहीं दबना पड़ रहा है कि अपनी हक़ीक़त में कोई शक या निदामत है। बात तो फ़क़त यह है कि हम अहले शाम से सलामत और सब्र के साथ लड़ रहे थे, मगर अब सलामत में अदावत और सब्र मे फ़रियाद मख़्लूत कर दी गई है। जब तुम लोग सिफ़्फ़ीन को जा रहे थे उस वक़्त तुम्हारा दीन तुम्हारी दुनिया पर मुक़द्दम था लेकिन अब तुम एक से हो गये हो कि आज तुम्हारी दुनिया तुम्हारे दीन पर मुक़द्दम हो गई है। इस वक़्त तुम्हारे दोनों तरफ़ दो क़िस्म के मक़तूल हैं। एक सिफ़्फ़ीन के मक़तूल जिन पर रो रहे हो दूसरे नहरवान के मक़तूल जिनके ख़ून का बदला चा रहे हो । खुलासा यह कि जो बाक़ी है वह साथ छोड़ने वाला है और जो रो रहा है वह बदला लेना ही चाहता है। ख़ूब समझ लो कि माविया ने हम को जिस अम्र की दावत दी है न इसमें इज़्ज़त है और न इन्साफ़ लेहाज़ा अगर तुम लोग मौत पर आमादा हो तो हम इसकी दावत रद कर दें और हमारा इसका फ़ैसला खुदा के नज़दीक़ भी तलवार की बाढ़ से हो जाये और
अगर तुम ज़िन्दगी चाहते हो तो जो इसने लिखा है मान लिया जाय और जो तुम्हारी मरज़ी है वैसा हो जाय। यह सुनना था कि हर तरफ़ से लोंगो ने चिल्लाना शुरू कर दिया, बक़ा लक़ा, सुलह सुलह । ” ( तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 162)

कारेईन इंसाफ़ फ़रमाइये कि क्या अब भी इमाम हसन (अ.स.) के लिये यह राय है कि सुलह न करे। इन फ़ौजियों के बल बूते पर ( अगर ऐसों को फ़ौज और उनकी कुव्वतों को बल बूता कहा जा सके) लड़ाई ज़ेबा है हर गिज़ नहीं । ऐसे हालात में सिर्फ़ यही चारा था कि सुलह कर के अपनी और इन तमाम लोगों की ज़िन्दगी को महफ़ूज़ रखें जो दीने रसूल (स.व.व.अ.) का नाम लेवा और हक़ीक़ी पैरो औ पाबन्द थे। इसके अलावा पैग़म्बरे इस्लाम (स.व.व.अ.) की पेशीन गोई भी सुलह की राह में मशाल का काम कर रही थी । (बुखारी) अल्लामा मोहम्मद बाक़र लिखते हैं कि हज़रत को अगरचे माविया की वफ़ाए सुलह पर एतेमाद नहीं था लेकिन आपने हालात के पेशे नज़र चारो नाचार दावते सुलह मंजूर कर ली । (अद्दमतुस् साकेबा )

जिसने मुझे छोड़ा उसने अल्लाह को छोड़ा

हज़रत अबुजर (रजीअल्लाहु अन्हुमा) फरमाते है के नबी अकरम सल्ललाहु अलैहिवसल्लम ने ईरशाद फ़रमाया है : ए अली ع जिसने मुझे छोड़ा उसने अल्लाह को छोड़ा और ए अली ع जिसने तुझे छोड़ा उसने मुझे छोड़ा

~ यह हदीस सहीह उल इस्नाद है लेकिन शैखैंन (रजीअल्लाहु अन्हुमा) ने इसको नकल नहीं किया

📚 अल मुस्तद्रक हाकिम जिल्द : 4 हदीस नं: 4624.
सहाबा ए किराम की मारेफत का बयान.