
हज़रत अली (अ.स.) और इस्लाम में सड़कों की तामीरी बुनियाद
हज़रत अली (अ.स.) बजाते खुद सीराते मुस्तकीम थे और आपको रास्तो से ज़्यादा दिलचस्पी थी। आप फ़रमाते थे कि मैं ज़मीन व आसमान के रास्तों से वाकिफ़ हूँ। हाफिज़ हैदर अली कलन्दर सीरते अलविया में लिखते हैं कि जजिये का माल व रूपया लशकर की आरास्तगी सरहद की हिफ़ाज़त और किलों की तामीर में सर्फ़ होता था और जो उससे बच रहता था वह सड़को पुलों की तय्यारी और बढ़ाते थे। इसी तरह तीन तीन पत्थर ले जा कर हर मील पर संगे मील नस्ब करते थे। अल्लामा शिब्ली ने हज़रत उमर के मोहक़मए जंगी की ईजाद को अल फ़ारूख़ में बड़े शद्दो मद से लिखा है, लेकिन हज़रत अली (अ.स.) की इस अहम रिफ़ाही खिदमत का कहीं भी कोई जिक्र नहीं किया हालाकि हज़रत अली (अ.स.) की यह वह बुनियादी खिदमत है जिसका जवाब ना मुमकिन है।
हज़रते उस्मान की खिलाफ़त
मुर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़राते शेख़ैन की वफ़ात के बाद मसलए खिलाफ़त फिर ज़ेरे बहस लाया गया और हज़रत अली (अ.स.) से कहा गया कि आप सीरते शेख़ैन पर अमल पैरा होने का वायदा कीजिये तो आपको ख़लीफ़ा बना दिया जाए। आपने फ़रमाया कि मैं खुदा व रसूल स. और अपनी साएब राय पर अमल करूंगा लेकिन सीरते शेख़ैन पर अमल नहीं कर सकता। (तबरी जिल्द 5 सफ़ा 37 व शरह फिक़हे अकबर सफ़ा 80 और तारीखुल क़ुरआन सफ़ा 36 प्रकाशित जद्दा) इस फ़रमाने के बाद लोगों ने इसी इक़रार के ज़रिये हज़रत उस्मान को ख़लीफ़ा बना दिया। हज़रत उस्मान ने अपने अहदे खिलाफ़त में ख़ुवेश परवरी, अक़रेबा नवाज़ी की। बड़े बड़े अस्हाबे रसूल स. को जिला वतन किया। बैतुल माल के माल में बेजा तसरूफ़ किया। अपनी लड़की के लिये महर तामीर कराये। मरवान बिन हकम को अपना दामाद और वज़ीरे आज़म बना लिया। हालांकि रसूल अल्लाह स. उसे शहर बदर कर चुके थे, और शेख़ैन ने भी इसे दाखिले मदीना नहीं होने दिया था। फिदक इसके हवाले कर दिया।
हज़रत अली (अ.स.) की खिलाफ़ते जाहेरी
पैग़म्बरे इस्लाम स. के इन्तेक़ाल के बाद हज़रत अली (अ.स.) गोशा नशीनी के आलम में फ़राएज़े मन्सबी अदा फ़रमाते रहे यहां तक कि खिलाफ़त के तीन दौरे इस्लाम की तक़दीर के चक्कर बन कर गुज़र गये और 35 ई0 में तख़्ते खिलाफ़त ख़ाली हो गया। 23, 24 साल की मुद्दते हालात को परखने और हक़ व बातिल के फ़ैसले के लिये काफ़ी होती हैं। बिल आखिर असहाब इस नतीजे पर पहुँचे कि तख़्ते ख़िलाफ़त हज़रत अली (अ.स.) को बिला शर्त हवाले कर देना चाहिये। चुनाचे असहाब का एक अज़ीम गिरोह हज़रत अली (अ.स.) की खिदमत में हाजिर हुआ । इस गिरोह में ईराक़, मिस्र, शाम, हिजाज़, फिलस्तीन और यमन के नुमाइन्दे शामिल थे। उन लोगों ने खिलाफ़त क़ुबूल करने की दरख्वास्त की ।
हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया मुझे इसकी तरफ़ रग़बत नहीं है तुम किसी और को ख़लीफ़ा बना लो। इब्ने ख़लदून का बयान है कि जब लोगों ने इस्लाम के अन्जाम से हज़रत को डराया, तो आपने रज़ा ज़ाहिर फ़रमाई । नहजुल बलाग़ा में है कि आपने फ़रमाया कि मैं ख़लीफ़ा हो जाऊंगा तो तुम्हे हुक्मे ख़ुदावन्दी मानना पड़ेगा। बहर हाल आपने जाहेरी खिलाफ़त क़ुबूल फ़रमा ली। मुसन्निफ़ बिरीफ़ सरवे लिखा है कि अली (अ.स.) 655 ई0 में तख़्ते खिलाफ़त पर बिठाए गये। जो हक़ीक़त के लेहाज़ से रसूल स. के बाद ही होना चाहिये था। (तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 26) रौज़ातुल अहबाब में है कि खिलाफ़ते ज़ाहिरया क़ुबूल करने के बाद आपने
जो पहला ख़ुतबा पढ़ा उसकी इब्तेदा इन लफ़्ज़ो से थी। अलहम्दो लिल्लाह अला एहसाना क़द रजअल हक़ अला मकानेह ख़ुदा का लाख लाख शुक्र और उसका एहसान है कि उसने हक़ को अपने मरकज़ और मकान पर फिर ला मौजूद किया । तारीखे इस्लाम और जामए अब्बासी में है कि 18 जिल्हिज्जा को हज़रत अली (अ. स.) ने खिलाफ़ते जाहेरी क़ुबूल फ़रमाई और 25 जिल्हिज्जा 35 हिजरी को बैयते आम्मा अमल में आई । इन्साइक्लोपीडिया बरटानिका में है कि जब मौहम्मद साहब स. ने इन्तेक़ाल फ़रमाया तो अली (अ.स.) में मज़हबे इस्लाम के मुसल्लम अल सुबूत सरदार होने के हुकूक़ मौजूद थे 656 हिजरी में अली (अ.स.) ख़लीफ़ा हो गये, अली (अ.स.) के अहदे खिलाफ़त में सब से पहला काम तलहा व जुबैर की बग़ावत को फ़रो करना था।
आपके पास ख़िलाफ़त की खिदमत उस वक़्त आई जब लोगों की नियतें फ़ासिद हो गईं थीं और इन्तेज़ामाते मुल्की और उसूली हुकूमत के मुताअल्लिक़ वालियो और मातहतों के दिलों में हिरस व लालच पैदा हो गई थी और इन सब से ज़्यादा लालची और मक्कार माविया इब्ने अबू सुफियान था क्योकि इसने अपनी हुकूमत जमाने के लिये लोगों को धोका फ़रेब दे कर उनके साथ मक्र व हीला कर के और मुसलमानों का माल बे दरेग़ लुटा कर लोगों को अपनी तरफ़ कर लिया था । (तारीख़ अल तमदुन अल इस्लामी 4 सफ़ा 37 प्रकाशित मिस्र)
फ़ाज़िल माअसर सैय्यद इब्ने हसन जारचावी लिखते हैं कि अगर अली (अ.स.) रसूल स. के बाद ही ख़लीफ़ा तसलीम कर लिये जाते तो दुनिया मिनहाजे रिसालत पर चलती और राहवारे सलतनत व हुकूमत दीने हक़ की शाहराह पर सरपट दौड़ता मगर मसलेहत और दूर अन्देशी के नाम से जो आइन व रूसूम हुकमरां जमाअत का जुज़वे जिन्दगी और औढना बिछोना बन गये थे, उन्होंने अली (अ.स.) की पोज़ीशन नाहमवार और उनका मौकफ़ ना इस्तेवार बना दिया था। पिछलों दौर की गैर इस्लामी रसमों और इम्तियाज़ पसन्द ज़ेहनियतों की इस्लाह करने में उनको बड़ी दिक़्क़त हुई और फिर भी खातिर ख़्वाह कामयाबी हासिल न हो सकी। तबीयते आदम मसावात की खूगर और माअशरती अदल से कोसों दूर हो चुकी थीं।
अली (अ.स.) ने बैअत के दूसरे रौज़ बैतुल माल का जायज़ा लिया और सब को बराबर तक़सीम कर दिया। हबशी गुलाम और कुरैशी सरदार दोनों को दो दोदिरहम मिले| इस पर पेशानी पर सिलवटें पड़ने लगीं। बनी उमय्या को इस दौर में अपनी दाल गलते नज़र न आई। कुछ माविया से जा मिले, कुछ उम्मुल मोमेनीन आयशा के पास मक्के जा पहुँचे। आसम कूफ़ी का बयान है कि आयशा हज से वापस आ रहीं थीं कि उन्हें क़त्ले उस्मान की ख़बर मिली। उन्होने निहायत इशतेयाक़ से पूछा कि अब कौन ख़लीफ़ा हुआ। कहा गया, अली यह सुन कर बिल्कुल ख़ामोश हुईं। अब्दुल्लाह इब्ने सलमा ने कहा, क्या आप उस्मान की मज़म्मत और अली (अ.स.) की तारीफ़ नहीं करती थीं, अब नाख़ुश का सबब क्या है? फ़रमाया आखिर वक़्त में उसने तौबा कर ली थी। अब उसका क़सास चाहती हूं। इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि आयशा ने ऐलान कराया कि जो शख़्स इस्लाम की हमदर्दी करना और ख़ूने उस्मान का बदला लेना चाहता हो और उसके पास सवारी न हो, वह आय उसे सवारी दी जायेगी ।
हज़रत अली (अ.स.) को एक दूसरी दिक़्क़त यह दरपेश थी कि सारा आलमे इस्लाम इन उमवी आमिलो और हाकिमों से तंग आ गया था जो हज़रत उस्मान के अहद में मामूर थे, अगर अली (अ.स.) उनको ब दस्तूर रहने देते तो हुकूमत के वजूद जमहूर को चैन न मिलता, और अगर हटाते हैं तो मुखालिफ़ों की तादाद में इज़ाफ़ा करते हैं। हुक्काम व आमिल मुद्दत से ख़ुदसरी के आदी और बैतूल माल

