
मशवरों के मुताअल्लिक़ इस्लाम की रायें
अल्लामा इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं कि जब हज़रते उमर ने चाहा कि ख़ुद जंगे रोम व ईरान में जायें तो हज़रत अली (अ.स.) ही ने उनको मुफ़ीद मशवेरा दिया जिसको हज़रत उमर ने शुकरिये के साथ क़ुबूल किया और वह अपने इरादे से बाज़ रहे और हज़रत उस्मान को भी ऐसे क़ीमती मशवेरे दिये जिनको अगर वह क़ुबूल कर लेते तो उन्हें हवादिसों आफ़ात का सामना न करना पड़ता। उबैद उल्लाह अमरतसरी लिखते हैं कि तमाम मुवर्रेख़ीन मुत्तफिक़ हैं कि इस्लाम में हज़रत उमर से ज़्यादा कोई ख़लीफ़ा मुदब्बिर पैदा नहीं हुआ इसकी ख़ास वजह यह थी कि हज़रत उमर हर बाब में हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा लेते थे। (अरजहुल तालिब सफ़ा 227) मिस्टर अमीर अली लिखते हैं कि हज़रत उमर के अहदे हुकूमत जितने काम रेफ़ाहे आम के हुये वह सब हज़रत अली (अ.स.) की सलाह व मशवरे से अमल में आये।
(तारीख़े इस्लाम)
मशवरों के अलावा जानी इमदाद
हज़रत अली (अ.स.) ने सिर्फ़ मशवेरों ही से अहदे गोशा नशीनी में इस्लाम की मदद नहीं कि बल्कि जानी खिदमात भी अन्जाम दी है। मिसाल के लिये अर्ज़ है कि जब फ़तेह मिस्र का मौक़ा आया तो हज़रत अली (अ.स.) ने अपने ख़ानदान के
नौजवानों को फ़ौज में भरती कराया और उनके ज़रिये से जंगी खिदमात अन्जाम दिये। शैख़ मौहम्मद इब्ने मौहम्मद बिन मआज़ मम्लेकते मिस्र में मुसलमानों की फ़तूहात के सिलसिले में कहते हैं कि मुबारकबाद के क़ाबिल हैं हज़रत अली (अ.स.) के भतीजे और दामाद मुस्लिम बिन अक़ील और उनके भाई जिन्होंने महाज़े मिस्र सख़्त जंग की और इस दरजा ज़ख़्मी हुए कि ख़ून उनकी जिरह पर से जारी था और ऐसा मालूम होता था कि ऊँट के जिगर के टुकड़े हैं। (मुलाहेज़ा हो किताब फ़तूहात, सफ़ा 64 प्रकाशित बम्बई 1286 ई0) इसी तरह फ़तेह शुशतर के मौके पर 170 हिजरी में आपके भतीजे मौहम्मद इब्ने जाफ़र और औन बिन जाफ़र शहीद हुए ।
(तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 81 बा हवाला तारीखे कामिल व इस्तिया । )
हज़रत अली (अ.स.) और इस्लाम में सड़कों की तामीरी बुनियाद
हज़रत अली (अ.स.) बजाते खुद सीराते मुस्तकीम थे और आपको रास्तो से ज़्यादा दिलचस्पी थी। आप फ़रमाते थे कि मैं ज़मीन व आसमान के रास्तों से वाकिफ़ हूँ। हाफिज़ हैदर अली कलन्दर सीरते अलविया में लिखते हैं कि जजिये का माल व रूपया लशकर की आरास्तगी सरहद की हिफ़ाज़त और किलों की तामीर में सर्फ़ होता था और जो उससे बच रहता था वह सड़को पुलों की तय्यारी और सरिशतये तालीम के काम में आता था। ( एहसनुल इन्तेख़ाब, सफ़ा 488 प्रकाशित लखनऊ 1351 हिजरी )
इसी सीरते अलविया की रौशनी में फिक़ही किताबों में सड़क की तामीर की तरफ़ लफ़्ज़े फ़ी सबी लिल्लाह से इशारा किया गया है। (शराए अल इस्लाम प्रकाशित ईरान 1207 ई0) में है कि फ़ी सबी लिल्लाह से मुराद मख़सूस जंगी एख़राजात हैं और एक क़ौल है कि इसमें रास्तों और पुलों की तामीर, ज़ायरों की इमदाद, मस्जिदों की मरम्मत भी शामिल है और मुजाहिद को चाहे वह अपने मामेलात में ग़नी हीं क्यों न हो इमदाद देनी ज़रूरी है। सबील माने रास्ते के हैं और इसकी इज़ाफ़त अल्लाह की तरफ़ देने से बाहवाला मज़कूरा साबित होता है कि सड़क की तामीर को भी ख़ास अहमियत हासिल है। इसी लिये हज़रत अली (अ.स.) ने सड़क की तामीर में पूरे इनहेमाक का सुबूत दिया है। अल्लामा हाशिम बहरैनी किताब मदीनातुल मआजिज़ के सफ़ा 79 पर बाहवाला इब्ने शहरे आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) ने 17 मील तक अपने हाथों से ज़मीन हमवार की और सड़क की तामीर फ़रमाई और हर मील पर पत्थर नस्ब कर के उन पर हाज़ा मीले अली तहरीर फ़रमाया चूंकि इस ज़माने मे नक़लो हमल का कोई ज़रिया न था इस लिये इन वज़नी पत्थरों को जिन्हें बड़े क़वी हैकल लोग उठा न सकते थे। हज़रत अली (अ.स.) ख़ुद उठा कर ले जाते थे और नस्ब करते थे और उठाने की शान यह थी कि दो पत्थरों को हाथों में ले लेते थे और एक को पैरों की ठोकरों से आगे
बढ़ाते थे। इसी तरह तीन तीन पत्थर ले जा कर हर मील पर संगे मील नस्ब करते थे। अल्लामा शिब्ली ने हज़रत उमर के मोहक़मए जंगी की ईजाद को अल फ़ारूख़ में बड़े शद्दो मद से लिखा है, लेकिन हज़रत अली (अ.स.) की इस अहम रिफ़ाही खिदमत का कहीं भी कोई जिक्र नहीं किया हालाकि हज़रत अली (अ.स.) की यह वह बुनियादी खिदमत है जिसका जवाब ना मुमकिन है।

