चौदह सितारे पार्ट 54

हज़रत अली (अ.स.) का कुरआन पेश करना

नूरूल अबसार इमाम शबलन्जी में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने रसूले करीम स. के ज़माने में कुरआने मजीद जमा कर के आं हज़रत की खिदमत में पेश किया था। जिल्द 1 सफ़ा 73, सवाएके मोहर्रेका सफ़ा 76 में है कि जब आपको बैय्यते अबू बक्र के लिये मजबूर किया गया और कहा गया तो आपने फ़रमाया कि मैंने क़सम खाई है कि जब तक कुरआने मजीद को मुकम्मल तौर पर जमा न कर लूँगा रिदा न ओढूगां। (एतकाने सियूती सफ़ा 57 ) हबीब अल सियर जिल्द 1 सफ़ा 4 में है कि अली (अ.स.) का कुरआन तन्ज़ील के मुताबिक़ था। बेहारूल अनवार व मनाकिब जिल्द 2 सफ़ा 66 में है कि अमीरुल मोमेनीन ने पूरा क़ुरआन जमा करने के बाद उसे चादर में लपेटा और ले कर मस्जिद मे पहुँचे और हज़रत अबू क्र से कहा कि यह क़ुरआन है जिसे मैंने तन्ज़ील के मुताबिक़ जमा किया है और जो आं हज़रत स. की नज़र से गुज़र चुका है, इसे ले लो और राज कर दो। आपने यह भी कहा कि मैं इसे इस लिये पेश कर रहा हूँ कि मुझे आं हज़रत (अ. स.) ने हुक्म दिया था कि एतमामे हुज्जत के लिये पेश करना। किताब फ़सल अल ख़त्ताब में है कि उन्होंने जवाब दिया कि इसे वापस ले जाओ। हमें तुम्हारे कुरआन की ज़रूरत नहीं है। अल्लामा स्यूती तारीख़ुल ख़ुलफ़ा के सफ़ा 184 में इब्ने सीरीन का क़ौल नक़ल करते हुए लिखते हैं कि अगर वह क़ुरआन कुबूल कर लिया गया होता तो लोगों को बे इन्तेहा फ़ाएदा पहुँचता ।

हज़रत अली (अ.स.) के मुहाफिज़े इस्लाम मशवरे

1. क़ैसरे रोम ने दूसरे ख़लीफ़ा से सवाल कर दिया कि आपके क़ुरआन में कौन सा सूरा है जो सिर्फ़ सात आयतों पर मुशतमिल है और इसमें सात हुरूफ़ हुरूफ़ तहजी के नहीं हैं। इस सवाल से आलमे इस्लाम में हलचल मच गई। हुफ़्फ़ाज़ ने बहुत गौरो फिक्र के बाद हथियार डाल दिये। हज़रत उमर ने हज़रत अली (अ.स.) बुलवा भेजा और यह सवाल सामने रखा, आपने फ़ौरन इरशाद फ़रमाया कि वह सूरा ए हम्द है। इस सूरे में सात आयतें हैं और इसमें से, जीम, ख़े, ज़े, शीन, ज़ोय, फ़े नहीं हैं। को

2. उलमाए यहूद ने दूसरे ख़लीफ़ा से असहाबे कहफ़ के बारे में चन्द सवालात किये, आप उनका जवाब न दे सके और आप ने अली (अ.स.) की तरफ़ रूजु की,

हज़रत ने ऐसा जवाब दिया कि वह पूरे तौर पर मुतमइन हो गये । हज्रे अस्वद के बोसा देने पर हज़रत अली (अ.स.) ने जो बयान दिया है उस से हज़रत उमर की पशेमानी, बुदूरे साफ़रा सियूती में मौजूद है।

3. एहदे अव्वल में नीज़ अहदे सानी की इब्तेदा में शराब पीने पर ( 40 ) चालीस कोड़े मारे जाते थे। हज़रत उमर ने यह देख कर कि इस हद से रोब नहीं जमता और कसरत से शराब पी रहे हैं, हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा किया, आपने फ़रमाया कि चालीस के बजाय ( 80 ) अस्सी कोड़े कर दिये जाऐ और उसके लिये यह दलील पेश की कि जो शराब पीता है वह नशे में होता है और जिसको नशा होता है वह हिज़यान बकता है और जो हिज़यान बकता है वह इफ़तेरा करता है। व अली अल मुफ़तरी समानून और इफ़तेरा करने वालों की सज़ा अस्सी कोड़े हैं लेहाज़ा शराबी को भी अस्सी कोड़े मारने चाहिये। हज़रत उमर ने इसे तस्लीम कर लिया। (मतालेबुस सूऊल सफ़ा 104)

4. एक हामेला औरत ने जेना किया हज़रत उमर ने हुक्म दिया कि उसे संगसार किया जाए। हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि ज़ेना औरत ने किया है लेकिन वह बच्चा जो पेट में है, उसकी कोई ख़ता नहीं, लेहाज़ा औरत पर उस वक़्त हद जारी की जाए जब वज़ए हमल हो चुके । हज़रत उमर ने तस्लीम कर लिया और साथ ही साथ कहा: अगर अली न होते तो उमर हलाक हो जाता।

5. जंगे रूम में आपने जाने के मुताअल्लिक़ हज़रत उमर ने हज़र अली (अ.स.) से मशवेरा किया।

6. जंगे फ़ारस में भी खुद शरीके जंग होने के मुताअल्लिक़ हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा लिया। मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़रत अली (अ.स.) ने हज़रत उमर को ख़ुद जंग में जाने से रोका और फ़रमाया कि अगर आप शहीद हो जायेंगे तो कसरे शाने इस्लाम होगी। हज़रत अली (अ.स.) के मशवेरे पर हज़रत उमर बहादुरों के मुसलसल ज़ोर देने के बावजूद जंग में शरीक न हुए। मेरा ख़्याल है कि हज़रत अली (अ.स.) ने निहायत ही साएब मशवेरा दिया था क्यों कि वह जंगे बद्र और ख़ैबर, ख़न्दक़ के वाक़यात व हालात से वाकिफ़ थे। अगर ख़ुदा न ख़ासता मैदान छूट जाता तो यक़ीनन कसरे शाने इस्लाम होती। अगर शहादत से कसरे शाने इस्लाम का अन्देशा होता तो हज़रत अली (अ.स.) सरवरे कायनात स. को भी मशवेरा देते कि आप किसी जंग में ख़ुद न जाइये । तारीख़ में है कि वह बराबर जाते और ज़ख़्मी होते रहे। ओहद में तो जान ही ख़तरे में आ गई थी।

7. मिस्टर अमीर अली तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) के मशवेरे से ज़मीन की पैमाईश की गई और माल गुज़ारी का तरीक़ा राज किया गया।

8. आप ही के मशवेरे से सन् हिजरी क़ायम हुआ ।