चौदह सितारे पार्ट 15

एक 1 हिजरी के महत्वपूर्ण वाक़यात

अज़ान व अक़ामत

एक हिजरी में अज़ान मुक़र्रर की गई जिसे हज़रत अली (अ.स.) ने हुक्में रसूले ख़ुदा ( स.व.व.अ.) से बिलाल (र.अ.) को तालीम कर दी और वह मुस्तकिल मोअज्जन क़रार पाये और अक़ामत का तक़रूर भी हुआ।

अदे मवाख़ात (भाईचारा कराना)

हिजरत के 5 या 8 महीने बाद महाजेरीने मक्का की दिलबस्तगी के लिये आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने 50 महाजिर व अनसार में मवाख़ात (भाई चारगी ) क़ायम कर दी जिस तरह एक बार मक्का में कर चुके थे। तारीख़े ख़मीस और रियाजुल नज़रा में है कि वहां हज़रत अबू बकर को उमर का तलहा को ज़ुबैर का, उस्मान को अब्दुल रहमान का, हमज़ा को इब्ने हारसा का और अली (अ.स.) को खुद अपना भाई बनाया था। अल्लामा शिब्ली का कहना है कि आं हज़रत ( स.व.व.अ.) ने इत्तेहादे मज़ाक़ तबीयत और फ़ितरत के लेहाज़ से एक दूसरे को भाई बनाया था। मज़ाके नबूवत का इत्तेहाद फ़ितरते इमामत ही से हो सकता है इसी लिये आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने हर मरतबा अपना भाई अली (अ.स.) को ही चुना यही वजह है कि आं हज़रत ( स.व.व.अ.) हज़रत अली (अ.स.) से फ़रमाया करते थे।
यानी दुनिया और आख़रत दोनों में मेरे भाई हो ।

2 हिजरी के महत्वपूर्ण वाकेयात

जनाबे सैय्यदा ( स.व.व.अ.) का निकाह

15 रजब 2 हिजरी को जनाबे सैय्यदा ( स.व.व.अ.) का अक़्द हज़रत अली (अ. स.) से हुआ और 19 ज़िलहिज्जा को आपकी रूख़सती हुई। सीरतुन नबी में है कि जब जनाबे सैय्यदा ( स.व.व.अ.) की शादी की बात चली तो सब से पहले हज़रत अबू बकर फ़िर हज़रत उमर ने पैग़ाम भेजा। कन्जुल आमाल 7 पृष्ठ 113 में है कि इन पैग़ामात से आं हज़रत ग़ज़बनाक हुये और उनकी तरफ़ से मुँह फेर लिया। रियाजुल नज़रा जिल्द 2 पृष्ठ 184 में है कि आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) से ख़ुद फ़रमाया कि ऐ अली मुझसे ख़ुदा ने कह दिया है कि फातेमा (स.व.व.अ.) की शादी तुम्हारे साथ कर दूं, क्या तुम्हें मन्ज़र है? अर्ज़ कि बेशक, अल ग़रज़ अक़्द हुआ और शहनशाहे कायनात ने सय्यदए आलमयान को एक बान की चारपाई, एक चमड़े का गद्दा, एक मशक, दो चक्कियां, दो मिट्टी के घड़े वग़रा दे कर रुख़सत किया। इस वक़्त अली (अ.स.) की उम्र 24 साल और फातेमा ( स.व.व.अ.) की उम्र 15-19 साल थी।
तहवीले काबा

माहे शाबान 2 हिजरी में बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ से क़िबले का रूख काबे की तरफ़ मोड़ दिया गया। क़िबला चूंकि आलमे नमाज़ में बदला गया इस लिये आं हज़रत ( स.व.व.अ.) का साथ हज़रत अली (अ.स.) के अलावा और किसी ने नहीं दिया क्यों कि वह आं हज़रत ( स.व.व.अ.) के हर फ़ेल या क़ौल को हुक्में ख़ुदा समझते थे इसी लिये आप मक़ामे फ़ख़ में फ़रमाया करते थे इन्ना मुसल्ली अल क़िबलतैन मैं ही वह हूं जिसने एक नमाज़ बयक वक़्त (एक ही समय ) में दो क़िब्लों की तरफ़ पढ़ी।

जेहाद

जब क़ुरैश को मालूम हुआ कि रसूले इस्लाम (स. व. व.अ.) बख़ैर व ख़ूबी मदीना पहुँच गये और उनका मज़हब दिन दूनी रात चौगनी तरक़्क़ी कर रहा है तो उनकी आख़ों में ख़ून उतर आया और दुनिया अंधेर हो गयी और वह मदिने के यहूदियों के साथ मिल कर कोशिश करने लगे कि इस बढ़ती हुई ताक़त को कुचल दें। इसके नतीजे में हज़रत को मुशरेक़ीन कुरैश और यहूदियों के साथ बहुत सी देफ़ाई (आत्म रक्षक) लड़ाईयां लड़नी पड़ीं जिनमें से अहम मौक़ों पर हज़रत खुद फ़ौजे इस्लाम के साथ तशरीफ़ ले गये ऐसी मुहिमों को ग़ज़वा कहते है और जिन मौकों पर आप असहाब में से किसी को फ़ौज का सरदार बना कर भेज दिया करते थे
उनको सरिया कहा जाता है। ग़ज़वात की कुल संख्या 26 है जिनमें बद्र, ओहद, खन्दक़ और हुनैन बहुत मशहूर हैं और सरियों की संख्या 36 थी जिनमें सबसे मशहूर मौता है जिसमें हज़रते जाफ़रे तय्यार शहीद हुये ।