
– सूर -ए- मायदा आयत न. 55 का नुजूल,जो की मौला अली अलैहिस्सलाम की शान में नाजिल हुई है _
اِنَّمَا وَلِیُّکُمُ اللّٰہُ وَ رَسُوۡلُہٗ وَ الَّذِیۡنَ اٰمَنُوا الَّذِیۡنَ یُقِیۡمُوۡنَ الصَّلٰوۃَ وَ یُؤۡتُوۡنَ الزَّکٰوۃَ وَ ہُمۡ رٰکِعُوۡنَ
“तुम्हारे दोस्त वा मददगार तो अल्लाह ,इस के रसूल और वह ईमान वाले है जो इस तरह नमाज़ कायम करते और जकात अदा करते है कि वह अल्लाह के आगे झुके हुए होते है “
इस आयत के बारे में इमाम और मुहादसीन ने कई हदीश नकल की है जिस का मफ़्हूम यह है की _एक बार मौला अली अलैहिस्सलाम नमाज़ अदा कर रहे थे जब आप रुकू की हालत में थे तो एक मांगने वाले ने सदा लगाई मौला अली अलैहिस्सलाम ने रुकु की हालत में अपनी अंगूठी मांगने वाले को दे दी ।
मांगने वाला जब रसूले अल्लाह ﷺ की खिदमत में हाजिर हुआ और सारा वाक्या बताया तो ये आयत नाजिल हुई।
नबी पाक ﷺ ने ये आयत सहाबा पर पढ़ी और फरमाया
“जिस का मैं दोस्त हू अली इस का दोस्त है ऐ अल्लाह इस का दोस्त बन जो अली का दोस्त बने और जो अली से दुश्मनी रखे इसे अपना दुश्मन रख”
(तफसीर दुर्रे मंसूर जिल्द 2 पेज 804)
हवाले आप की खिदमत में 👇🏻
* इमाम जलालुद्दीन श्यूती, लुबाब उल नुकूल फी असबाब उल नुजूल, सफा 104, रकम 361.
وله شاهد قال عبد الرزاق: حدثنا عبد الوهاب بن مجاهد عن أبيه عن ابن عباس في قوله : (إِنَّمَا وَلِيكُمُ اللهُ وَرَسُولُم ) الآية، قال نزلت في علي بن أبي طالب وروى ابن مردويه من وجه آخر عن ابن عباس مثله، وأخرج أيضاً عن علي مثله وأخرج ابن جرير عن مجاهد وابن أبي حاتم عن سلمة بن كهيل مثله،فهذه شواهد يقوي بعضها بعضاً.
इमाम अब्दुर्रज्जाक रह ०ने इब्ने अब्बास रजी ०से रिवायत किया है कि यह आयत अली अलैहिस्सलाम के लिए नाजिल हुई और इमाम इब्ने मरदूया रह०ने भी इब्ने अब्बास राजी०से और इमाम इब्ने जरीर तबरी ने मुजाहिद वगैरह से और इमाम अबी हातिम ने सलमा से रिवायत नकल किया है।
فهذه شواهد يقوي بعضها بعضاً.
इमाम श्यूती रहमतउल्लाह कहते हैं कि “यह विभिन्न सवाहिद [तुरुक] एक दूसरे को [सनद के ऐतबार से] कूवी कर रहे हैं।”
देखें, रकम 360 और 361 👇🏻
https://archive.org/details/FakirlerinHizmetcisi_20150818_1430/page/n103/mode/1up?view=theater
* इरशाद उर रहमान असबाब उल नुजूल, सफा 249 और 250.
बिल्कुल यही बात जो इमाम श्यूती रह ०ने ऊपर लिखा और कहा है।
लिंक 👇🏻
https://archive.org/details/20220207_20220207_1801/page/n248/mode/1up?view=theater
* जामे उल बयान [तफसीर ए तबरी], इमाम इब्ने जरीर तबरी, जिल्द 10, सफा 424 से 426 तक।
आयते विलायत की काई सनद।
लिंक 👇🏻
https://archive.org/details/waqtaftab/taftab10/page/n423/mode/1up?view=theater
* तफसीर ए अबी हातिम, सफा 1168 से 1169 तक, रकम नं 6583 से 6587.
आयते विलायत की सनद।
https://archive.org/details/20191218_20191218_1134/page/n1167/mode/1up?view=theater
* इमाम तबरानी, मुअज्मल अवसत, उर्दू, जिल्द 4, सफा 651, रकम नं 6232.
आयते विलायत की मुकम्मल सनद।
यह वही सनद है जिसे इमाम श्यूती रह ०ने लुबाब उल नुकूल में रकम 360 के तहत लिखा है।
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https://archive.org/details/AlmoajemAlAowsat/%D8%A7%D9%84%D9%85%D8%B9%D8%AC%D9%85%20%D8%A7%D9%84%D8%A7%D9%88%D8%B3%D8%B7%20%D8%AC%D9%84%D8%AF%204/page/n652/mode/1up?view=theater
* इमाम तबरानी, मुअज्मल अवसत, अरबी, जिल्द 6, सफा 218, रकम 6232.
लिंक 👇🏻
https://archive.org/details/MujamTabaraniAwsat/mat06/page/n217/mode/1up?view=theater
* इमाम सालबी रह ०, तफसीर ए सालबी [कस्फ उल बयान], जिल्द 4, सफा 80.
आयते विलायत की कुछ सनद।
https://archive.org/details/waq56776/04_56779/page/n79/mode/1up?view=theater
* इमाम जरजानी रह ०सरह अल मवाक़िफ, जिल्द 8, सफा 391.
“اجمع آئمة التفسير علی ان المراد بالذين يقيمون الصلاۃ ۔۔۔، علي فانه کان فی الصلاۃ راکعا فساله سائل فاعطاہ خاتمه فنزلت الاية:…”
ترجمہ –
تفسیر کے تمام اماموں کا اجماع ہے کہ اس آیت میں الذین یقیمون الصلاۃ ۔۔۔۔، سے مراد حضرت علی (علیہ السلام) ہیں کیونکہ وہ نماز کے رکوع میں تھے کہ ایک فقیر اس سے کچھ مانگا تو حضرت علی (علیہ السلام) نے اپنی انگوٹھی دے دی ۔ تو یہ آیت نازل ہوئی۔
इमाम अल शरीफ अल ज़रजानी रह ०की तौसीक के लिए अल्लामा खैरुद्दीन जेरकली की किताब अल आलाम में जिल्द नं 6 की सफा नं 288 पर देखें 👇🏻
https://archive.org/details/Al_Alam_Zarkali/alam6/page/n287/mode/1up?view=theater

