मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-31

आचरण सौन्दर्य

अन्य विशेषताओं की भांति आप का आचरण भी उत्तम तथा अति सुन्दर था । इन्नक लअला खुलकीन अजीम (बेशक तेरे लिए उच्चत्तम आचरण है) को पूरी झलक आप के व्यक्तित्व में पायी जाती थी। जो भी आप के गौरव मयी चौखट पर आता आप के सुन्दर स्वभाव तथा उत्तम व्यवहार से प्रभावित होकर आप का हो जाता। आप समस्त प्राणियों से अत्यधिक स्नेह तथा प्रेममयी व्यवहार करते थे। मिलने वाले लोग आनन्द विभोर हो उठते थे । चेलों के उपस्थित होने पर आप खड़े होते, हाथ मिलाते तथा भेंट अंकवार भी करते थे। साथ ही घर के सभी लोगों की कुशल भी पूछ लेते थे। यदि सफर की हालत में किसी नगर या इलाके का कोई मिलता तो उससे वहाँ के लोगों का हाल जरूर पूछते थे । चेलों अथवा सेवकों में से यदि किसी से कोई त्रुटि या गलती हो जाती तो आप उसे अनदेखी कर जाते थे। यदि कोई किसी के पीछे-पीछे शिकायत करता तो आप शिकायत करने वाले को सांत्वना देते थे और निन्दनीय पर गर्म होते थे किन्तु जब वह व्यक्ति जिसकी • शिकायत हुई थी हुजूर के सामने आता तो आप उससे कुछ भी न कहते फिर भी
आप कुछ नपे-तुले शब्द उससे जरूर कहते थे। जिनसे वह व्यक्ति लज्जित हो जाता और पापों का प्रायश्चित कर लेता था। इन सबके पश्चात् आप उस पर इतनी दया करते कि शिकायत करने वाला देखकर चकित हो जाता था। चाहे कोई कितना ह गल्ती किए हो तथा आप क्रोधित से दिखायी भी पड़ते हो किन्तु आप के समक्ष आने पर गजब से पूर्व आप की दया उसको ढक लेती थी । यदि किसी की बात पर आप नाराज होते तो वह आप के सामने से चला जाता था। पुन: थोड़ी देर बाद वह आप के सामने आता तो आप अपनी नाराज़गी पर खेद करते तथा कुछ न कुछ उसको जरूर प्रदान करते थे। आपका हृदय दर्पण था सब कुछ उसमें दिखाई देता था। सबका वाह्य और अंत आप देखते थे फिर हर व्यक्ति की बात आप स्वीकार करते थे। कभी कोई यह जान नहीं पाया कि आप ने उसकी बात नहीं माना है। आप अपने सामने किसी को लज्जित नहीं होने देते थे । वास्तविकता यह हैं कि आप दया-दान के भण्डार तथा कृपा के सिन्धु थे। प्रत्येक दशा में भक्तों-सेवकों पर एक समान दया-प्रेम तथा सहानुभूति रखते थे। कभी किसी को सजा देना पसन्द तक

नहीं करते थे। बड़े-बड़े दोषों को तुरन्त क्षमा कर देते थे । हुजूर वारिस पाक स्वभावतः अत्यन्त कृपालु – दयालु तथा दानी थे। प्रत्येक लोगों से प्रसन्नचित्त तथा मुस्कराते हुए मिलते थे। दुखियों पर विशेष ध्यान देते, आपके पास उपस्थित लोग कभी यह नहीं जान पाये कि सरकार की कृपा दृष्टि किस पर अधिक अथवा कम है। सभी अपने को गौरवान्वित समझते थे। इटावा की एक घटना है हुजूर किसी मकान में जा रहे थे। रास्ते में दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ थी। लोग धक्के खा रहे थे। इसी बीच एक व्याकुल- आदमी भागता दौड़ता आपकों ओर आ रहा था। सेवकगण ने उसे पीछे हटा दिया उसने दीवार पर सर दे मारा। हुजूर ने देखा और स्वयं उसके पास जाकर खडे हो गये। उस व्यक्ति ने चरण चूमा और रोने लगा। थोड़ी देर बाद आपने उससे जाने की स्वीकृति चाही और कहा ‘अगर तुम इजाजत दो तो हम चले जायें। जब उसने विदा किया फिर आप आगे पधारे हाजी मुहम्मद शाह साहब वारसी ब्यान करते है कि एक बुजुर्ग हमको सफर में मिले जो हुजूर वारिस पाक के शिष्य थे। उन्होंने अपने चेला बनने की घटना बतायी। उनके द्वारा हमने हुजूर के आचरण और स्वभाव की बड़ाई सुनी थी मेरे विचार में आया कि इसका अनुभव करना चाहिए। मैं देवा शरीफ हाज़िर हुआ। लगभग साठ-सत्तर बार इधर से उधर चलते हुए सलामों अलैक करता रहा। हुजूर पाक मुस्कुराते रहे तथा बार-बार आपके पुनित हाथ सलाम के जवाब में उठते रहे।मुझसे पूछा तक नहीं कि कौन हो ? क्यों आये हो तथा ऐसी हरकत क्यों कर रहे हो ? मैं खुद लज्जित हुआ और आप के चरणों में गिर गया। आपके हाथों पर बैय्यत कर लिया अर्थात शिष्य हो गया।

सरकार वारिस पाक अपने छोटे-बड़े, अदना-आला सभी चेलों की सेवा सत्कार करने तथा सबकों सांत्वना देने में अपनी मिशाल आप थे। किसी का दिल तोड़ना आप पसन्द नहीं करते थे। यदि आप किसी के घर जाते होते और बीच रास्ते में दूसरा कोई आप को रोकता तो आप रूक जाते और उसके घर तक चलें जाते थे । वृद्धावस्था में जब आप रेल द्वारा सफर करते तो आप का हाथ लोगों के सलाम के जवाब में बराबर उठता रहता था। जहाँ तक दृष्टि सफल होती देखा जाता था कि आपका सिर खिड़की से बाहर और हाथ सलाम के लिए बाराबर उठता रहता था। सरकार वारिस पाक की दया दृष्टि तथा दान बृत्त अपने चेलों के प्रति बराबर बनी रहती थी चाहे कोई दूर हो अथवा निकट। जब कोई चेला आप से कहता कि मैं अमुक स्थान पर नौकरी के सम्बन्ध में जा रहा हूँ तो आपकी आँखें आंसुओं से भर जाती थी। जब कोई आपका मुरीद किसी कष्ट अथवा कठिनाई में होता तो आप अपने बिछौने पर बेचैन हो जाते, करवट बदलने लगते, व्याकुलता में उठने-बैठने लगते थे। उपस्थित गण सोचने लगते थे कि कहीं कोई परेशान हो रहा है। कुछ दिनों पश्चात् जब पता चलता तो देखने वाले कारण तक पूछते थे। आप अपने प्रेमियों की व्याकुलता से बेचैन हो जाते। इस सम्बन्ध में कुछ आगे अंकित घटनायें पाठकों को अवश्य मिलेगी।

आप का आचार-विचार इतना उत्तम था कि आज संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा हो जिसको यह कहने का अवसर मिले कि सरकार वारिस पाक हमसे रूष्ट अथवा नाराज़ थे। आगन्तुक व्यक्तियों के खाने-पीने तथा आराम का बहुत ध्यान रखते थे। आप मिलने वालों से खड़े होकर मिलते थे। जब बुजुर्ग और आलिम आपसे मिलने आते तो आप सच्चाई और प्रेम के साथ उनसे मिलते थे। उनका आदर-सत्कार करते थे। जब आपको मालूम होता कि कोई बुजुर्ग तपस्या के निमित्त कहीं बैठ गये हैं और वह अपना स्थान नहीं छोड़ सकते हैं तो आप खुद जाकर उनसे मिल आते थे। आप इस सीमा तक पहुँचे हुए थे कि अपने-पराये का शब्द तक भी जुबान पर नहीं आता था। क़ुरआन पढ़ने वालों तथा याद करने वालों और अरब निवासियों को आप विशेष सम्मानित करते थे। सफर खर्च के साथसाथ मिठाई, एहराम और अन्य वस्तुऐं भी प्रदान करते थे। आप इस प्रकार कहतेथे ‘हमारा तुम्हारा खून एक है।’ ‘हम तुम एक हैं न ।’ दूसरों से मिलते समय भी आप कहा करते थे ‘हम और यह एक हैं।’ अपने चेलों की तरह दूसरे मत के चेलों से भी उनके गुरुजन की बड़ाई करते ‘हम और वह एक हैं, तुम तो अपने ही हो, एक ही वास्ता है, हमारा तुम्हारा बिरादरी का वास्ता है।’ आप सत्य और प्रेम का आदर करते थे, जो लोग किसी ख्याल से मिलते आप उनके अहंकार तथा घमण्ड को तोड़ कर उनसे मिलते थे। जैसा कि एक साहब की घटना है (उनका नाम लिखना उचित नहीं है) आप दस-बारह चेलों के साथ देवा शरीफ हाजिर हुए। इन लोगों को सरकार की सेवा में हाज़िर किया गया। आपको जलाल (फ़क़ीरी का क्रोध) आ गया, सेवक इस बात को जानते थे कि आपका जलाल थोड़ी देर के लिए होता है। अतः उक्त लोगों को कोठे पर ठहरा दिया गया और आवभगत की गयी परन्तु जब वह हुज़ूर के सामने आते आपकी नज़रे गर्म हो जातीं थी। किसी पर यह भेद नहीं खुलता था आखिर बात क्या है? दूसरे दिन हाजी अवघट शाह वारसी साहब और उनके खलीफा को साथ लेकर हुजूर की सेवा में पहुंचे और प्रार्थना किया कि हुजूर यह अमुक स्थान के रहने वाले सैय्यद हैं; पीरी मुरीदी भी करते हैं। आपने बैठने की आज्ञा दे दिया। उन शाह साहब ने कहा कि आप मेरे सम्बन्ध में कुछ अपने मुख से आशिर्वाद दें कि मेरा अन्त भलाई पर हो। आप ने कहा ‘मुहब्बत है तो हो जायेगी फिर कहा मुरीद क्यों फिरेंगे? हमारा तुम्हारा ख़ून एक है। बिदा होते समय शाह साहब को तहबन्द (एहराम) और एक जोड़ा औरतों का वस्त्र दिया फिर मिठाई और सफर खर्च भी देने का हुक्म दिया। विचित्र बात ये थी कि शीघ्र ही ऐसे लोगों का सुधार हो जाता था और कोई भी हुजूर के चौखट से दुखी और निराश नहीं लौटता था।

ऐसी ही एक घटना अलीगढ़ की है। मुंशी अलह यार खाँ निवासी अलीगढ़ ब्यान करते हैं कि हुजूर वारिस पाक हाफिज़ हसन साहब के मकान पर थे ।। अलीगढ़ के तहसीलदार सैय्यद सुलैमान शाह ने लोगों से सुना था कि हुजूर के ख़िदमत में जो जाता है उसे अपनी बात कहने की जरूरत नहीं पड़ती है। आप स्वयं उसका जवाब कह देते हैं। परीक्षा लेने की गरज़ से वह हज़रत वारिस पाक की ख़िदमत में जाने लगे। हुजूर ने उनके पहुंचने के पूर्व हाफिज हसन साहब वारसी को आदेश दिया। यहाँ के तहसीलदार साहब आते हैं उनको वापस कर दो, हम उनसे बात नहीं करेंगे। आदेश का पालन हुआ। दूसरे दिन फिर अज़माईश के लिए . तहसीलदार साहब चले किन्तु फिर सरकार ने उन्हें वापस कर दिये। तीसरे दिन

उनका विचार बदल गया और तहसीलदार साहब रोते हुए कुछ मिठाई और एहराम लिए पैदल हुजूर की सेवा में उपस्थित हुए। पाँव चूमे और मुरीद हो गये। आगे चलकर अच्छे प्रेमियों में गिने जाने लगे। अतः सिद्ध है कि जब तक कोई व्यक्ति पवित्र हृदय और शुद्ध मन से हुजूर के पास नहीं आता, आप से मिल नहीं पाता और यह भी विदित है कि जब तक आप उसके विचारों की धुलाई नहीं कर लेते, वह आप तक नहीं पहुँच पाता था। अतः जैसे आप ख़ुद पवित्र मन और शुद्ध हृदय के थे उसी तरह दूसरों का भी बना लेते, तब मिलते थे। किसी बुरी बात का आपसे प्रकट होना तो दूर आप लोगों की बुराईयों को दूर करके उनसे मिलते थे।

एक बार सरकार वारिस पाक के आस्ताने पर एक अरबी ठहरे हुए थे। बहुत ही क्रूर स्वर में अरब निवासी ने किसी भारतीय व्यक्ति को ‘हिन्दी बत्ताल’ कहा। यह आवाज़ हुजूर के कान तक पहुँच गयी। आप ने अरबी साहब को बुला कर कहा कि अरब साहब हिन्दी क्यों बत्ताल है? (बत्ताल का अर्थ है तुच्छ मनुष्य) । क्या उन्होंने रसूल सल्ल० के घर को बेचिराग़ किया है? क्या उन्होंने इतरते रसूल (रसूल की औलाद) की बेइज्ज़ती की है ? अथवा मक्का और मदीना के सम्मान में कोई अन्तर पैदा किया है? अरबी महोदय बहुत लज्जित हुए और तोबा किया। इसके बाद आपने उनके ऊपर दया किया और कुछ वस्तुऐं भी प्रदान किया। आप सम्पूर्ण बुराईयों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। जिस प्रकार आप अच्छे विचारों के स्वामी थे, उसी प्रकार दूसरों के विचारों को भी पवित्र बना देते थे।

मुहम्मद नाज़िम अली फज़ली मदरसा फुरकानिया से अंकित है कि एक बार हुजूर वारिस पाक मौज़ा मुहम्मदपुर में ठहरे थे। मैं उस समय बीमार था सोचता था कि किसी अल्लाह वाले से मुलाकात करूं। मैंने जब सुना कि हज़रत पधारे हैं और मिलने के लिए पहुंचा, आप कोठे पर थे, औरतें आपको घेरे हुए थीं। एक बार, दो बार मिलने गया, उत्तर मिला पर्दा है। दूसरी बार लौटते हुए अपने मन में कहा मिलना हो तो मिलये वरना अब हम नहीं आयेंगे । तत्काल कोठे से आवाज़ आयी पर्दा समाप्त हुआ, जिसका जी चाहे आये। मैं सेवा में उपस्थित हुआ। हुजूर वारिस पाक लिहाफ के अन्दर से ही ‘कौन है ? कौन है ? ‘ कहते हुए उठ बैठे। सहानुभूति दर्शाते हुए मेरी पीठ पर दो मुक्के लगाये। सिर खोलकर अन्ततः ध्यान में हो गये पुनः कहा ‘बस’ मैं सलाम करके चला गया। उसी मकान में एक बार नाज़िम अली साहब फज़ली के सम्बन्ध में आपने कहा यहां के हाकिम हैं, हाकिम।’ मौलाना सैय्यद अली नकीशाह नक्शबन्दी लिखते हैं

एक बार हुजूर मौजा मुहम्मदपुर बिसुनपुरा में विद्यमान थे। उसी ग्राम में एक दरवेश रहते थे। आप से मिलने नहीं आये. किसी ने आप से कहा कि यहाँ एक दरवेश रहते हैं, जो आपसे मिलने नहीं आये। आपने कहा ‘फ़कीर के पास गरज वाले ज्यादा आते हैं, उस दरवेश को ख़ुदा की तलब होगी, पीर ने बता दिया यहाँ आके क्या करता ?’ हुजूर वारिस पाक किसी से बदगुमान नहीं होते थे और दूसरों को भी बदगुमानी से परहेज़ करने की शिक्षा देते थे। सभी बुरी और ख़राब बातों को मन, वचन और कर्म से बुरा मानते थे। जिस पर अधिक प्रसन्न होते उसकी पीठ पर धीरे-धीरे ठोंकने लगते थे। मानो यह बात आपके प्यार में थी। आप कभी किसी को कष्ट और दुःख में नहीं देख सकते थे। मुहम्मद नाज़िम अली फज़ली लिखते हैं कि संयोग से मुझे एक मोकल्लिद आलिम से पढ़ने का अवसर मिला। उनकी संगति का असर मुझमें आने लगा और सूफी, संतों की ओर से लापरवाही हो गयी साथ ही हाजी साहब के प्रति भी विचार खराब हो गये। कुछ दिनों तक यही दशा रही। अचानक यह विचार उत्पन्न हुआ कि अपनी दशा सुधार कर ही दूसरे को देखना चाहिये। एक दिन हाजी साहब किबला की सेवा में पहुँचकर प्रार्थना किया कि मेरे जो विचार थे उनसे मैं तोबा करता हूँ। आपने मुस्कुराकर हाथ में हाथ लिया और तीन बार इस्तग़फ़ार (पापों के प्रायश्चित) करा कर बिदा कर दिया।

मालवी रौनक अली साहब वारसी लिखते है कि हकीम फैय्याज अली साहब अपनी देखी हुई घटना मुझसे इस तरह ब्यान करते हैं कि मासूम अली साहब अपने विचार वालों के साथ टहल रहे थे, बातों के क्रम में आप हाजी साहब क़िबला पर कुछ ताना दे रहे थे। उसी समय हाजी साहब उसी रास्ते निकले और हकीम साहब को सम्बोधित कर कहा ‘सुना-सुना, हकीम साहब! आप ने पढ़ा होगा या आप जानते होंगे- मत अमल सालेहन फ लेनफसेही व मन असाअ फ अलैहा’ अर्थात् जिसने अच्छा काम किया तो आपने लिए और जिसने बुरा काम किया तो आपने ही लिए किया। आप अपनी जबान और मन को दूसरे के लिए क्यों ख़राब करते हैं। फिर कहा ‘सुना-सुना हकीम साहब! ऐसा है ना।’ यह कहते हुए आप आगे चले गये। आप अपनी शिकायत सुनकर भी लोगों को प्रेम भाव से समझाते तथा कभी दुःखी नहीं होते थे। उदाहरण के लिए केवल एक घटना अंकित करना अधिक और काफी होगा। मौलाना क्यामुद्दीन साहब फिरंगी महल एक बार आपके पर्दा करने के समय अपने चन्द साथियों के साथ हाजी साहब की बीमारी की पुछार में सेवा में आये किन्तु उनकी ओर उतना ध्यान नहीं दिया जितना उनके साथियों की ओर दिया। मौलाना लिखते हैं कि इलताफुर्रहमान साहब रईस बड़ा गाँव ने यह कहा कि हाजी साहब की यह बेरूखी कुछ मुनासिब नहीं जान पड़ी। मैंने कहा कि मुझ पर फ़र्ज था। हाजी साहब मेरे दादा मौलाना शाह अब्दुलरज़्ज़ाक साहब से मिलने उनके आख़िरी वक्त में आए थे। मैं उसको पूरा करने आया था। उन्होंने जो उचित जाना किया, रोगावस्था में उनका बरताव पकड़ के लायक नहीं है। मौलाना लिखते हैं कि देवा शरीफ से बांसा शरीफ उपस्थित हुआ फिर बड़ा गाँव में ठहर गया। स्वप्न में मैंने देखा कि हाजी साहब तथा स्वर्गवासी मेरे दादा साहब दोनों साथ ही आये और हाजी साहब ने कहा ‘तुमको कोई शिकायत है या तुम कुछ नाखुश हुए। आप जानते हैं कि मैं नाख़ुश नहीं हुआ और न मेरे मन में किसी किस्म का कोई ख्याल ही गुजरा। हरजी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा ‘मुझे तुम्हारी ख़ुशी से ही मतलब है। यदि तुम नाख़ुश नहीं हुए तो फिर जिसका जो जी चाहे कहे मुझको इसकी परवाह नहीं।’ बस मेरी आँख खुल गयी। शेख इलताफ हुसेन साहब को मैंने अपने पास बैठा देखा। उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने स्वप्न देखा है कि हाजी साहब क्रोध में मेरी ओर आ रहे हैं और मैं भाग गया। फिर मैंने अपना ख्वाब ब्यान कर उनसे कहा कि तुम उनको फातिहा दिला दो।आपके इख़लाक की मुख्य विशेषता यह थी कि जो आप से मिलता मुरीद होता अथवा नहीं होता। आप सदा के लिए उसके सहायक और दुःखों के साझी बन जाते थे और आजीवन हर प्रकार की सहायता आप द्वारा मिलती रही। प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष आप अपने लोगों के सहायक थे।

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