
ख़ून- आलूदा छुरी
एक रोज़ एक शख़्स को गिरफ्तार करके हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने लाया गया। गिरफ्तारी एक वीरान और गैर-आबाद मक़ाम में हुई थी। गिरफ्तारी के वक़्त उसके हाथ में एक ख़ून आलूद छुरी थी। यह खड़ा हुआ था । एक लाश ख़ाक व ख़ून में तड़प रही थी ।
उस शख़्स ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के सामने इक़बाले जुर्म कर लिया और उन्होंने किसास का हुक्म दिया। इतने में एक और शख़्स दौड़ता हुआ आया और उसने हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के सामने इक़ाबले जुर्म किया। हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने मुल्ज़िमे अव्वल से दर्याप्त किया कि तूने क्यों इक़बाले जुर्म किया? उसने कहा जिन हालात में मेरी गिरफ्तारी की गयी थी मैंने समझा कि उन हालात मौजूदगी में मेरा इंकार कुछ भी मुफीद साबित न होगा। पूछा गया कि बाकियों क्या है? उसने कहा- मैं कस्साब हूं। जहां यह वाकिया हुआ है मैंने वहां बकरी को ज़बह किया था और गोश्त काट रहा था कि मुझे पेशाब लगा। मैं करीब ही पेशाब के लिये बैठा। जब फारिग हुआ तो मेरी नज़र झाश पर पड़ी। मैं उसे देखने के लिये करीब पहुंचा। देख ही रहा था कि गिरफ्तार कर लिया गया । सब लोग कहने लगे कि यही कातिल है। मुझे यकीन हो गया कि इन लोगों के ब्यानात के आगे मेरे ब्यान का कुछ एतेबार न किया जायेगा। इसलिये मैंने इकबाले जुर्म करना ही बेहतर समझा।
अब दूसरे इकबाली मुजरिम से दर्याप्त किया; उसने कहा- मैं एक आराबी हूं। मुफ़लिस (बहुत गरीब) हूं। मक्तूल को मैंने माल के लालच में क़त्ल किया था। इतने में मुझे किसी के आने की आहट महसूस हुई। मैं एक तरफ जा छुपा। इतने में पुलिस आ गयी। उसने पहले वाले मुल्ज़िम को पकड़ लिया। अब जब इसके ख़िलाफ़ फैसला सुना गया तो मेरे दिल ने मुझे आमादा किया कि मैं इस बेगुनाह को कैसे बचाऊं और अपने जुर्म का इक़बाल कर लूं। यह सुनकर मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से पूछा कि तुम्हारी क्या राय है? उन्होंने कहा अमीरुल – मोमिनीन अगर इस शख्स ने एक को हलाक किया है तो एक शख्स की जान भी बचायी है। अल्लाह ने फ्रमाया :
“व मन अहयाहा फ क अन्नमा अहयन्ना स जमीआ”
हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने यह मशवरा कुबूल फ़रमा लिया और दूसरे मुलज़िम को भी छोड़ दिया। मकतूल का ख़ून बहा (कत्ल के बदले जुर्माना ) बैतुल-माल से दिला दिया।
(अत्तुरकुल हिकमिय: फिस स्यासत २ शरईयः सफा ५६ ) सबक : क़ाज़ी व जज को फैसला करते वक्त बड़ी सोच व समझ के साथ और सोच व समझ वालों से मशवरा लेने के बाद फैसला करना चाहिये। यह भी मालूम हुआ कि हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु बड़े दाना (अक्लमंद) और तफक्क: (शरई सूझबूझ वाले) के मालिक थे। यह भी मालूम हुआ कि बड़ा अगर छोटे के मशवरे को बेहतर जानकर उस पर अमल करे तो उसकी बड़ाई में फर्क नहीं आ जाता। जिस तरह कि हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु भी बाज़ औकात हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के मशवरे पर अमल फ्रमा लिया करते थे।

