मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-30

कथा-कहानी सुनना

हुजूर वारिस पाक कथा कहानी बड़े चाव से सुनते थे। जीवन के अन्तिम समय तक जब आप विश्राम करते, किस्से, कहानी सुना करते थे। रात के बारह बजे तक काज़ी बख़्श अली जमींदार गदिया कथा सुनाने का कार्य सम्पन्न करते थे। प्रत्येक दिन नई कथा का आदेश होता था। काज़ी बख़्श अली साहब कहते हैं कि जब भी मैं हुजूर से अलग होता नई कथायें सोचता रहता फिर आने पर आप पूछते ‘इतनी देर तक कहाँ रहे? मैं कह देता कि कहानी सीख रहा था। जब हुजूर पूर्णतः शान्त होते थे मैं चुप हो जाता था। आप संकेतात्मक ढंग से बोलते तथा कथा के उस अवसर से सम्बन्धित दो चार वाक्य दुहराते थे। फिर मैं कहानी आगे बढ़ाता था। जब कभी मैं घोर निंद्रा के प्रभाव में कहानी भूल जाता कि क्या कहें तो आप उस कहानी का पूरा पता देते और कुछ अंश दुहराकर बताते कि यहाँ तक कहा है। प्रत्येक कहानी का फल इतना सुन्दर बतलाते जो अति शिक्षाप्रद होता। कहानी वक्ता जैसे ही अपनी कथा रोकता आप टोक दिया करते थे। सरकार वारिस पाक के कहानी सुनने की छवि निराली थी। आपके कानों में रूई ढूंसी रहती थी। अन्य समय में भी कानों में रूई भरी रहती थी जिसे प्रति दिन बदल दिया जाता था। नमक कथायें प्रेम से सम्बन्धित होती थीं। कभी-कभी दिन में भी यह कार्य हुआ करता था। आपकी बैठकों में चाहें लोग अधिक क्यों न हों आपके लिए सभाओं में एकान्त का दृश्य होता था।

आचरण तथा स्वभाव

सरकार वारिस पाक अपने स्वभाव तथा आचरण में विशेष स्थान रखते थे सत्याचरण आप अधिक पसन्द करते थे। नम्रता तथा विनम्रता की यह दशा थी कि किसी भी दशा में आप कठोर वचन न निकालते और न किसी को घुड़कते और झिझकते थे। कभी अपने पास उपस्थित सज्जनों के मन बहलाव के लिए आनन्दित

करने वाली कुछ बातें कह देते थे किन्तु वह भी सत्यता से खाली नहीं होती थीं। मिसाल के तौर पर:

मौलवी सैय्यद हैदर ग़नी साहब वारसी नकल करते है कि अन्तिम बार वारिस पिया सैय्यद शरफुद्दीन साहब के घर पधारे। यहाँ बहुत तैयारी के साथ सजावट की गयी थी। सरकार वारिस पाक के विश्राम का कमरा मूल्यवान और सुन्दर वस्तुओं से सजाया गया था। जब आप बिदा होने लगे तो बैरिस्टर को सम्बोधित कर कहा ‘बैरिस्टर! अब हम जाते हैं, तुम अपनी सब चीजें देखभाल लो ।’ बैरिस्टर महोदय ने इधर-उधर देखकर कहा ‘सब मौजूद हैं, केवल दिल नहीं मिलता।’ हुजूर पाक ने मुखरित हो बैरिस्टर साहब को गले लगा लिया। जो गुणी और विशेषज्ञ आपकी सेवा में हाज़िर होते आप उन पर विशेष कृपा दृष्टि रखते थे। उसके मनोवांछित पुरस्कार भी उसको प्रदान करते थे। किन्तु कभी भी किसी को यह ज्ञान नहीं हो पाता था कि हुजूर को किस हुनर की ओर का लगाव है। अपनी-अपनी गरज़ और मनोकामना की ओर जब सरकार वारिस पाक का ध्यान गरज़मन्द लोग न पाते तो वह भिन्न-भिन्न ढंग से आपका ध्यान अपनी ओर फेरने के लिए विचित्र उपाय सोचते। कोई पत्थर आपके सामने लाता तथा अपना सर फ़ोड़ने के लिए उतारू होता और कोई चाकू लेकर आत्महत्या करने को दिखाता। आप सहम कर दो चार शब्द आशाजनक कहते और आपका दामन छोड़ देता था। कभी सेवकगण लोगों को इन कार्यों के लिए उसको रोक दिया करते थे। सरकार वारिस पाक जब पैदल चलते तो आपके चलने की गति इतनी तेज होती थी कि तीव्र गति से चलने वाले भी आपके साथ चल नहीं पाते थे। आप अपने मुख की लार निकाल कर तर्जनी अंगुली से अपनी आँखों में लगाते थे। जुमा की नमाज़ कभी नहीं छोड़ते थे। रमज़ान शरीफ के महीने में जब हुजूर वारिस पाक देवा शरीफ में होते तो शाह फ़ज़ल हुसेन साहब वारसी की मस्जिद में दो क़ुरआन शरीफ ख़त्म कराते थे। आप तरावीह (रमजान के महीने की विशेष नमाज़) पढ़ लेने के पश्चात् भोजन लेते थे। सफर की हालत में आप जिस शहर में होते उसी शहर में जुमा और दोनों ईदों के अवसर पर वहाँ के पेश इमामों (नमाज़ पढ़ाने वालों) को छोटा खुतबा पढ़ने की हिदायत करते थे।

प्रत्येक पर्व पर हुजूर क़ुरआन की पच्चीसों प्रतियां मंगवाकर दीन-हीनों में बंटवा दिया करते थे। आपके सामने जब भोजन प्रस्तुत किया जाता तो प्रथम आप यह पूछते थे कि सभी अतिथियों और मेहमानों को भोजन पहुँच गया है। जब लोग बता देते थे कि हाँ सभी मेहमानों को भोजन दे दिया गया है तब आप भोजन ग्रहणकरते थे। बिछौने से तिनके और खर-पतवार आदि आप चुन-चुन कर फेंका करते थे तथा अपने हाथ से बिछे हुए बिछौने को झाड़ते रहते थे। अपने शरीर के प्रत्येक अंगों को एहराम से ढ़के रहते थे। यात्रा सफर में शंका दूर करने हेतु इतने दूर चलें जाते कि लोग आपके अंगों को देख न सकें। जो सेवक आपको स्नान कराते थे वे बदले नहीं जाते थे। आप कभी जोर से नहीं हंसते थे। न कभी आप के हंसने की आवाज ही किसी को सुनायी पड़ती थी। सरकार वारिस पाक बहुधा लोगों को फकीर बनाते और एहराम देते समय फकीर का नया नाम भी रख देते थे। सुरमा कंघा दोनों वक्त होता था। प्रात: और तीसरे पहर आप के सिर में तेल डाला जाता था। कभी आपका सिर सूखा हुआ नहीं देखा गया है। जीवन के उत्तरार्द्ध तक आप बारीक लेखों और घसीट कर लिखे लेखों को पढ़ते देखे गए हैं। चश्मा का प्रयोग आप ने नहीं किया है। और न कहीं हस्ताक्षर ही किए हैं। लोगों के बहुत अनुरोध पर आपने जीवन में दो-चार शब्द अपने हाथ से लिखे हैं जो मिर्जा मुहम्मद इब्राहीम बेग शैदा वारसी तथा काजी बखशिश अली वारसी के यहाँ सुरक्षित हैं। अपने सिलसिला वालों और चेलों के आपसी मेल और प्रेम से आप बहुत प्रसन्न रहते थे। एक बार कहा ‘बैरिस्टर तुम और सफदर हुसेन भाई हो’ बैरिस्टर साहब पटना और सफदर हुसेन साहब जज गोरखपुर के थे । ‘

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