मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-29

महवीयत और इस्तगराक़

शब्दों का अर्थ है निमग्नता और विलीनता । अन्तिम समय में आप सदैव निमग्न और विलीन रहा करते थे। यही कारण था कि आप कौव्वाली तथा किसी प्रकार की मजलिस अथवा महफिल में नहीं जाते थे। यद्यपि हर वक्त आप जागे रहते थे पर नेत्र मूंदे रहते थे, यहाँ तक कि कई वक्त भोजन भी नहीं करते थे। सेवकगण बड़ी कठिनाई से आपको सम्बोधित करते तथा भोजन के तरफ ध्यान दिलाते। नमाज़ अदा करने की यह दशा थी कि जब आप नमाज के लिए खड़े होते तो एक आदमी पास बैठ जाता। जब आप नमाज पूरी कर लेते तो पूछते थे कि नमाज़ ठीक हो गयी। यदि वह कहता कि हो गयी तो ठीक और नहीं तो नमाज़ दुहराते थे।
नमाज़ का हर स्तम्भ आप देर से पूरा करते थे। आपका दैनिक नियम बन गया था कि संध्या के पश्चात् आप अंगुलियों पर कुछ पढ़ते थे। एक बार जब हुजूर शिकोहाबाद से मलावली जिला- मैनपुरी को जाने लगे तो पालकी का पट बन्द करने में आपका अंगूठा दब गया। जब मलावली पहुँचकर पालकी का पट खोला गया तो आपका अंगूठा बाहर आया। अंगूठे में सूजन अधिक थी, देखने से मालूम होता था कि कष्ट भी अधिक होगा किन्तु आपके मुखाकृति पर कष्ट का कोई भाव नहीं था। निमग्नता के कारण आप आने वालों से बार-बार पूछते कि कौन है ? इन्हीं दशाओं में कुछ लोगों को तरह-तरह की शंका पैदा हुई और उन्हें उनका जवाब भी प्राप्त हुआ। ऐसी ही एक घटना चौधरी ख़ुदा बख़्श साहब के सामने प्रकट हुई। एक व्यक्ति के मन में हुजूर वारिस पाक को देखकर यह भावना उपजी कि जब हाजी जी इतने बेसुध हैं कि विशेष सेवकों को कई बार पूछते हैं तो फिर साधारण चेलों को क्या पहचानेंगे ? हुजूर वारिस पाक ने नेत्र खोल दिया और सेवक से कहा इनको तहबन्द ( कमर में लपेटा हुआ वस्त्र जो पाँव तक होता है) दे दो। जब वह तहबन्द लेकर वापस आया और उसको खोल कर देखा तो चारों कोने पर अपना नाम लिखा देखकर हैरान हो गया। अपनी शंका पर लज्जित हुआ।

इसी प्रकार की एक घटना कसीमुद्दीन साहब पेन्शन प्राप्तकर्ता इन्सपेक्टर मद्रास से भी प्रस्तुत हुई। इन्होंने भी अपने मन में सोचा कि जब हाजी साहब की दशा ऐसी है तो फिर अपने चेलों की क्या खोज ख़बर लेंगे। कई बार उनके मन में इस विचार की पुनरावृत्ति होती रही तभी सरकार वारिस पाक का पवित्र शरीर हिला (कसीमुद्दीन साहब स्वयं कहते हैं) और मैंने हुजूर वारिस पाक के माथे के सम्मुख देखा कि पटरी दिखायी दे रही है जिसमें मुरीदों की तस्वीर ग्रुप में दिखायी देती है। जिसमें हुजूर पाक की अचेतन अवस्था में चेतना का पता चलता है।

निमग्नता तथा विलीनता में आपकी ऐसी दशा रहती थी कि आपको अपने शरीर का कोई ज्ञान नहीं रहता था। न तो आपको गर्मी-ठंडी का ज्ञान रह जाता था। किन्तु इस अवस्था में भी जो घटनायें प्रकट होती वह लोगों को चकित कर देती थीं एक बार लोगों ने हुजूर से पूछा कि कौव्वाली में हाल आना (अर्थात् विशेष दशा का होना) कैसा है ? आपने कहा ‘ख़ुदा की रहमत है, बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है।’ फिर किसी ने पूछा अधिकांश लोग हाल लाते हैं, अतः हाल लाना कैसा है ? आपने कहा ‘हराम है और न लाने वाला मरदूद है।’ एक ही प्रकार के दो प्रश्नों के विलोम उत्तर सुनकर लोगों ने पुनः प्रार्थना किया तो आपने बताया प्रथम प्रश्न हाल (रोमांच) आने के सम्बन्ध में था। दूसरा प्रश्न हाल लाने के सम्बन्ध में था। इतनीईश्वर विलीनता और निमग्नता होते हुए भी हुजूर वारिस पाक को प्रश्नों के प्रत्येक शब्द का ज्ञान रहता था। जैसा जो प्रश्न होता था ठीक वैसा ही उत्तर आप से प्रकट होता था। इन घटनाओं से यह सिद्ध है कि आप सदैव एक विशेष दशा में रहते हुए भी प्रत्येक की दशा से भिज्ञ थे। जैसा कि सैय्यद अली हसन साहब अशरफी डाल जीलानी गद्दी नशीन किछौछा शरीफ का कथन है कि लोग यह समझते थे कि पूज्य हाजी, बाबा हमसे बात करते हैं और हज़रत ईश्वर में निमग्न थे। बात करने वाला बात करता भी और उनको ख़बर भी न थी।

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