
यकीन स्थायी विश्वास ही है। अन्य आन्तरिक दशाओं की भांति स्थायी विश्वास भी अन्त: की दशा है। हुजूर वारिस पाक को यक़ीन से विशेष लगाव और संलग्नता थी। आन्तरिक प्रभावों को शब्दों में लाना कठिन किन्तु जाहिरी ढंग से जो बातें हुजूर ने बताया है उनके द्वारा पूर्णतः ज्ञात होता हैं कि वारिस पाक को यक़ीन के सम्बन्ध में कितनी संलग्नता थी। आप किस प्रकार इस विषय की शिक्षा पर ध्यान देते थे। मुन्शी अब्दुल गनी साहब वारसी रईसपुरा और गनी खाँ साहब जिला राय बरेली लिखते हैं कि- युवा काल में हुजूर छूरी-कटार मँगवाकर उनकी तेज धार पर अंगुली फेरते और उनके लोहे की तारीफ करते थे। एक बार मैंने आपकी सेवा में एक अति उत्तम भुजाली प्रस्तुत किया । हुजूर उसकी धार पर अंगुली फेरते और उसकी बड़ाई करते जाते थे। तत्पश्चात् उठे और एक डाल पर चला दिया। डाल कट गई फिर भुजाली लिए हुए मेरी ओर मुड़े, मैंने सिर झुका लिया, नम्र भाव से कहा ईश्वर को धन्यवाद है। मेरा मिटना आपको पसन्द है फिर आपके पैरों पर सिर रख दिया। आपने कहा मरे हुए को क्या मारना है फिर आकर अपनी आसनी पर बिराजमान हुए। आपके हृदय से प्रेम की तरंगें तरंगित हो उठीं तथा प्रसन्नता का भाव आपके मुखाकृत से झड़ने लगा। आप ने कहा ‘आशिक का महबूब की याद में दम निकलता है तथा मरने के पश्चात् आशिक अपने माशूक की सूरत में होता है। जिससे उसको इश्क है वही उसके लिए सब कुछ है। इश्क की राह चलने वालों ने कहा है
जाके हाथ होई अस किल्ली। सो राजा अरू ताकी दिल्ली ॥ (जायसी) इसके पश्चात पुनः आप ने कहा- माशूक के मिलने न मिलने से दुनिया में वास्ता न रखे, जो दिल में समा गया है उसी पर जमा रहे, बेगर्ज तथा निस्वार्थ जो प्रेम है वह एक कलेजा जलाने वाली अग्नि है जिसको इश्क या अनुराग कहते हैं। यह बेअखतियारी वस्तु है। इसका कोई उपाय नहीं है, श्रम से प्राप्त नहीं हो सकता ये अग्नि जिसके हृदय में सुलगती है शरीर त्याग के पश्चात् उसका रूप माशूक का रूप हो जाता है। ‘नहनो अकर ब’ (हम तुम्हारे निकट हैं) समझ चुके हो। खुदा सबमें मौजूद है। विचार करो तथा स्मरण रखो स्त्री-पुरुष के बीच जो करार और कबूलियत (स्वीकार करना) होती है। इस इकरार-प्रतिज्ञा का स्त्री इतना भरोसा करती है कि पुरूष हजार कोस पर भी समुद्र के पार होता है तो भी नहीं भूलती। पति भी अपनी पत्नी को नहीं भूलता, उसी की ओर उसका दिल लगा रहता है। जिस तरह सम्भव हो सकता है उसकी खबर लेता रहता है, केवल दो शब्द इकरार और स्वीकृति के कारण वह तुम्हारी पत्नी कहलाती है तथा तुम उसके पति कहलाते हो। एक क्षण के लिए तुम दोनों एक दूसरे को नहीं भूलते हो। भला विचार करो, सम्पूर्ण अधिकार रखने वाले ईश्वर ने तुमको अपनी सूरत पर बनाया तथा रोज़े अजल (आदि दिवस) में ‘अलस्तो बे रब्बे कुम’ क्या मैं तुम्हारा रब (पालनहार) नहीं हूँ, का स्वत: इकरार किया और तुम भी उत्तर में बोले (हाँ) कहकर वचनवद्ध हुए। अब तुम में उस लगाव के अतिरिक्त जो वास्तविक और छुपा हुआ है अर्थात तौहीद का रहस्य है। इस कौल करार पर इतना तो भरोसा अवश्य होना चाहिए जितना एक पत्नी अपने पति पर करती है तथा उपस्थित अनुपस्थित में उसे अपना जानती है। यह कितना उच्च पद है सर्व शक्तिमान ईश्वर ने तुमको अपनी सूरत प्रदान किया और अपने को तुम्हारा पालन-पोषण करता हुआ ठहराया। तुमने भी बन्दगी का वचन दिया तथा अपना नाम रोजी-रोटी देने वाला (रज्जाक) रखा। तुम्हें शक और सन्देह है। पूर्णरूपेण ईश्वर पर विश्वास भी नहीं करते। इतना भी भरोसा नहीं जितना कि पत्नी के प्रति भरोसा है। मुन्शी अब्दुल गनी साहब वारसी जो वहां उपस्थित थे वर्णन करते हैं कि आपके इस प्रभावशाली भाषण से उपस्थितगण की दशा विचित्र हो गयी। सभी रोमांचित हो उठे तथा नेत्रों से आंसू छलक पड़े। यक़ीन से सम्बन्धित वारिस पाक के कुछ कथन निम्नांकित हैं : १. यक़ीन विश्वास का प्राण है। जिसमें यक़ीन की कमी है उसमें सदाकद –
(विश्वास) की भी कमी है।
२. जिनकी दृष्टि दोस्त पर है उनका कोई दुश्मन नहीं है।
३. खुद्रा पर भरोसा करो वह स्वयं तुम्हारा प्रबन्धक है। यदि कोई अपना उपाय करता है तो वह अलग खड़ा होकर तमाशा देखता है और फिर कुछ नहीं होता।
४. हज़ार कोस से पति अपनी पत्नी की फिक्र रखता है (हृदय की ओर संकेत करते हुए) और जो तुम्हारे भीतर है वह नहीं फिक्र करेगा।
५. जिसके मन में ये हो कि देखिए यह काम हो कि न हो यह कार्य नहीं होता क्योंकि दुविधा में पड़ा है। बल्कि ऐसा होना चाहिए तो जरूर होगा।
विश्वास और यकीन कितनी सुदृढ़ शिक्षा है, ईश्वर से किसी हालत में निराश नहीं होना चाहिए। क़ुरआन शरीफ में आया है ‘व मंय्युकनुत मिर्रहमते रब्बेही निराश नहीं होता है।
इल्लद्दालून’ पथ भ्रष्टों के अतिरिक्त ईश्वर की दया से कोई दूसरी तरह से इस प्रकार कहते हैं ‘अपना हाथ किसी के सामने न फैलाये चाहे मर जाए, खुदा से भी न कहे, चाहे कैसी तकलीफ हो।’ क्या अल्लाह नहीं देखता ? किसी स्त्री का शौहर हज़ार कोस पर भी हो तो अपनी बीवी की खबर रखता है। अल्लाह तो अपने पास है। क्या वह नहीं देखता ? हुजूर वारिस पाक के उच्च कथन से सिद्ध है कि अपनी इच्छाओं और अभिलाषाओं से बेफिक्र होना चाहिए। ईश्वर स्वयं जिम्मेदार है। उसके अस्तित्व पर पूर्ण विश्वास और भरोसा रखना ही सब कुछ है। जैसा बायजिद बसतामी रह० का कथन है:
मैंने ३० वर्षों तक ईश्वर को तलाश किया और जब मिल गया तो ज्ञात हुआ कि मैं स्वयं को ही ढूंढ रहा था। यदि ईश्वर पर विश्वास और भरोसा हो तो प्रत्येक काम आसानी से हो सकता है क्योंकि ईश्वर ने स्वयं सब कार्यों का भार ग्रहण किया है। ईश्वर से अधिक किसी पर भरोसा करना अनर्थ और व्यर्थ है। ‘व तवक्कलों अलल हय्यइल्लज़ी लायमूतो’ अनुवाद – भरोसा करो उस पर जो जीवित और अविनाशी है। हुजूर की हिदायत इसी बुनियाद पर होती है। अपना हाथ किसी के सामने न फैलायें चाहे मर जाएं। ख़ुदा पर और उसकी दया पर ऐसा विश्वास होना चाहिए कि अपनी जरूरत कहने की भी इच्छा न हो। इस पूर्ण विश्वास के लिए कहते हैं खुदा से भी न कहे चाहे कैसी भी तकलीफ हो और फिर समझाया जाता है क्या अल्लाह नहीं देखता ? और स्वयं उदाहरण भी देते हैं कि किसी औरत का शौहर यदि हज़ार कोस पर हो तो अपनी पत्नी की खबर अवश्य रखता है और अल्लाह तो अपने पास है क्या वह नहीं देखता? साराँश यह है कि दृढ़तापूर्वक ईश्वर पर विश्वास करना चाहिए। जैसा उमर फारूक रजी० कहते हैं कि ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखो वह तुमको रोज़ी ऐसे पहुँचाएगा जैसे पंछियों को रोजी पहुंचा देता है। अध्यात्मवाद का यह उच्च पद है कि किसी के सामने माँगने हेतु हाथ न फैलाऐं । संसार और संसार वालों से बेगरज हो जाऐं। यहिया मो आज राजी का कथन है कि कयामत (प्रलय) के दिन धनाठयता कुछ भार रखती होगी और न फकीरी। यदि भार होगा तो सब्र और शुक्र का। लोगों ने आप से पूछा कि दुनिय में परहेजगारी किसकी अधिक जानना चाहिए। उत्तर मिला जिसका यकीन बढ़ा हुआ है। हुजूर वारिस पाक का कथन है कि जो व्यक्ति अपनी तदबीर और कोशिश करता है अल्लाह मियाँ उससे अलग रहते हैं। क्योंकि वह स्वयं अपना कार्य करता है। जो अल्लाह के भरोसे पर बैठ जाता है उसका कार्य स्वयं अल्लाह करता है। यही स्थान यक़ीन का है जो उच्च पद का परिचय देता है। जो अत्यन्त तपस्या बन्दगी के पश्चात् प्राप्त होता है। ‘वाबोदो रब्बक हता याते यकल यकीन’ अर्थात् अपने पालनकर्ता (रब) की इतनी बन्दगी करो कि तुमको यक़ीन हो जाए। यही यकीन है जो ईश्वर पर भरोसा करने वालों तथा ईश्वर के पुजारियों को सम्पूर्ण संसार से बेफिक्र कर देता है। उनके प्रत्येक कार्य में ईश्वर का हाथ होता है। सवा-सनाविल के अधिष्ठाता ने लिखा है कि फतह मूसली रह० हज करने जा रहे थे। राह में एक अवयस्क लड़के को देखा कि बिल्कुल सामान-रहित दीन-दशा में आ रहा है। फतह मूसली रह० ने पूछा कि ऐ बालक कहां से आ रहे हो? उसने उत्तर दिया-मक्का से। फतह मूसली ने कहा, अभी तुम बालक हो, तुम्हारे लिए यात्रा कष्ट अनिवार्य नहीं है।’ पुनः लड़के ने कहा ‘इस क्षणिक और नाशवान जीवन का कोई भरोसा नहीं है, मैंने देखा है कि हमसे छोटे बच्चे मरते और दफन किए जाते हैं।’ फतह मूसली ने कहा ‘तुम्हारे पास कुछ सफर-खर्च है।’ लड़के ने उत्तर दिया ‘जिस स्थान पर मैं रहता हूँ, मेरे लिए राह – खर्च विश्वास और यकीन होता है। मेरी सवारी मेरे दोनों हाथ-पाँव एवं दूसरी सवारी प्रेम और शौक है। इन्हीं के द्वारा मैं यात्रा करता हूँ।’ फतह मूसली ने कहा-मेरा अर्थ इससे नहीं, खानेपीने के सामानों से है। लड़के ने कहा, ‘मुझे एक बात का जवाब दीजिए, वह यह है कि यदि आपके मित्रों में से कोई मित्र आपके घर आए तो क्या आप पसन्द करते हैं कि वह अपने घर से खाने-पीने की सामग्री अपने साथ लाए? मूसली ने कहा-हर्गिज नहीं, कदापि नहीं। पुनः उस लड़के ने कहा, ऐ दुर्बल विश्वास वाले! मेरा ईश्वर जो अनगिनत पापियों और अन्य लोगों तथा अतिथियों को रोजी देता है तो वह मुझे अपने घर बुलाकर खाना पीना न देगा। यही वह यक़ीन विश्वास है जो ब्रह्मज्ञानियों को प्राप्त विभिन्न कथन
हुजूर वारिस पाक की वाणी, कथन जहाँ तक प्राप्त हो सके हैं पाठकों के लिए अंकित किए जाते हैं:
१. अपनी वज़ा पर कायम रहो।
( अपने जीवन यापन का सदैव एक ढंग स्थिर रखें।)

