
ग़ज़वए ख़ैबर को जाते हुए हज़रत आमिर इबनुल अकवा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कुछ अशआर पढ़ रहे थे। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन अशआर को सुनकर फरमाया यह कौन है? सहाबए किराम ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) यह आमिर हैं हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया
इस पर अल्लाह रहमत फ़रमाये और चूंकि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसी जगह किसी ख़ास शख़्स के लिये दुआए रहमत फ़रमाते थे तो वह शख्स शहीद हो जाता था। इसलिये हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फैसला सुनकर हज़रत फारूके आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु बोल उठेः या रसूलल्लाह! आपने हमें इनसे नफा क्यों न लेने दिया? अब तो वह इस लड़ाई में शहीद हो जायेंगे। हुजूर! आप इन्हें अभी ज़िन्दा रखते ताकि हम इनसे फ़ायदा हासिल करते । (बुखारी शरीफ सफा ६०३)
सबक़ : सहाबए किराम रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम का ईमान था कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिस शख़्स को ज़िन्दा रखना चाहें, जिन्दा रख सकते हैं। जिसके मुतअल्लिक किसी मौके पर फ़रमा दें उसके लिये शहादत वाजिब हो जाती है। फिर जो शख़्स यह कहे कि रसूल के चाहने से कुछ नहीं होता वह किस कद्र जाहिल है ।

