
जंगल का शेर
हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को एक सहाबी जिनका नाम सफ़ीना था, एक दफ़ा एक किश्ती में सवार हुए । इत्तिफाक से किश्ती टकरा कर टूट गयी । हज़रत सफ़ीना एक तख़्ते पर बहते हुए चले गये। कुछ देर के बाद वह तख़्ता एक किनारे पर आ लगा। हज़रत सफ़ीना वहां उतरे तो एक जंगल में जहां शेर और दरिन्दे थे, जा पहुंचे। एक शेर ने जब आपको देखा तो आप पर हमला करने को दौड़ा। हज़रत सफ़ीना ने पुकार कर कहा ख़बरदार ऐ शेर! देख मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुलाम हूं। यह सुनते ही शेर ने अपना सर झुका लिया और हज़रत सफ़ीना के पास पहुंचकर अपनी दुम हिलाने लगा और अपने इशारे से हज़रत सफ़ीना को अपने पीछे लगाकर आपको एक ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया जिसपर चलकर हज़रत सफ़ीना सही सालिम घर पहुंच गये। )
(हुज्जतुल-लाह अलल-आलमीन सफा ८७३, मिश्कात शरीफ सफा ५३७ सबक़ : सहाबाए किराम की वह अज़मत थी कि जंगल के शेर भी उनके गुलाम थे। जो सहाबाए किराम के गुलाम हैं वही दरअसल शेर हैं।

