Barkat us Sadaat part 14 सादात को बरोज़ क़यामतहुज़ूर की निस्बत काम आएगी।

सादात को बरोज़ क़यामत
हुज़ूर की निस्बत काम आएगी

इस बारे में नबी अकरम की बहुत सारी सहीह अहादीस हैं कि एहले बैत किराम/ सादात किराम की आपके साथ निस्बत (नस्बी व हस्बी) उनके लिए दुनिया और आखिरत में नफा बख़्शने वाली और मुफीद व मोस्सिर है। उनमें से एक वह रिवायत है जिसे इमाम अहमद और हाकिम ने बयान किया है कि नबी अकरम K ने फ़रमायाः

(1) फातिमा मेरे जिगर का टुक्ड़ा है, जो चीज़ उसे नागवार करती है वह मुझे भी नागवार करती है और जो चीज़ उसे मुसर्रत व फरहत बख़्शती है वह मुझे भी खुशगवार करती है, कयामत के दिन सारे रिश्ते खत्म हो जाऐंगे, सिवाए मेरी कुराबत (रिश्तेदारी) और मेरे खान्दान वास्ते और मेरे दोनों ऐतराफ के सुस्राली रिश्तों के (सबबी निस्बत से मुराद उन गुलामों का तअल्लुक है जो आपके आज़ाद कर्दा थे)।

(2) हुज़ूरे अकरम के साथ खान्दानी निस्बत दुनिया व आख़िरत में नफा बख़्श है, उनमें से एक आपका यह कौल है, जिसे इब्ने असाकर ने हज़रत उमर फारूक आज़म से रिवायत किया है। फ़रमाया: क़यामत के दिन तमाम आबाई निस्बतें और सुसराली रिश्ते ख़त्म हो जाऐंगे, सिवाए मेरे खान्दानी और सुसराली रिश्ते के। ( 3 ) तिबरानी और दूसरे मुहद्दिसीन ने एक लंबी रिवायत बयान की है कि नबी करीम ने फरमायाः

उस क़ौम का अंजाम क्या होगा जो यह समझती है कि मेरी कुराबत कोई नफा नहीं पहुंचा सकती, बेशक कयामत के दिन तमाम सबबी रिश्ते (आज़ाद कर्दा गुलामों के रिश्ते) और नस्बी (खान्दानी) रिश्ते खत्म हो जाऐंगे सिवाए मेरे नसबी और सबबी रिश्तों के और इसमें कोई शक नहीं है कि मेरे साथ खान्दानी तअल्लुक की निस्बत दुनिया और आखिरत में लाज़वाल और गैर मुनकृता है उसे कोई भी ख़त्म नहीं कर सकता।”

(4) इमाम अहमद, हाकिम और बैहकी ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद से रिवायत किया है कि उन्होंने फ़रमायाः

मैंने रसूल को मिंबर पर फरमाते हुए सुना कि इस कौम का अंजाम क्या होगा जो कहते हैं कि रसूलुल्लाह से क़राबत उनकी कौम को क़यामत में कोई फायदा नहीं पहुंचाएगी, हाँ अल्लाह की कसम! मेरी क़राबत दुनिया और आखिरत में जिंदा और मौजूद रहेगी। जो कभी नहीं कट सकती और ऐ लोगो! मैं हौज़ कौसर पर तुम्हारे लिए तोशा आख़िरत बन कर इंतिज़ार करूंगा। (5) हुजूरे अकरम ने फ़रमायाः

मेरे नसब के अलावा तमाम खान्दानी रिश्ते कयामत के दिन ख़त्म हो जाऐंगे।

(मुस्नद अहमदुल मुस्तदरक लिलहाकिम जि. 3, स. 158, इतहाफुल साईल स. 63 इमाम अब्दुल रऊफु मनादी)

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