शहंशाह~ए~मालवा मौलाना कमालुद्दीन रह0 की मालूमात और धार का इतिहास

शहंशाह~ए~मालवा मौलाना कमालुद्दीन रह0 की मालूमात और धार का इतिहास

इंदौर के करीब ऐतिहासिक नगरी धार में मौजूद है मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती की मशहूर दरगाह , जिन्हें शहंशाह~ए~मालवा का खिताब हासिल है।

रजिया सुल्ताना की हुकूमत थी तब आपकी पैदाईश 1236 ईस्वी में दिल्ली में हुई। आप अपने पीरो मुर्शीद हजरत निजामुद्दीन औलिया से सिर्फ 2 साल छोटे थे।

मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती दिल्ली में पैदा और बड़े हुए।
55 साल की उम्र में अपने पीरो मुर्शीद हजरत निजामुद्दीन औलिया की इजाजत का परवाना लेकर मालवा आए।
उज्जैन में आपने मौलाना मौज रह0 के हुजरे में कयाम किया। क्षिप्रा के टीले पर 40 दिन चिल्ला करने के बाद मौलाना मौज सरकार के भाई अरीठे वाले बाबा उर्फ मौलाना ग्यासुद्दीन रह0 के साथ धार रवाना हुए।

ये सन 1291 की बात है।
ख़्वाजा गरीब नवाज रह0 को अजमेर तशरीफ लाए 100 साल गुजार चुके थे और बलबन के पोते को मारकर सुल्तान फिरोजशाह खिलजी की हुकूमत दिल्ली में शुरू हो चुकी थी। उसी वक्त दिल्ली में मौलाना सीदी की हत्या वाली घटना भी घटी । इधर धार में पुरानी भोजशाही शानो~शौकत धूल में मिल चुकी थी। नाममात्र मुसलमान धार में रह रहे थे। मदरसे और मस्जिद भी नहीं थी। इस्लामी इदारे बिल्कुल नहीं थे। ऐसे मुश्किल हालात में मौलाना साहब धार तशरीफ लाए।

आखरी भोज राजा ( अर्जुन वर्मन) अपने मंत्रियों कोका और गोगा की कठपुतली बना कभी धार तो कभी मांडव भटकता फिरता था। ऐसे माहौल में मौलाना कमालुद्दीन रह0 ने धार में रहकर इस्लाम का खूब प्रचार~प्रसार किया। नतीजन हजारों मुरीद बन गए। आपने खूब तकलीफे झेली फिर भी दीन की खिदमत में लगे रहे। करीब 15 बाद धार की किस्मत चमकी।

24 दिसंबर 1305 यानि मौलाना साहब के धार आने के करीब 15 साल बाद दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने मांडव फतह करने के लिए आइन~उल~मुल्क मुल्तानी को धार भेजा। नालछा के पास सागर तालाब किनारे आखरी भोज राजा अर्जुन वर्मन मारा गया और कोका और गोगा भी सोनगढ़ में धर लिए गए। इस तरह धार फतह हुआ। मालवा में मुस्लिमों की हुकूमत कायम हो गई।

आईन~ऊल~मुल्क मुल्तानी को मालवा का सूबेदार बना दिया गया इस तरह उसके साथ आए हजारों मूसलमान सैनिक , सरकारी नुमाइंदे और व्यापारी धार में रौनक अफ़रोज़ हुए और धार में मुसलमानों की आबादी में अचानक इजाफा हो गया। चारों तरफ मुसलमान ही मुसलमान नजर आने लगे। इस तरह धार में मुसलमान आबाद हुए। आलीशान मस्जिदें तामीर हुई। मानचीन मदरसे कायम हुए। धार अब पीराने धार बनने की राह पर चल पड़ा।

दगा किसी का सगा नहीं होता….
720 हिजरी में धार का हसन उर्फ खुसरो खान
दिल्ली के सुलतान मुबारक शाह की हत्या करके खिलजी वंश का नामो निशान मिटाकर सुलतान बन बैठा। इसी खुसरो खान को मारकर ग्यासुद्दीन तुगलक दिल्ली में काबिज हुआ। सुलतान ग्यासुद्दीन और हजरत निजामुद्दीन में बिल्कुल भी नहीं पटती थी।

वो दिन भी आया जब निजामुदीन औलिया ने कहा हनोज दिल्ली दूर अस्त…. मुंहज़ोर सुलतान ग्यासुद्दीन तुगलक की हुकूमत का सूरज भी अस्त हो गया। 18 रबी उल अव्वल को प्रॉस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने और पेशाब में तकलीफ होने से हजरत निजामुद्दीन औलिया रह0 की तकलीफ बढ़ गई और मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के पीरो मुर्शीद ने परदा फरमा लिया।

इधर ग्यासुद्दीन का बेटा मोहम्मद बिन तुगलक हिंद का सुलतान बना और चिश्ती सिलसिले की बागडोर भी मेहमूद चिराग देहलवी रह0 के हाथों में आ गई। इस तरह हिंद में शाही हुकूमत और चिश्ती खिलाफत दोनों बदल गई।

धार में रहते हुए हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रह0 को तकरीबन 40 साल हो चुके थे। आपने दिल्ली के करीब 6 सुलतानों की हुकूमत और मालवा में परमारोंं की राजशाही से लेकर खिलजी और तुगलकों की सूबेदारी तक देखी। मौलाना कमालुद्दीन का परिवार 1320 तक धार में बस चुका था। धार में मुसलमान जम चुके थे।

एक जमाने में जिस धार में सिर्फ अजान देने पर 40 पीरो को शहीद कर दिया गया था। मौलाना कमालुद्दीन की 40 साल की मेहनत से उसी धार में अब चारों तरफ अल्लाह~हो~अकबर की सदाएं गूंज रही थी। मौलाना कमाल रह0 ने कमाल कर दिया था।

ग्यासुद्दीन का बेटा सनकी सुलतान मोहम्मद बिन तुगलक दिल्ली को तबाह और बर्बाद करके तुगलकाबाद बसाने निकला। बस इसी दरमियान जिलहिज्ज 731 हिजरी के मुताबिक 1330 ईस्वी में हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रह0 ने 94 साल की बुजुर्गी में पर्दा फरमा लिया।

मौलाना कमाल रह0 की दरगाह के दरवाजे पर आपके पर्दा फरमाने के 130 साल बाद मांडव के सुलतान मेहमूद खिलजी द्वारा लगवाया गया संग~मरमर का निहायत खूबसूरत खुतबा लगा है , जिसे मैंने भी पढ़ा है।
उस पर सुलतान मेहमूद ने दरगाह की तारीफ में लिखा है….. 👇

“कुत्बे जमा कमालुद्दीन साहब का रोजा निहायत हसीन और जमील है। परदेसी जायरीन के लिए इसमें ठहरने की जगह काफी है। दोनों गुंबद और दरवाजे महफूज हैं। इस खानगाह और महराबों के कंगूरे चांद की मानिंद हैं। हर अहले दिल और हर साहिबे हाल इसमें सहूलियतें मौजूद है। महल नुमा इस दरगाह की तामीर 861 हिजरी में मुकम्मल हुई। ए दीन और दुनिया के बादशाह मैं तेरी दरगाह का अदना भिखारी हूं इससे ज्यादा और क्या कहा जाए कि ये सुलह आम दरबार है।”

22 दिसंबर 2022 से 26 दिसंबर 2022 तक हजरत कमालुद्दीन चिश्ती रह0 का 691वां उर्स मनाया जाएगा।

बेशक दोस्तों हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रह0 की दरगाह धार की जमीन पर जन्नत का टुकड़ा है

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s