ग़में हिज (जुदाई का ग़म)

ग़में हिज (जुदाई का ग़म)

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बड़ी मुहब्बत थी। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जब विसाल हो गया तो आप मदीने की गलियों में यह कहते फिरते थे कि लोगो! तुम ने कहीं रसूलुल्लाह को देखा है तो मुझे भी दिखा दो या मुझे आपका पता बता दो। फिर आप इस जुदाई के ग़म में मदीना को छोड़कर मुल्के शाम के शहर हल्ब में चले गये ।

एक साल के बाद आपने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ख़्वाब में देखा । हुजूर ने आपसे फ़रमायाः कि ऐ बिलाल! तुमने हमसे मिलना क्यों छोड़ दिया? क्या तुम्हारा दिल हमसे मिलने को नहीं चाहता? हज़रत बिलाल यह ख़्वाब देखकर ऐ आका! गुलाम हाज़िर है कहते हुए उठे और उसी वक्त रात को ऊंटनी पर सवार होकर मदीने को चल पड़े। रात दिन बराबर चलकर मदीना मुनव्वरा में दाखिल हुए हज़रत बिलाल पहले सीधे मस्जिदे नब्बी में पहुंचे। हुजूर को ढूंढा मगर हुजूर को न देखे फिर हुजरों में तलाश किया। जब वहां भी न मिले तब मज़ारे अनवर पर हाज़िर हुए और रोकर अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! हल्ब से गुलाम को यह फ़रमाकर बुलाया कि हमसे मिल जाओ और जब बिलाल ज़्यारत के लिए हाज़िर हुआ तब हुजूर पर्दे में छुप गये। यह कहकर आप बेहोश होकर क़ब्रे अनवर पर गिर गये। बहुत दें में जब आपको होश आया तो लोग क़ब्रे अनवर से उठाकर बाहर लाये। इस अरसे में बिलाल के आने का सारे मदीने में गुल हो गया कि आज हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मोअज्ज़िन बिलाल आये हैं।
सबने मिलकर बिलाल से दरख्वास्त की कि अल्लाह के लिए एक दफा वह अजान सुना दो जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सुनात थे। बिलाल फ़रमाने लगे दोस्तो! यह मेरी ताकत से बाहर है क्योंकि मैं हुजूर की उस दुनियावी जिन्दगी में अज़ान कहा करता था जो जिस वक्त अश हदु अन न मुहममदर्रसूलुल्लाह कहता था तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सामने आंखों से देख लेता था । अब बताओ कि कैसे देखूंगा मुझे इस ख़िदमत से माफ़ करो। हर चंद लोंगों ने इसरार किया। मगर हज़रत बिलाल ने इंकार ही किया। बाज़ सहाबा की यह राय हुई कि बिलाल किसी का कहना न मानेंगे । तुम किसी को भेजकर हज़रत हसन व हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम को बुला लो। अगर वह आकर बिलाल से अज़ान की फरमाईश करेंगे तो बिलाल ज़रूर मान जायेंगे। क्योंकि हुजूर के अले- बैत से बिलाल को इश्क़ है। यह सुनकर एक साहब हज़रत हसन व हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम को बुला लाये । हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आकर बिलाल का हाथ पकड़ कर फरमाया कि ऐ बिलाल ! आज हमें भी वही अजान सुना दो जो हमारे नाना जान को सुनाया करते थे। हज़रत बिलाल ने इमाम हुसैन को गोद में बैठा कर कहा तुम मेरे महबूब के कलेजे के टुकड़े हो । नबी के बाग़ के फूल हो। जो कुछ तुम कहोगे, मंजूर करूंगा। तुम्हें रंजीदा न करूंगा। कि इस तरह हुजूर को मज़ार में रंज पहुंचेगा और फ़रमाया हुसैन मुझे ले चलो, जहां कहोगे अज़ान कह दूंगा। हज़रत हुसैन ने हज़रत बिलाल का हाथ पकड़कर आपको मस्जिद की छत पर खड़ा कर दिया। बिलाल ने अज़ान कहना शुरू की। अल्लाहु अकबर! मदीना मुनव्वरा में यह वक़्त अजब ग़म और सदमे का वक़्त था। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को विसाल फ्रमाये हुए एक ज़माना हुआ था आज महीनों के बाद अज़ाने बिलाल की आवाज़ सुनकर हुजूर की दुनियावी हयाते मुबारक का समां बंध गया। बिलाल की आवाज़ सुनकर मदीना मुनव्वरा के बाज़ार गली कूचों से आकर लोग मस्जिद में जमा हुए। हर एक शख़्स घर से निकल आया। पर्दे वाली औरतें पर्दे से बाहर आ गयीं। अपने बच्चों को साथ लायीं । जिस वक्त बिलाल ने अशहदु अन न मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह मुंह से निकाला। हज़ारहा चीखें निकलीं। उस वक्त रोने का कोई ठिकाना न था । औरतें रो रही थीं, नन्हें नन्हें बच्चे अपनी माओं से पूछते थे कि तुम बताओ कि बिलाल मोअज्ज़िन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आ गये मगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना कब तशरीफ लायेंगे? हज़रत बिलाल ने जब अशहदुअन न मुहम्मर्दुरसूलुल्लाह मुंह से निकाला और हुजूर को आंखों से न देखा तो हुजूर के गमे हिज्र में बेहोश होकर गिर गये। बहुत देर के बाद होश में आकर उठे और रोते हुए मुल्के शाम वापस चले गये।

(मदारिजुन नुबुव्व:-जिल्द २, सफा २३६) सबक: हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम विसाल शरीफ के बाद जिन्दा हैं। अपने चाहने वालों को शर्फे ज्यारत से मुशर्रफ फ़रमाते हैं। अपने सहाबए किराम के हर छोटे बड़े मर्द व औरत को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बेहद मुहब्बत थी। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्रे ख़ैर सुनने के बाद सब बेचैन रहते थे। सहाबा के दिल में अले- बैत की बड़ी मुहब्बत थी ।

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