इस्तिकलाले बिलाल

इस्तिकलाले बिलाल
(बिलाल का साबिते कदम रहना )

1 हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जब इस्लाम ले आये तो आपको तरह तरह की तकलीफें दी जाने लगीं । उमैया बिन ख़ल्फ जो मुसलमानों का बदतरीन दुशमन था। जिसके आप गुलाम थे, आपको सख्त गर्मी में दोपहर के वक़्त तपती हुई रेत पर सीधा लिटा कर उनके सीने पर पत्थर की बड़ी चट्टान रख देता था ताकि वह हिल न सकें। कहता था कि इसी हाल में मर जाओ अगर ज़िन्दगी चाहते हो तो इस्लाम छोड़ दो। मगर हज़रत बिलाल इस्लाम में ऐसे सरमस्त थे कि इन मुसीबतों की बिल्कुल परवाह न फरमाते । ज़ालिम आपको रात के वक़्त जंजीरों में बांध देते और कोड़े मारते। अगले दिन उन ज़ख़्मों को गर्म ज़मीन पर डाल कर ज़्यादा जख्मी करते। ताकि बेकरार होकर इस्लाम से फिर जाएं या तड़प-तड़प कर मर जाएं। मगर अल्लाह रे इस्तिकलाले बिलाल ! आप इश्के हक में ऐसे सरशार थे कि अहद अहद के नारे लगाते और यादे हक में गोया यही फरमाते थेहलक़ पर तेग़ रहे सीने पे जल्लाद रहे । लब पे तेरा नाम रहे दिल में तेरी याद रहे ।।

एक दिन हज़रत सिद्दीके अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आपको इस हाल में देखा तो उनको ख़रीदकर आपको आज़ाद करा दिया। आपको इस इश्क़ व इस्तिक्लाल का यह सिला मिला कि आप बारगाहे मुस्तफ़वी के मोअज्ज़िन बने और सफ़र व हज़र में हमेशा अज़ान की ख़िदमत उन्हीं के सुपुर्द होती । (असदुल गाबा व हिकायातुस-सहाबा सफा १२) सबक़ : दुशमनाने दीन ने अल्लाह वालों पर हमेशा सख़्तियां कीं । अल्लाह वालों ने हज़ारहा मुसीबतों के बावजूद अम्न व इस्तिक़लाल को कभी न छोड़ा। हज़रत सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु बड़े ही सखी और मुसलमानों के खैरख़्वाह थे।

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