शहद की मक्खियां


शहद की मक्खियां

अज़ल और कारह के चंद मुनाफिक हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुए। कहने लगे कि हमारे साथ चंद मुबल्लिग ( तबलीग करने वाले) रवाना कर दीजिये जो हम लोगों को दीन की बातें सिखाया करें। हम लोग शरीअत के अहकाम सीख लें। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दस असहाब, जिनके सरदार हज़रत आसिम बिन साबित रज़ियल्लाहु तआला अन्हु थे, उनके हमराह रवाना कर दिये । यह लोग जब मकामे रजीअ पर पहुंचे तो मुनाफ़िक़ीन ने बद- अहदी करके क़बीलए बन लहयान के दो सौ आदमियों को साथ मिलकर उन दस सहाबा पर हमला किया। हज़रत आसिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु म अपने सात साथिय के शहीद हो गये और हज़रत आसिम ने शहादत से पहले यह दुआ पढ़ीयानी “ऐ अल्लाह मैंने तेरे दीन की हिमायत में जान दी । अब तू इन काफिरों के हाथ से मेरे बदन को बचा।”

यानी मेरी लाश उनके हाथ न लगे। चुनांचे मुनाफ़िक़ीन हज़रत आसिम का सिर काटने के इरादे से आगे बढ़ने लगे तो अल्लाह तआला ने फ़ौरन शहद की मक्खियों का एक लश्कर भेज दिया। जिन्होंने हज़रत आसिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की लाश मुबारक पर पर्दा डाल दिया और किसी काफिर को पास फटकने न दिया। जब रात हुई तो खुदा तआला ने एक ऐसा सैलाब भेजा कि हज़रत के बदन मुबारक को बहा ले गया और काफ़िर ख़ाइफ व ख़ासिर फिरे (तारीखे इस्लाम सफा ११८ व मिस्लिही फी हुज्जतुल्लाह अलल-आलमीन सफा ८६६)

सबक सहाबए किराम दीन की ख़ातिर ज़िन्दा रहे और दीन ही की हिमायत में वह जान भी देते रहे। यह भी मालूम हुआ कि रसूलुल्लह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के यारों से दुशमनी व अदावत मुनाफ़िक़ीन का काम है।

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