गुस्ताख-ए-सहाबा कौन.?

🔥गुस्ताख-ए-सहाबा कौन.?🔥

✍️ सही हदीस से साबित है कि नबी करीम सल्ल० ने लोगों को मना किया है कि लोग मेरे सहाबा किराम को बुरा-भला नही ना कहें और ना ही इनकी तौहीन करें।
बेशक.. यकीनन सहाबा किराम की तौहीन या बे-अदबी नहीं करना चाहिए लेकिन इस हदीस के सहारे से लोग मुनाफिकों को बचाने की भी भरपूर कोशिश करते हैं इसलिए अगर हम किसी शख्सियत को बुरा भला कहते हैं या उसके काले कारनामों को सबके सामने लाते हैं तो यकीनन हम उसे सहाबा किराम मानते ही नहीं हैं बल्कि उसे हम मुनाफिक मानते और समझते हैं।
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सहाबा किराम की इज्जत पर जोर देने वालों को चाहिए कि वह सबसे पहले किसी को सहाबा की फेहरिस्त में शामिल ना करें जब तक कि उसके सीरत और कारनामों को ना जांच-परखकर देख लें वरना लफ्ज सहाबा की तौहीन होगा..
कुरान मजीद से यह बात साबित है कि फत्ह से पहले जो सहाबा किराम ईमान लाएं वो, बाद में ईमान लाने वाले ताबाईन से अफजल हैं और इसमें कोई शक या इख्तिलाफ नहीं कि जंगे उहद में शहीद होने वाले सभी सहाबा किराम फत्ह मक्का के दिन ईमान लाने वाले माविया से बेहतर और अफजल हैं…
ये अलग बहस है कि यहां फत्ह से मुराद फत्हे मक्का है या सुलह हुदैबिया है- बहरहाल इन दोनों में जो भी हर हाल में यह बात वाजेह हो जाता है कि बद्री सहाबा या जंगे उहद में शहीद होने वाले सहाबा किराम माविया से काई गुना बेहतर हैं..
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एक तरफ तो सहाबा किराम की ताजीम करने पर जोर दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर सहाबा किराम को कत्ल करने-करवाने वाले और मुहम्मद मुस्तफा सल्ल० के प्यारे चचा सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु की लाश की बे-हुर्मती करने वाले को भी सहाबा कहकर ताजीम कराया जा रहा है…
ये बात बिल्कुल ऐसा ही है कि जैसे मौला अली अलैहिस्सलाम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की भी ताजीम किया जाता है वहीं मौला अली अलैहिस्सलाम के कातिल इब्ने मुलजिम को लोगों ने सहाबा की फेहरिस्त में शामिल किया है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कातिल अम्र बिन साद को भी सहाबा कहकर ताजीम कराया जाता है…- तो नबी करीम सल्ल० की ये हदीस सुनाकर भी लोगों को चुप नहीं करा सकते कि सहाबा को बुरा भला मत कहो क्योंकि नबी करीम सल्ल० जिन सहाबा की ताजीम का हुक्म देते हैं वो और हैं और इन मुनाफिकों को तुम सहाबा कहकर ताजीम करा रहे हो वो और हैं…
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माविया की इख्तिलाफी बाप अबू सुफियान ने जंगे ओहद में नबी करीम सल्ल० से जंग की और जंगे ओहद में नबी करीम सल्ल० के चचा सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु को अबू सुफियान ने शहीद कर दिया और माविया की मां हिंदा ने सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु के नाक-कान और उंगलियों को काटकर हार बनाकर अपने गले में पहन लिया और पेट फाड़कर कलेजा निकालकर अपने मुंह में रखकर कि इसे निगल जाएं मगर वो निगल ना सकी इसलिए इमाम जलालुद्दीन श्यूती की तफसीर ए दुर्रे मंसूर में और तफसीर ए इब्ने कसीर में है कि नबी करीम सल्ल० ने फ़रमाया कि जानते हो कि हिंदा ने हमारे चचा सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा के कलेजे को क्युं निगल ना सकी.? क्योंकि अल्लाह नहीं चाहता कि हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु के किसी भी हिस्से को जहन्नम में दाखिल करे…मतलब हिंदा जहन्नमी है और अल्लाह नहीं चाहता कि हजरत हमजा का कोई हिस्सा इस जहन्नमी हिंदा के पेट में चला जाए।
ये तो रहा माविया के मां-बाप का हाल…
यहां पर तावील पेश किया जा सकता है कि हिंदा और अबू सुफियान का यह कारनामा ईमान लाने से पहले का है तो कोई बात नहीं अब यहां ईमान लाने के बाद अबू सुफियान के बेटे माविया का हाल….
इमाम जलालुद्दीन श्यूती ने कब्र के हालात में, इमाम इब्ने जरीर तबरी ने तारीख ए तबरी में, इमाम इब्ने कसीर ने सीरतुन्नबी में, इमाम बैहकी ने दलाएल-उन-नबूवत में और कारी सनाउल्लाह पानीपती हनफी ने तफसीर ए मज़हरी में और बहुत सी किताबों में लिखा है कि-
नबी करीम सल्ल० के विसाल के 46 साल बाद माविया ने जंगे ओहद में शहीद होने वाले शोहदा-ए-किराम के कब्रिस्तान को खुदवाकर वहां से नहर निकलवाने का इरादा किया तो माविया ने ऐलान कराया कि इस कब्रिस्तान में जिसके घर के लोग दफन हो वो आकर उसकी लाश को यहां से ले जाए और दूसरी जगह दफन कर दें।
जब शोहदा-ए-किराम के कब्रिस्तान को खोदा गया तो नबी करीम सल्ल० के चचा सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु के जिस्म पर फावड़ा लग गया जिससे हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु के जिस्म से ताजा खून निकलने लगा और चारो ओर एक खुश्बू सा फैल गया।
इस वाक्या से कुरान की वो आयत सच साबित हुआ कि शहीद को मुर्दा मत कहो बल्कि वो जिंदा हैं।
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अगर माविया को नबी करीम सल्ल० के चचा सय्यद-उस-शोहदा हजरत अमीर हमज़ा रजिअल्लाह अन्हु से या सहाबा किराम से मुहब्बत होता तो वह इसी कब्रिस्तान से नहर क्युं खुदवाता.?? या अगर ज़रुरी था तो नहर को मोड़ कर कब्रिस्तान को बचा लेता मगर ये कारनामा भी उसके बुग्ज और मुनाफिकत की निशानियों में से एक निशानी है।
शान-ए-सहाबा जिंदाबाद मगर माविया ने सहाबा किराम की कितनी ताजीम की और क्या कुछ नहीं किया..??
इस बात को बड़े अच्छे ढंग से बताया गया है जो तारीख में दर्ज है 👇

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