शहादते इमाम हुसैन को भुलाने के लिए झूठी रिवायतें

यह शहादते इमाम हुसैन को भुलाने के लिए झूठी रिवायतें घडकर रोज़ा रखवाने की बिदअत ईजाद की गई है।
कहानी गढी गई कि इसी दिन मदीने के यहूदी रोज़ा रखते थे हमारे नबी सल• ने उनसे पूछा कि इस दिन तुम यह रोज़ा क्यो रखते हो उनहोंने बताया कि इस दिन मूसा अलै• को फिरौन से निजात मिली थी इस लिए रखते हैं आप ने फरमाया कि मेरा मूसा पर तुमसे ज्यादा हक़ है व कहा कि तुम एक रोज़ा रखते हो हम दो दिन रोज़ा रखेगें।
यह घडी हुई व मनघडंत कहानी है कि इस रोज़ ग़मे को मनाने से लोगों को भटका दिया जाए, यह लोग इसके अलावा तमाम कहानियों को घड कर सुना देंगे कि इस दिन आदम व हववा मिले थे इसी दिन नूह की किश्ती किनारे लगी थी, इसी दिन हज़रत यूनुस को मछली के पेट से आजादी मिली थी मूसा को निजात मिली लेकिन कभी भी यह नहीं कहेंगे कि इस दिन इमाम हुसैन शहीद हुए थे।
अब रोज़े वाली मनघडंत कहानी की तरफ़ लौटते हैं, पहली बात यह है कि अल्लाह ने नबी को यहूदियों ईसाईयो काफिरों की तरह अमल करने से मना किया फिर क्यो नबी उनकी पैरवी करेंगे? क्या अल्लाह की नाफरमानी नहीं होगी
2— दीने इस्लाम में नमाज़ रोज़ा व सब अहकाम अल्लाह ने बताए है यहूदियों ने नहीं
3— यहूदियों का कैलेंडर बिलकुल अलग है अगर यहूदी रोज़ा रखते तो तो वह अपने कैलेन्डर के अनुसार रखते उनके यहाँ मुहर्रम का महीना कहाँ है?
4 — यहूदी क़ौम दुनिया से खत़्म नहीं हुई है वह आज भी बड़ी तादाद में दुनिया में रहते हैं वह कहीं भी 10 मुहर्रम का रोज़ा नहीं रखते हैं यह ही इस रिवायत के झूठे होने का सबसे बड़ा सबूत है।
5 — असली बात यह है कि ग़मे हुसैन से भटकाने के लिए कि उनकी शहादत की याद न मनाओ बल्कि रोज़ा रखके घर में बैठिए यही इसका मक़सद हैं,
यह यज़ीद के समर्थकों की चाल है।

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