हज़रत इब्न ए अब्बास का मुनाज़रा

हज़रत इब्न ए अब्बास का मुनाज़रा

हदीस

रावीयान ए हदीस, अम्र बिन अली, अब्दुर्रहमान बिन मेहदी, इक़रिमह बिन अम्मार, अबु ज़ुमैल सिमक बिन वलीद।

ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्न ए अब्बास रज़िअल्लाहु अन्हो बयान करते हैं कि जब खारजियों ख़ुरूज किया तो दराहम में अलग होकर बैठ गए, उनकी तादाद करीब छह हज़ार थी। मैंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा, “या अमीरुल मोमिनीन आप ज़ुहर की नमाज़ को ठंडा करके पढ़ें तब तक मैं जाकर उनसे गुफ्तगू करके आता हूँ।”, आपने फरमाया, “मुझे तुम्हारी जान के मुताल्लिक़, उनसे खतरा महसूस हो रहा है।”, मैंने कहा, “नहीं मुझे कुछ नहीं होगा।”, मैं वहाँ जाने के लिए तैयार हुआ और जब मैं उनके घर दोपहर के वक्त पहुँचा तो वो उस वक्त खाना खा रहे थे और उन्होंने कहा, “खुशामदीद इब्न ए अब्बास, आपका आना कैसे हुआ?”, मैंने जवाब दिया कि, “मैं रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के मुहाजिरीन, अंसार और आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के चचाज़ाद भाई व दामाद की तरफ़ से आया हूँ। रसूलुल्लाह आप अली अलैहिस्सलाम के चचाज़ाद भाई हैं, जिनपर कुरआन नाज़िल हुआ है लिहाजा हज़रत अली अलैहिस्सलाम को कुरआन की तावील और तफ्सीर का ज्यादा इल्म है। तुम लोगों में उनके मुक़ाबिल का एक आदमी भी नहीं है। मैं यहाँ वो बातें करने आया हूँ जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मानने वाले करते
हैं और उन तक वो पैग़ाम पहुँचाऊँगा जो तुम लोग कहोगे।”

उनमें से कुछ लोग निकलकर मेरे पास आगे आए, मैंने उनसे कहा, “मुझे बताओ कि तुम रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के सहाबा और आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के चचाज़ाद भाई से क्यों नाराज़ हो?”, उन्होंने कहा कि, “तीन बातों की वजह से, हम उनसे नाराज़ हैं।”, मैंने पूछा, “वो तीन बातें कौन सी हैं?”, उन्होंने कहा, “एक ये कि उन्होंने अम्र ए इलाही में आदमियों को हाकिम बनाया जबकि अल्लाह तआला ने फरमाया है –

إن الحكم إلا الله

यानी अल्लाह त’आला के सिवाय कोई हाकिम नहीं (कुरआन 6:57 )

आदमियों को मुंसिफ़ बनाने से या हाकिम बनाने से क्या मुराद?”, मैंने कहा, “ये तो एक बात हुई।”, उन्होंने कहा, “दूसरी बात ये है कि उन्होंने जंग की (जंग ए जमल, जहाँ अम्मा आयशा, तल्हा, ज़ुबैर, मुसलमानों के एक लश्कर के सालार और सरपरस्त थे), मगर ना तो किसी को कैदी बनाया और ना ही माल ए ग़नीमत लिया है। अगर वो मुखालिफ़ीन और बातिल थे तो उनसे उनका माल छीनकर उन्हें कैदी बनाना चाहिए था और अगर वो मोमिन थे तो उनसे जंग करना जायज नहीं था।”, मैंने कहा, “ये दो बातें हुईं हैं, तीसरी बात कौन सी है ? ” त

उन्होंने कहा, “तीसरी बात ये है कि उन्होंने अपने नाम से अमीरुल मोमिनीन का लफ्ज़ मिटा दिया है, अगर वो मोमिनों के अमीर नहीं हैं तो वो अमीरुल काफ़िरीन हुए।”, मैंने उनसे पूछा, “इन तीन बातों के अलावा भी तुम्हारे पास कोई और बात है?”, खारजियों ने कहा, “हमारे लिए ये ही तीन बातें काफी हैं।”

मैंने जवाब देते हुए कहा, “अगर मैं अल्लाह की किताब कुरआन और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की हदीस ओ सुन्नत से वो बातें सुनाऊँ, जिनसे तुम्हारी बातों का इंकार होता है तो क्या तुम सुनना पसंद करोगे?”, खारजियों ने कहा, “बेशक हम सुनना पसंद करेंगे।”, मैंने कहा, “तुम्हारा ये कहना कि हज़रत अली करम अल्लाहु वज्हुल करीम ने अम्र ए इलाही में आदमियों को सालिस बनाया है तो मैं तुम्हें कुरआन मजीद से सुनात

हूँ कि अल्लाह तआला ने अपने हुक्म चौथाई दिरहम की कीमत में, आदमियों के हुक्म में तब्दील फरमा दिया है। पस अल्लाह तआला ने लोगों को हुक्म दिया कि इसके मुताल्लिक फैसला करें।

بسم الله الرحمن الرحيم

يا أيها الذين آمنوا لا تقتلوا الصيد وانتم حرم * ومن قتله منكم متعمدا فجزاء مثل ما قتل من النعم يحكم به ذوا عدل منكم

ईमान वालों हालाए (हालते) एहराम में शिकार को न मारो और जो तुममें क़स्द (जान बूझ कर) ऐसा करेगा उसकी सज़ा उन्हीं जानवरों के बराबर है जिन्हें क़त्ल किया है जिसका फ़ैसला तुममें से दो आदिल अफ़राद करें (कुरआन 5:95)

अल्लाह रब उल इज्जत ने इंसानों को इख़्तियार दिया कि वो इस पर फैसला करें और अगर अल्लाह ने चाहा होता कि वो खुद इस पर फैसला करे तो बेशक अल्लाह ने खुद ही इस पर फैसला किया होता इसलिए आदमियों का फैसला करना दुरुस्त और जायज़ है। मैं तुम्हें अल्लाह का वास्ता देकर पूछता हूँ कि क्या लोगों के बीच सुलह और खूनरेजी के बीच फैसला करना ज्यादा बेहतर है या खरगोश के शिकार के मुताल्लिक़ फैसला करना ज्यादा बेहतर है?”, उन्होंने कहा कि, “जानवरों की जगह, इंसानों के दरमियान फैसला करना ज्यादा अफ्ज़ल है । “

मैंने कहा कि, “अल्लाह तआला मर्द और उसकी बीवी के मुताल्लिक़ फरमाता है –

بسم الله الرحمن الرحيم

وإن خفتم شقاق بينهما فابعثوا حكما من أهله وحكما من أهلها إن يريدا إصلاحا يوفق الله بينهما

और अगर दोनों के दरम्यान इख़्तिलाफ़ (झगड़े) का अंदेशा है तो एक हकम मर्द की तरफ़ से और एक औरत वालों की तरफ़ से मुक़र्र करो फिर वह दोनों इस्लाह चाहेंगे तो ख़ुदा उनके दर्मियान एका (मेल मिलाप) पैदा कर देगा। (कुरआन 4:35 )

मैं तुम्हें अल्लाह का वास्ता देकर पूछता हूँ कि लोगों के बीच सुलह कराना और खून खराबे के मामलों में फैसला करना बेहतर है या बीवी के मामले में फैसला करना?, क्या मैंने तुम्हे पहली बात का तसल्ली बख़्श जवाब दे दिया है?”, उन्होंने कहा, “हाँ, आपने जवाब दे दिया है। “

मैंने कहा, “जैसा कि आप लोगों ने कहा, मौला अली अलैहिस्सलाम ने जंग की लेकिन ना ही लोगों को कैदी बनाया और ना ही माल ए ग़नीमत लिया। मैं पूछता हूँ कि क्या तुम अपनी माँ, उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रजिअल्लाहु अन्हा से माल ए गनीमत ले सकते हो या उन्हें भी कैदी बना सकते हो जैसा की दूसरों औरतों को बनाया जा सकता है जबकि तुम्हें मालूम है कि वो मोमिनों की माँ हैं?, अगर तुम्हारा जवाब ये है कि तुम उन्हें कैदी बना सकते हो तो तुम ईमान वाले हरगिज़ नहीं हो सकते और अगर तुम्हारा जवाब ये है कि तुम उन्हें माँ ही नहीं मानते तो भी तुम, ईमान वाले नहीं हो सकते क्योंकि अल्लाह तआला ने फरमाया है

بسم الله الرحمن الرحيم النبي أولى بالمؤمنين من أنفسهم – وأزواجه أمهاتهم صلے

बेशक नबी तमाम मोमिनों से उनकी नफ्स की बा’ निस्बत ज्यादा आला हैं और आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की बीवियाँ उन (मोमिनों) की माँ हैं। (कुरआन 33:6)

इस सूरत में तुम दो उलझनों के बीच फसे हो, पस उससे निकलने का रास्ता इख़्तियार करो और बताओ क्या तुम मेरे जवाब से मुतमईन नहीं?”, खारज़ियों ने कहा, “हाँ, हम इस बात पर आपके जवाब से मुतमईन हैं लिहाजा इस बात को यहीं छोड़ते हैं।”

मैंने कहा, “अब रहा तुम्हारा ये क़ौल कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने नाम से अमीरुल मोमिनीन का लफ्ज़ मिटा दिया है तो मैं तुम्हें वो बात बताता हूँ जिससे तुम राजी होगे और मैं जानता हूँ कि तुमने भी सुना होगा कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने अल्-हुदैबिया में मुश्किीन से समझौता किया तो आपने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा कि ये बात लिखो जिसपर मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लललाहु
अलैहे व आलिही व सल्लम ने समझौता किया है। तो मुश्रिकों ने कहा, ऐसा नहीं होगा, अगर हम आप मुहम्मद को रसूलुल्लाह मान रहे होते तो हम आपसे जंग ना करते। पस मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने फरमाया, “या अली! इस लफ्ज़ को हटा दो, मेरा अल्लाह जानता है कि मैं उसका रसूल हूँ। या अली इसे हटा दो और इसकी जगह लिख दो कि मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह ने समझौता किया है।”, खुदा की कसम रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम, हज़रत अली अलैहिस्सलाम से बेहतर हैं, उन्होंने अपने नाम से रसूलुल्लाह का लफ्ज़ मिटा दिया लेकिन उनका इस लफ्ज़ को मिटाना, आपकी नबूवत को ख़त्म नहीं कर देता क्या तुम मेरी बात से मुत्ताफिक़ होकर, इस बात को यहीं छोड़ते हो ।”

उन्होंने कहा, “हाँ, आपने जवाब दे दिया है।”, ख़ारजियों में से दो हज़ार लोगों ने तौबा की और वापिस हज़रत अली अलैहिस्सलाम की पैरवी में आ गए और बाकि बागी ही रहे और अपनी जहालत की वजह से ही मारे गए। उन्हें मुहाज़िरीन और अंसार लोगों ने क़त्ल किया।

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