हुज़ूर का का हज़रत अली से मशवरा और उम्मत से तक़फीफ

हदीस-

रावीयान ए हदीस, मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अल्-मौसिली, कासिम बिन यजीद अल्जर्मी, सूफियान अस्-सौरी, उस्मान बिन अल्-मुगीरा, सलीम बिन अब्दुल ज़द, अली बिन अल्-क्रमह।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि जब आयत ए करीमा –

يسم الله الرحمن الرحيم يا أيها الذين آمنوا إذا ناجيتم الرسول فقدموا بين يدي نجواكم صدقة

नाज़िल हुई तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को फरमाया, “इन्हें हुक्म दो कि सदक़ा दें”, अर्ज़ किया कि, “या रसूलु लाहा कितना सदका दें?”, फरमाया, “एक दीनार”, अर्ज़ किया कि वो इतनी ताक़त नहीं है। फरमाया, “निस्फ़ दीनार”, अर्ज़ किया कि वो इसकी भी ताकत नहीं रखते, फरमाया, “
कितना”, मौला अली ने कहा, “मुश्किल से एक जौ / अनाज”

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने एक आयत भेजी है और फरमाया

بسم الله الرحمن الرحيم ة الشققثم أن تقدموا بين يدي نجواكم صدقات

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि मेरी वजह से इस उम्मत से तकफीफ़ हुई। (कुरआन पाक 58:12-13 की तफ़सीर देखें।)

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