फ़िराके महबूब

हज़रत सिद्दीके अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इस कद्र मुहब्बत थी कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विसाल शरीफ के बाद आप फिराके महबूब (महबूब की जुदाई) के सदमें में बेचैन रहने लगे और थोड़ी मुद्दत के बाद ही बाप बीमार पड़ गये। आपके इलाज के लिये एक हकीम को बुलाया गया। हकीम ने बड़े गौर से देखा और कहा कि यह मरीज़ किसी की मुहब्बत में बीमार है। इनका महबूब इनसे जुदा है। इसी फ़िाके महबूब के गम में यह बीमार हुए। इनका ईलाज दीदारे यार के अलावा और कुछ नहीं। जहां तक हो सके इनके महबूब को इन्हें दिखाओ। (सीरतुस-सालिहीन सफा ६०)

सबक़ : सिद्दीके अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु सच्चे महबूब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सच्चे मुहिब (चाहने वाला) व तालिब थे।

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