अली को गाली देना, मुझे गाली देना है

अली को गाली देना, मुझे गाली देना है

पहली हदीस

रावीयान ए हदीस, अल्-अब्बास बिन मुहम्मद अद्-दौरी, यहया बिन अबु बुकेर, इस्राईल, अबु इस्हाक़ा

हज़रत अबु अब्दुल्लाह अल-जदअली कहते हैं कि मैं उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलामा(सलमा/हिंद) रजिअल्लाहु अन्हा की ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो मुझसे पूछा, क्या रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को गाली दी जा सकती है?

मैंने कहा सुब्हान अल्लाह या कहा कि अल्लाह इससे पनाह दे तो आपने फरमाया, “मैंने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को फरमाते हुए सुना है कि जो अली को गाली देता है, वो मुझे गाली देता है।

(यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि उम्मुल मोमिनीन ने खुद ही क्यों पूछा कि, “क्या रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को गाली दी जा सकती है?”, क्योंकि उस दौर में भी बुग्ज़ ए अली रखने वाले मुनाफ़िकों की बड़ी तादाद थी और उम्मुल मोमिनीन सैयद शादाब अलीq
बताना चाहती थीं कि जिन्हें ये मुनाफिक गाली दे रहे हैं, उन्हें गाली देना, हबीब ए खुदा रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को गाली देना है )

दूसरी हदीस

रावीयान ए हदीस, अब्दुल अला बिन वासिल बिन अब्दुल अला अल-कूफी, जाफ़र बिन औन, शकीक़ बिन अबी अब्दुल्लाह, अबु बकर बिन खालिद बिन अर्’फता।

खालिद बिन अर्’फता से रिवायत है कि मैंने हज़रत साद बिन मलिक रजिअल्लाहु अन्हो को मदीना मुनव्वरा में देखा तो उन्होंने मुझे फरमाया कि, “मुझे पता चला है कि तुम लोग हज़रत अली करम’अल्लाहु वज्हुल करीम को गालियाँ देते हो?”

मैंने कहा, “हम ऐसा करते हैं”, तो उन्होंने फरमाया, “तुम मौला अली अलैहिस्सलाम को गाली मत दिया करो। मैं कभी उन्हें गाली नहीं दे सकता, यहाँ तक की अगर मुझपर जोर जबर्दस्ती भी की जाए तो भी नहीं।”, फिर आपने आगे इरशाद फरमाया, “शायद इस बात को नहीं जानते जो मैंने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम से सुनी है।”

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