अली मेरे बाद, हर मोमिन का वली है

पहली हदीस

रावीयान ए हदीस, कुतैबह बिन सईद, जाफ़र बिन सुलेमान, यजीद (अर्-रिश्क), मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह।

हज़रत इमरान बिन हुसैन रजिअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने एक लश्कर तर्तीब किया और उसका सिपाह सालार हज़रत अली करम अल्लाहु वज्हुल करीम को मुकर्रर किया और जंग के लिए भेजा, इस्लामी लश्कर फ़तह याब हुआ तो माल ए गनीमत में से एक कनीज़ को हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ले लिया, जिसे बाज़ लोगों ने ना-पसंद किया और चार अस्हाब ने अहद किया कि इस अम की खबर रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को दी जाएगी। चुनाँचे जब मुसलमान इस सफ़र से लौटे तो हसब ए मामूल रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की खिदमत में हाज़िर हुए, क्योंकि मुसलमानों में दस्तूर था कि वो जब किसी सफर से वापिस आते तो हुजूर सरवर ए कायनात सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की खिदमत में हाज़िरी देते।
हज़रत अली के खिलाफ शिकायत करने का अहद करने वाले चार शख्स में से एक शख्स ने उठकर अर्ज़ किया, “या रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम! आपने अली को देखा, उसने ऐसा और ऐसा किया”

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने उसकी बात सुनी तो उसकी तरफ़ से रुख़ ए अनवर फेर लिया। फिर दूसरे आदमी ने उठकर, वो ही बात दोहराई तो आप मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम ने उसकी तरफ़ से भी चेहरा ए अकदस को फेर लिया, फिर तीसरे ने भी वही बात दोहराई और फिर चौथे ने भी वही बात की जो पहले तीन कर चुके थे तो आप गज़बनाक हो गए और उन लोगों के चेहरे पर गुस्से की नज़र से देखते हुए फरमाया कि, “क्या तुम नहीं जानते कि अली मुझसे है और मैं अली से हूँ और वो मेरे बाद तमाम मोमिनों का मददगार है।”

दूसरी हदीस

रावीयान ए हदीस, वासिल बिन अब्दुल ला, मुहम्मद बिन फुज़ैल, अल्-अज्लह, अब्दुल्लाह बिन बुरैदहा

हज़रत बुरैदह रजिअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने हमें, खालिद बिन वलीद के साथ यमन की तरफ़ भेजा और दूसरे लश्कर को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ रवाना किया और फरमाया, “अगर तुम इकट्ठे होकर जंग करो तो अली अलैहिस्सलाम लश्कर में तुम सबके सिपाह सालार होंगे और अगर अलगअलग करो तो अपने-अपने लश्कर के अमीर, सालार होंगे।”

पस हमने अहले यमन में बनी ज़बीद से जंग की और मुशरिकीन पर मुसलमानों को फतह हासिल हुई। पस हमने लड़ने वालों को कैद कर लिया और उनकी औलादों को कैद कर लिया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उन कैदियों में से अपने लिए एक कनीज़ को पसंद किया। चुनाँचे खालिद बिन वलीद ने नबी करीम सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को इस बारे में ख़त लिखा और मुझे हुक्म दिया के मैं ये खत आप तक पहुँचाऊँ।
हज़रत बुरैदह फरमाते हैं कि, मैं खत लेकर आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की खिदमत मे हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया कि, अली ने हमें तकलीफ पहुँचाई है। रसूलुल्लाह ने जब ये सुना तो गज़बनाक हो गए और फरमाया, “ऐ बुरैदह! मेरे लिए ही, अली से रखो, अली मुझसे है और मैं अली से हूँ और वो मेरे बाद तुम्हारा मददगार है।

(ऊपर की हदीसों में आने वाला वाक्या, वो ही वाक्या है, जिसकी आड़ लेकर बुराज ए अली में गिरफ्त लोग, जंग के बाद का झूठा वाक्या बयान करते हैं या माल ए गनीमत वाली बात को बढ़ा-चढ़ाकर या तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। यहाँ तक कुछ लोग मौला अली अलैहिस्सलाम पर घटिया इल्जाम लगाने से भी पीछे नहीं हटते। बहरहाल रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम का ये कहना कि, “अली मुझसे है और मैं अली से हूँ’, मौला अली अलैहिस्सलाम के बुलंद किरदार की दलील है और ये दलील अपने आप में काफी है।)

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