अंधा और लंगड़ा चोर

अंधा और लंगड़ा चोर

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम अभी नौ उम्र ही थे कि आप अपनी वालिदा के साथ मिस्र के एक अमीर कबीर के मेहमान हुए। उस अमीर आदमी के यहां बहुत से गरीब और मोहताज मेहमान रहा करते थे। इत्तिफ़ाक़ से एक दिन उसके यहां चोरी हो गई और कुछ माल जाता रहा। उस अमीर आदमी को उन्हीं मुफ़लिस और मोहताज लोगों पर जो उनके पास रहते थे, शुब्हः था। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी वालिदा से कहा कि उस अमीर आदमी से कहिए कि उन सब मुफ़लिसों को एक जगह इकट्ठा करे। जब उस शख्स ने उन मुफ़लिसों को एक जगह जमा कर लिया तो आप उनमें तशरीफ ले गये। उनमें से एक लंगड़े आदमी को उठाकर एक अंधे शख्स की गर्दन पर बैठाया और कहाः ऐ अंधे! इस लंगड़े को उठाकर खड़ा हो जा। वह अंधा बोलाः मैं निहायत जईफ़ और कमज़ोर आदमी हूं। इसे कैसे उठा सकता हूं? हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः कल रात तुममें इसको उठाने की ताकत कहां से आ गई थी? यह सुनकर वह अंधा कांपने लगा। दरअसल इसी अंधे ने उस लंगड़े को उठाया था और उसके ज़रिये यह चोरी की गई थी। चुनांचे वह दोनों चोर पकड़े गये।
(नुजहतुल मजालिस जिल्द २, सफा ४३३)

सबकः अल्लाह के नबी छुपी हुई बातों को, जो हो चुकी हों या होनी वाली हो सबको, जान लेते हैं। नबी को बेखबर जानना बेखबरों का काम है।

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