राज़ का खुलना

राज़ का खुलना

हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम ने अपने बेटों से फ़रमाया कि अल्लाह की रहमत से मायूस न हो और यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की तलाश करो। चुनांचे वह फिर मिस्र पहुंचे और यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहने लगे कि ऐ शाहे मिस्र! हम बड़ी मुसीबत में हैं। हमारी हकीर पूंजी कुबूल करके हमें और गल्ला दें और हम पर खैरात भी कर। हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम अपने भाईयों की यह इंकिसारी और उनकी परेशानी देखकर फ़रमाने लगे कि क्या तुम्हें कुछ खबर है कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या सुलूक किया? यानी यूसुफ़ को मारना, कुएं में फेंकना, बेचना और उनके बाद उनके भाई को तंग करना, परेशान करना- क्या कुछ याद है? यह फरमाते हुए यूसुफ अलैहिस्सलाम को हंसी भी आ गई। भाईयों ने यूसुफ अलैहिस्सलाम के गौहरे दंदान का हुस्न देखकर पहचान लिया कि यह तो जमाले यूसुफी की शान मालूम होती है। फिर कहने लगे कि आप ही तो यूसुफ नहीं हैं? फ्रमायाः हां! मैं यूसुफ हूं। यह मेरा भाई बिनयामीना अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान फरमाया है। अल्लाह परहेज़गारों और साबिर बंदों का अज जाय नहीं करता।

वह सब शर्म से बोलेः खुदा की कसम! बेशक अल्लाह ने आपको हम पर फजीलत दी और हम वाकई खताकार थे। हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः मगर ऐ भाईयो! तुम पर मेरी तरफ से कोई मलामत नहीं । अल्लाह तुम्हें माफ़ करे और वह बड़ा मेहरबान है।
(कुरआन करीम पारा १३, रुकू ४ खज़ाइनुल इरफान सफा ३४६)

सबक़ : खुदा के मक़बूल बंदों का यह शेवा है कि वह अपनी ज़ात का जायज़ बदला लेने की ताकत रखकर भी माफ़ फ़रमा देते हैं और कोई मलामत नहीं करते।

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