अमीर यूसुफ बिन ताशफीन पार्ट 3

पर खूश था कि उसे अपने पड़ाव में आग के शोले दिखाई देने लगे और उसके बाद अमीर यूसुफ़ के तूफानी दस्ते उसके मैमना की सफों को चीरते हुए कलब तक जा पहुंचे, तो उसने महसूस किया कि फ़तह इतनी आसान नहीं जितनी वह समझ रहा था। अचानक सयर बिन अबूबकर अपनी फ़ौज के कलब से बरबरों के चन्द दस्ते लेकर निकला और दुश्मन के मैसरा पर हमला कर दिया। मैसरा की सफ़ों में फ्रान्स के नाइट एक आहनी दीवार की तरह खड़े थे, लेकिन बर्क रफ़्तार बरबरियों के सामने उनकी एक न चली। सयर बिन अबूबकर उनकी मुज़ाहमत को कुचलता हुआ अमीर यूसुफ़ से आ मिला। इतनी देर में एक और बरबर जरनेल पीछे के दस्तों को दो हिस्सों में तक़सीम करके आगे बढ़ा और उसने दुश्मन को दाएं और बाएं बाजू से घेर लिया। ईसाइयों ने जंग का नकशा बदलता देखकर जवाबी हमला किया और मुराबितीन फिर एक बार मुदाफ़िआना जंग लड़ते हुए पीछे हटने पर मजबूर हो गए। लेकिन अचानक अलफ़ान्सू की फ़ौजों को एक और परेशानी का सामना करना पड़ा। पहाड़ी की दूसरी तरफ़ से अननवार की फ़ौज उन्दुलसियों के हाथ शिकस्त खाकर भाग निकली और साद ने इस महाज़ से फ़ारिग होते ही असवदी सवारों के साथ सरक़स्ता के लशकर के अक़ब (पीछे के हिस्से) पर हमला कर दिया। अब अलफ़ान्सू की फौज चारों तरफ से घेरे में आ चुकी थी और उन्दुलस की बाकायदा फ़ौज और रज़ाकार भी मुराबितीन के साथ शामिल हो चुके थे।

गुरूबे आफ़ताब के करीब ईसाइयों के लशकर में अफरा-तफ़री फैल चुकी थी। मुराबितीन के लशकर में नक्कारों की सदा (आवाज) गूंजने लगी और नक्कारों की आवाज़ सुनते ही अफ्रीकी फ़ौज ने एक
नए जोश व ख़रोश के साथ चारों तरफ़ से हमला कर दिया। ईसाई लशकर पीछे से असवदी सवारों का घेरा तोड़कर पीछे हटने लगा। कोई आधा मील पसपा होने के बाद ईसाइयों ने दोबारा जमकर लड़ने की कोशिश की, लेकिन अफ्रीका के तेज़ रफ़्तार सवारों ने उन्हें सफें दुरुस्त करने का मौका ही न दिया।
अमीर मुराबितीन चिल्लाया, “आख़िरी ज़र्ब लगाने का वक्त आ गया है।”
और आन की आन में फ़ौज के अफ़सरों ने उसकी यह आवाज़ हर सिपाही तक पहुंचा दी। नक्कारे पर दोबारा चोट पड़ी और मुराबितीन एक आंधी की तरह दुश्मन पर टूट पड़े, दुश्मन भाग निकला। अलफ़ान्सू की आधे के करीब फ़ौजें अब भी उसके साथ थीं, लेकिन यह सेहरा नशीनों के तरीका-ए-जंग से वाकिफ़ न थे। अमीर यूसुफ़ ने नए सिरे से अपनी फ़ौज को मुनज़्ज़म किया। पयादा सिपाही एक तरफ़ हट गए और सवार तीन हिस्सों में तक़सीम होकर दुश्मन का पीछा करने लगे। दाएं तरफ़ पीछा करने वाले सवारों की क़ियादत सयर बिन अबूबकर के हाथ में थी, बाएं तरफ़ एक बरबर जरनेल था और उन दोनों के दरमियान अमीर यूसुफ़ अपने तूफ़ानी दस्तों की रहनुमाई कर रहा था। यह फ़ौज आधे दाइरे (गोलाई) में फैलकर दुश्मन का तआकुब कर रही थी। दाएं और बाएं बाजुओं के सवार दुश्मन को घेर रहे थे और पीछे आने वाले उन्हें मौत के घाट उतार रहे थे। अलफ़ान्सू यह महसूस कर रहा था कि सेहरा नशीनों की असली जंग शुरू हो गई है। उसकी पयादा फौजें पीछे रह गई थीं और उसे उसके अन्जाम के मुतअल्लिक़ कोई गलतफ़हमी न थी। उसके सवारों का तआकुब ऐसे लोग कर रहे थे जिनके घोड़े उसके
घोड़ों के मुकाबले में कहीं ज्यादा तेज़ रफ़्तार थे। ईसाइयों ने कई बार उनके घेरे से निकल कर इधर-उधर मुन्तशिर होने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी न हुई। बरबर और अस्वदी सवार उन्हें हर बार घेरकर सीधा आगे चलने पर मजबूर कर देते।

अफ्रीका के मुजाहिदों की तरह उनके घोड़े भी अनथक और सख्त जान थे। उनकी तेज़ रफ़्तारी की एक वजह यह भी थी कि बरबरी सवार जिरहें और बक्तर पहनने के आदी न थे। इसके बरअक्स अलफ़ान्सू के अक्सर सवार सर से लेकर पांव तक लोहे में गर्क थे और घोड़े उनके साज़ व सामान के बोझ और दिन भर की थकावट की वजह से क़दम-क़दम पर दम तोड़ रहे थे।

सूरज गुरूब हो गया। मुजाहिदों ने अपने थैलियों से खजूरें निकाली और भागते हुए घोड़ों की पीठ पर बैठे-बैठे रोजा इफ्तार किया और दुश्मन का तआकुब जारी रखा।

जंग से पहले अलफ़ान्सू ने अपने जरनेल और हलीफ़ों से कहा था कि दुश्मन को शिकस्त देने के बाद हम सारी रात चांद की रौशनी में उसका तआकुब (पीछा करना) जारी रख सकेंगे। लेकिन अब वह और उसके बचे-खुचे साथी चांद को कायनात की सबसे काबिले नफ़रत चीज़ समझ रहे थे।

ईसाइयों के दाएं और बाएं बाजू से बरबर सवार भागते हुए घोड़ों से तीर बरसा रहे थे और पीछे आने वाले उन्हें अपने नेजों से मौत के घाट उतार रहे थे। मीलों तक कोई खेत, कोई टीला और कोई घाटी ऐसी न थी जहां ईसाइयों की लाशें दिखाई नहीं देती हों। लम्बी दौड़ के बाद मुराबितीन के घोड़ों की हिम्मत भी जवाब दे रही थी, लेकिन

इस अरसे में अलफ़ान्सू के हज़ारों सवार पीछे रह गए थे और अमीर यूसुफ़ उनका सफाया करने के लिए अपने सवारों के दस्ते छोड़ता

हुआ आगे बढ़ रहा था। अलफ़ान्सू अपने बेहतरीन जरनेलों और सिपाहियों से महरूम हो चुका था। रात के दूसरे पहर 50 या 80 हज़ार में से सिर्फ 40 हज़ार उसका साथ दे रहे थे और हर कदम पर उनकी तादाद कम हो रही थी। उसकी आखिरी उम्मीद दरिया वादी-ए-आना था जिसे पार करने के बाद वह इस बड़ी मुसीबत से पीछा छुड़ा सकता था। दरिया ज़्यादा दूर न था, लेकिन अफ्रीकी सवार अब दाएं और बाएं बाजू से आगे बढ़कर उनके गिर्द घेरा डालने की कोशिश कर रहे थे। अचानक अफ्रीकी सवारों के पीछे तक़रीबन 200 सवारों का एक गिरोह नमूदार हुआ और बाएं बाजू से चक्कर काटता हुआ आगे निकल गया। इन सवारों की रफ्तार से जाहिर होता था कि उनके घोड़े ताज़ा दम हैं। बाएं बाजू के रहनुमा सयर बिन अबूबकर ने पहले उन्हें किसी आस पास की चौकी के मुहाफ़िज़ समझकर उनका रास्ता रोकने की कोशिश की, लेकिन जब वे ऊपर से कतराकर निकल गए तो उसने अपने साथियों से कहा कि उनका तआकुब करने का कोई फायदा नहीं। उनके घोड़े ताज़ा दम हैं। थोड़ी देर में ये सवार अलफ़ान्सू की फ़ौज के आगे पहुंच गए और कोई 30 गज़ आगे निकलने के बाद उन्होंने अचानक पलट कर नारा-ए-तकबीर बुलन्द किया और हमला कर दिया। इतनी देर में दाएं और बाएं बाजू से दायरे की शकल में आगे बढ़ने वाले बरबर उनके साथ आ मिले। एक लम्हे के अन्दर अन्दर अलफ़ान्सू के 2 हज़ार सवार ढेर हो चुके थे उसके बचे-खुचे सिपाही एक तरफ़ से मुसलमानों का घेरा तोड़कर निकले। दरिया यहां

से आधा मील दूर था, लेकिन किनारे तक पहुंचते-पहुंचते ताज़ा दम सवारों ने एक बार फिर उनका रास्ता रोक लिया और बरबरों ने तीन तरफ़ से उनका क़त्ल-ए-आम शुरू कर दिया। कस्तला के नाइट अपने बादशाह के गिर्द घेरा डालकर बहादुरी से लड़ते हुए दरिया की तरफ़ बढ़ रहे थे। अमीर यूसुफ़ की फ़ौज के सियाह फ़ाम सिपाहियों का एक दस्ता अलफ़ान्सू के मुहाफ़िज़ों पर टूट पड़ा। एक अस्वदी सवार ने अलफ़ान्सू की रान पर नेज़ा मारा लेकिन वह घोड़े से गिरते गिरते बच गया।

कस्तला के बाकी सिपाहियों ने ज़िन्दगी और मौत से बेपरवा हो कर आख़िरी हमला किया और लड़ते-भिड़ते दरिया के किनारे पहुंच कर पानी में कूद पड़े। मुजाहिदीन यहां भी उनका पीछा करने के लिए तैयार थे, लेकिन अमीर यूसुफ़ आगे बढ़कर बुलन्द आवाज़ में चिल्लाया, “नहीं तुम लोग अपना फ़र्ज़ अदा कर चुके हो, अब आगे जाने का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहिए, मुमकिन है दूसरे किनारे दुश्मन मौजूद हो!” .

अलफ़ान्सू की रही-सही फ़ौज के कई सिपाही किनारे से मुजाहिदीने इस्लाम के तीरों का शिकार हुए और कई अपने भारी हथियार की वजह से दरिया की मौजों की नज़र हो गए। जब अलफ़ान्सू ने दूसरे किनारे पहुंच कर अपने गिर्द व पेश का जायजा लिया तो वह यह देखकर शशदर रह गया कि उसके साथियों की तादाद सिर्फ पांच सौ रह गई थी। इस्लामी लशकर के शहीदों की तादाद तीन हज़ार के लग भग रही। एक रिवायत के मुताबिक़ अलफ़ान्सू के साथ सिर्फ पांच आदमी बचे थे।

जुलाक़ा के शहीद अपने खून से उन्दुलस की तारीख के बाब में फ़तह का उनवान (शीर्षक) लिए चुके थे।

इस अज़ीमुश-शान फ़तह की खबर से मुल्क के हर कोने में खूशी की लहर दौड़ गई। अमीर यूसुफ़ का नाम हर बच्चे और बूढ़े की ज़बान पर था। हर मस्जिद के मिंबर से उसकी लम्बी उम्र के लिए ख़ास दुआएं हो रही थीं। जिन अमीरों ने जंग में हिस्सा नहीं लिया था वे फ़तह की खुशी में हिस्सा लेने के लिए अमीर यूसुफ़ के पास जमा हो रहे थे जिसने उन्हें तारीकी व जुलमत की अताह गहराइयों से निजात दिलाई थी।

चन्द दिन जुलाक़ा के मैदान में कियाम के बाद यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन ने इश्बीला का रुख किया। उन्दुलस के हुकुमरान और उलमा उसके साथ थे। रास्ते की हर बस्ती और शहर के लोग घरों से निकल कर अपने मुहसिन का इस्तिकबाल कर रहे थे।

जब अमीर यूसुफ़ का जुलूस इशबीला के दरवाज़े पर पहुंचा तो अहले शहर के एक बेपनाह हुजूम ने उसके गिर्द घेरा डाल लिया। हर शख्स दूसरे को पीछे हटाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था। उन्दुलस के हुकुमरान हरीर व अतलस की क़बाएं पहने हुए थे। लेकिन यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन अपने सादा और खुरदरे लिबास के बावजूद हर एक की निगाह का मर्कज़ था। कोई आगे बढ़कर उसपर फूल फेंकने और कोई रकाब छूने के लिए बेचैन था। अवाम की बेपनाह अकीदत और मुहब्बत देखकर तीरों की बारिश में तनकर चलने वाले मुजाहिद की गर्दन झुकी जा रही थी।

अमीर यूसुफ़ इशबीला की बड़ी मस्जिद के दरवाजे पर रुका

और सीढ़ियों पर चढ़कर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद मस्जिद के सामने कुशादा मैदान लोगों से भर चुका था। अमीर यूसुफ़ ने हाथ बुलन्द किया और वे लोग जिन्होंने अज़ीम इस्तिकबाल के लिए आसमान सरपर उठा रखा था, अचानक ख़ामोश हो गए। अमीर यूसुफ़ ने चन्द लम्हे तवक्कुफ़ के बाद कहा।

“अज़ीजान-ए-मिल्लत और बुजुरगान-ए-क़ौम! में इस इज्जत अफ़ज़ाई का मुस्तहिक़ न था। जुलाक़ा की फ़तह का सोहरा उन शेरों के सर है जो इस वक्त हममें मौजूद नहीं। मैं इशबीला की उन मांओं को सलाम कहने आया हूं जिनके बेटे हमारे कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते हुए शहीद हुए हैं। उनकी शहादत एक मक़सद के लिए थी और उस मक़सद को पाया-ए-तकमील तक पहुंचाना आप सब का फ़र्ज़ है। अफ्रीका के हालात और मेरी ज़िम्मेदारियां शायद ज़्यादा देर मुझे आपके मुल्क में ठहरने की इजाज़त न दें। इसलिए मैं आपसे एक ज़रूरी बात कहना चाहता हूं!

जुलाक़ा के मैदान में हम आपके दुश्मन को फैसलाकुन शिकस्त दे चुके हैं और आप यह खूशखबरी भी सुन चुके होंगे कि दुश्मन की फ़ौज एक तरफ़ सरकस्ता का मुहासिरा उठाकर वापस जा चुकी है और दूसरी तरफ़ बलनिया का इलाका ख़ाली कर रही है। अब इस मुल्क की हिफ़ाज़त आप लोगों का काम है। अगर आप फिर आपस के झगड़ों में उलझ गए तो मुझे अन्देशा है कि जुलाक़ा के शहीदों की कुरबानी बेकार जाएगी। दुश्मन आपपर कुव्वत और शिद्दत के साथ हमला करेगा और उस वक्त तक हमले करता रहेगा जब तक आपअमीर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन

अपनी अन्दरूनी कमजोरियों का इलाज नहीं करते। आपकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि आप इस्लाम से दूर हो चुके हैं। अगर आप अपना दिफ़ाई हिसार (किला) इस्लाम की बुनियादों पर तामीर करें तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि दुनिया की तमाम गैर मुस्लिम कौमें मुत्तहिदा होकर भी आपको शिकस्त नहीं दे सकतीं। अगर आपने इस्लाम से मुनहरिफ़ होकर कोई और राह-ए-नजात तलाश की तो याद रखिए कि आपकी मिसाल उन लोगों से मुख्तलिफ़ न होगी जो सैलाब से बचने के लिए पहाड़ से उतरकर रेत के तूदों पर पनाह लेते हैं। आपका हर क़दम जो अल्लाह की राह में उठेगा कामयाबियों और कामरानियों से हमकिनार होगा और आपकी हर वह हरकत जो इस्लाम के ख़िलाफ़ होगी आपको तबाही और बरबादी की तरफ़ ले जाएगी।

उन्दुलस के अवाम और हुकुमरानों के नाम मेरा पहला और आख़िरी पैगाम यही है कि अगर आप दुनिया में सर बुलन्द रहना चाहते हैं तो अल्लाह और अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की इताअत में अपनी गरदनें झुका दीजिए। अगर आप कुरआन करीम के अहकाम पर चलते हैं, अगर आप दुनिया में अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल.) के ताबे हैं तो मैं आपको यह खुश खबरी सुनाता हूं कि रूए ज़मीन की तमाम नेमतें आपके लिए हैं और आप हर मैदान में जुलाका की तारीख़ दोहरा सकते हैं।”

इस तक़रीर के बाद अमीर यूसुफ़ अहले उन्दुलस की चन्द दावतों में शिरकत के बाद अफ्रीका का रखत-ए-सफ़र बांधता है।
अमीर यूसुफ़ की वापसी के बाद उन्दुलस में इक्तिदार की जंग नई शिद्दत के साथ शुरू हुई और उन्दुलस वालों के तकलीफ़ व मसाइब में दिन बदिन इज़ाफ़ा होने लगा। मुलूकुत-तवाइफ़ ने दोबारा पुरानी रविश इख्तियार कर ली। हर एक अपने-आपको उन्दुलस का बादशाह देखने का ख़ाहिशमन्द था। अलगर्ज वे तमाम हरकतें दोबारा होने लगी जिनकी वजह से ईसाइयों को जुर्मत हुई थी कि वह एक इस्लामी सलतनत की तरफ़ आंख उठाकर देखें।

ऐसे में अहले उन्दुलस के रज़ाकारों और इस्लामी इहया (दोबारा जिन्दा करना) के ख़ाहिशमन्दों का वफ़्द एक बार फिर अमीर यूसुफ़ की ख़िदमत में पेश हुआ। मगर जल्दी अमीर यूसुफ़ उनको कोई ख़ातिर ख़ाह जवाब न दे सके, क्योंकि अफ्रीका के अपने हालात ठीक न थे। मगर वपद के बेइन्तिहा इसरार (ज़िद) पर अमीर यूसुफ ने वादा किया कि अनक़रीब समुन्दर पार करके उनकी मदद के लिए पहुंच जाएंगे।

बिलआख़िर उन्होंने अपना वादा पूरा किया और एक बार फिर उन्दुलस के परेशान हाल मुसलमानों को सहारा देने समुन्दर पार करके उन्दुलस तशरीफ़ लाए और आते ही हिसनुल-यत का मुहासिरा कर लिया। इस मौके पर भी मुलूकुत-तवाइफ़ ने एक बार फिर गद्दारियों के रिकार्ड कायम किए। मगर अब पानी सर से गुज़र चुका था। इस दफ़ा बहुत सी जानी मानी कुरबानियां देकर अमीर यूसुफ़ ने नस्रानियों को शिकस्ते फ़ाश दी और मुलूकुत-तवाइफ़ को माजूल करके उनकी जगह अपने नुमाइन्दे मुन्तख़ब किए और मुल्क उनके हवाले करके वापस अफ्रीका रवाना हो गए।
सयर बिन अबूबकर को अमीर यूसुफ़ ने उन्दुलस में अपना नाइब ने मुकर्रर किया जिसने अलफ़ान्सू की रही-सही ताक़त के भी परखचे उड़ा दिए जिससे अलफ़ान्सू का दम-खम जवाब दे गया। अब उन्दुलस के अवाम सुख का सांस ले रहे थे और खुशहाली का ऐसा दौर-दौरा हुआ कि मुसाफ़िर को पानी मांगने पर दूध मिलता था। हुकूमत ने तमाम गैर शरई टैक्सों को खत्म कर दिया और मुल्क में मुकम्मल इस्लामी निज़ाम नाफ़िज़ हो चुका था।

अमीर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन की फ़तह एक उसूल की फ़तह थी और मोतमिद और उसके हमअसर (समकालीन) हुकुमरानों का ज़वाल एक ऐसे गिरोह की शिकस्त थी जिसने ज़िन्दगी को दीवाने का ख्वाब समझ लिया था।

यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन एक आफ़ताब था जो उन्दुलस के मुसलमानों के लिए आज़ादी और मसर्रत (खूशी) की सुबह का पैगाम लेकर आया, लेकिन उसकी नुमूद उन गुमनाम मुजाहिदीन की कुरबानियों का सिला थी जिन्होंने तकलीफ़ व मसाइब की तारीक रातों में उम्मीद की किन्दीलें रौशन की थीं।

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