अमीर यूसुफ बिन ताशफीन पार्ट 1

यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन बड़ी खूबियों के मालिक और जुद्द व तक्वा के साथ फ़िरासत, तदब्बुर व बहादुरी में भी अपना सानी नहीं रखते थे। जिस दौर में उन्दुलस की इस्लामी सलतनत टूट-फूट का शिकार थी, तवाइफु-मुलूकी (बद नज्मी, ला कानूनियत) का दौर-दौरा था यानी पूरा स्पेन ही छोटी-छोटी सलतनतों में बट चुका था, हर टुकड़े का हुकुमरान खुदमुख़्तार बैठा था। मुलूकुत-तवाइफ़ (वे हुकुमरान जो जल्दी-जल्दी एक-दूसरे के बाद आते हैं) में बाहमी इत्तिफ़ाक़ मफ़कूद (गायब) और पूरा मुल्क ख़ाना जंगी में मुब्तला हो चुका था। ताहम उस दौर में भी इल्म व अदब की तरक्क़ी जारी रही।

उसी दौरान ईसाई हुकुमरानों की हिम्मत और चीरादस्तियां (जुल्म व ज़्यादती) बढ़ गईं। फ़र्डीनान्ड अव्वल जो कि कश्ताला और लिओन का हुकुमरान था, ने 1055 ई. में बहुत-से मुस्लिम इलाके अपने कब्जे में ले लिए और इशबीला के बादशाह मोतजिद ने उसे बाज
(जबरी टैक्स) अदा करना कबूल कर लिया। 1069 ई. में मोतज़िद का लड़का मोतमिद इशबीला के तख्त पर बैठा तो उसने ने कुरतुबा को फ़तह किया। दूसरी तरफ़ 1065 में फ़र्डीनान्ड के बाद अलफ़ान्सू छठा तख्तनशीन हुआ। उसने सबसे पहले कश्ताला, लिओन और नबारह के इलाकों को अपने मातहत किया। वह अपने बाप-दादा की तरह सफ्फाक (ज़ालिम) और खूनरेज बादशाह था। उसने बनू जुन-नून के आख़िरी बादशाह कादिर से तुलैतुला छीन लिया और फिर सारे उन्दुलस पर कब्जा करने की मनसूबा बन्दी करने लगा। इसपर मुलूकुत-तवाइफ़ ने घबराकर शिमाली अफ्रीका के फरमानरवा यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन से मदद की दरखास्त की। ख़लीफ़ा-ए-बगदाद की तरफ़ से यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन को अमीरुल-मुस्लिमीन का ख़िताब भी दिया – गया था।

उन्दुलस के मुसलमानों की दरखास्त पर वह 1086 ई. में 12 हज़ार मुजाहिदीन के साथ उन्दुलस में दाखिल हुए। इश्बीला के करीब मोतमिद और दीगर उन्दुलसी बादशाहों के फौजी दस्ते भी उनसे आ मिले और मुस्लिम फ़ौज की कुल तादाद 20 हज़ार हो गई। अलफ़ान्सू छठा को अमीर यूसुफ़ की आमद की इत्तिला हुई तो उसने अपनी ताक़त को जमा किया और 40 हज़ार तजुरबेकार सिपाहियों के साथ मुकाबले में आया। बितलियूस के करीब जुलाका के मक़ाम पर फैसलाकुन जंग हुई। अगरचे दोनों फ़रीकों ने पीर का दिन लड़ाई के लिए मुकर्रर किया था, मगर अलफ़ान्सू ने बदअहदी करते हुए जुमा के दिन ही हमला कर दिया। अमीर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन की कुव्वते ईमानी से लबरेज़ फ़ौज ने अलफ़ान्सू की फ़ौज को कुचल कर रख दिया। अलफ़ान्सू जख्मी हालत में तीन सौ सिपाहियों के साथ मुश्किल से
जान बचाने में कामयाब हुआ।

इस मुक़द्दस ज़िम्मेदारी की अदाएगी के बाद अमीर यूसुफ शिमाली अफ्रीका वापस रवाना हो गए, मगर उन्दुलस के बादशाहों में इतनी भी ताकत न थी कि वह मुल्क में अमन व अमान कायम रख सकते। शिमाली सरहदों पर इसाई लुटेरों की तबाहकारियां दोबारा शुरू हो गईं और उन्दुलसी हुकुमरान बेबस नज़र आने लगे। इसपर उन्दुलस के मुसलमानों के वफूद (प्रतिनिधि मंडल) दोबारा अमीर यूसुफ़ की ख़िदमत में पहुंचे। चुनांचे अमीर यूसुफ़ ने दोबारा उन्दुलस में लशकर कशी की। अल्लाह ने इस मर्द-ए-मुजाहिद को दोबारा फुतूहात से से नवाज़ा। उन्होंने इसाई कज़ाकों (लुटेरों) की अच्छी तरह ख़बर ली और फिर उलमा-ए-किराम और अवाम के जिद पर सारे उन्दुलस को अपनी हुकूमत में शामिल कर लिया। उन्दुलस की तारीख़ का यह दौर खुशहाली और पारसाई का दौर था, मुसलमान सुकून से जिन्दगी बसर करने लगे।

अमीर यूसुफ़ ने अपनी ईमानी ताक़त से तारिक बिन ज़ियाद सानी (द्वितीय) का किरदार अदा किया जो कि इस्लामी तारीख में सुनहरे हफ़र्को (शब्दों) से लिखा गया। मगर अफ़सोस आज का मुस्लिम नौजवान उनके कारनामों से तो क्या, नाम से भी वाकिफ़ नहीं है। इस बहादुर ने उन्दुलस में इस्लामी सलतनत को मजबूती अता करने के ने बाद 1106 ई. में इस दारे फ़ानी से कूच किया, लेकिन इस्लाम की तारीख में अपना नाम हमेशा के लिए रकम कर (लिखकर) गया।

यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन ने उन्दुलस की इस्लामी सलतनत को ऐसा इस्तेहकाम बख्शा कि उनके इन्तिकाल के तक़रीबन 400 साल बाद

तक उन्दुलस पर इस्लामी परचम लहराता रहा। मगर बाद के हुकुमरान अपनी ना अहली (अयोग्यता) और दीन से दूरी की वजह से इस अज़ीम सलतनत को कायम न रख सके जिसपर तारिक बिन ज़ियाद के मुजाहिदीन के घोड़े दौड़े थे, जहां अरब के मुसलमानों ने अजानें दी, मसजिदें कायम की और यूरोप में इस्लाम की फुतूहात के दरवाजे खोले। आज भी स्पेन में इस्लामी बाकियात (बाकीमान्दा चीजें) पुकार पुकार कर कह रही हैं कि हमें गैरों से ज़्यादा अपनों ने नुकसान पहुंचाया है। आज गैरों के रहम व करम पर कायम इमारात तारिक बिन ज़ियाद और यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन को पुकारती हैं, लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आता। मुसलमानों को आपस के इख़्तिलाफ़ात से फुरसत नहीं है। उन्होंने फुरूई (दूसरे दरजे के) इख़्तिलाफ़ात को जिन्दगी और मौत का मसला बना रखा है। दुशमनान-ए-इस्लाम ने बड़ी ठोस मनसूबा बन्दी करके तमाम मुसलमानों को इन मसाइल में उलझा दिया है। उन्हें पता है अगर मुसलमानों को फुरसत मिल गई तो उनमें तारिक बिन ज़ियाद और कई यूसुफ़ बिन ताशक़ीन दोबारा पैदा हो जाएंगे।

मुसलमानों में तो अल्लाह ने वे सिफ़ात पैदा की हैं कि अगर ये दोबारा अपनी असल ज़िन्दगी की तरफ़ लौट आएं तो कोई वजह नहीं कि आज फिर ज़मीन मुसलमानों के मातहत न हो जाए।

यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन एक शख़्सियत ही नहीं, पूरी तारीख़ थे। उन्होंने उन्दुलस के मुसलमानों को इस्लाम की सरबुलन्दी से आशना (परिचित) करवाया। उनको यह बावर करवाया कि मुसलमान ईमान और अल्लाह पर तवक्कुल के साथ जब भी मैदान में उतरेगा मैदान उसी के सर रहेगा। मुसलमान को कोई ज़ेर (पराजित) कर ले, यह मुमकिन नहीं। मुसलमान उसी वक्त ही ज़ेर होगा जब उसके दिल में
इस्लाम की अज़मत और अल्लाह की बड़ाई न होगी।
आज मुसलमान एहसासे कमतरी का शिकार है। उसे अपनी तहज़ीब कुफ्फार की तहज़ीब से कमतर नज़र आती है, अपनी ज़बान बोलने पर शर्मिन्दगी और कुफ्फार की ज़बान बोलने में फखर महसूस करता है। अपना लिबास शर्म के साथ और कुफ्फ़ार का लिबास फ़ख़र के साथ पहनता है। मुआशिरा गैर की, मुआमलात गैर के, सियासत गैर की तो फिर अल्लाह की मदद व नुसरत कैसे आएगी।

यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन उस दौर में उन्दुलस आए जब वहां के मुसलमान हुकुमरान गैरों से मुतास्सिर नज़र आते थे। उनके महल्लात भी उन्ही लवाज़िमात से पुर थे जिनसे कुफ़्फ़ार के महल्लात आरास्ता थे। उस दौर में इस्लाम की नशअते सानिया (दोबारा उरूज पाना) का इहया (दोबारा जिन्दा करने की कोशिश करना) और इस्लाम की धाक कुफ्फ़ार पर बिठाना यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन का ही कारनामा था। एक बार नहीं दोबार उन्दुलस आना और इस्लाम की हक्कानियत को जिन्दा करना उन्ही की शान थी।

जब ला मर्कज़ियत, इन्तिशार और परेशानी व मसाइब के दौर में उन्दुलस के मुसलमानों की निगाहें किसी नजात दिलाने वाले की तलाश में थीं, अफ्रीका के उफुक पर गर्द व गुबार के बादल किसी शहसवार की आमद का पैगाम दे रहे थे, जब कुरतुबा इशबीला और गरनाता की अज़ीमुश-शान दर्सगाहों के मुअल्लिम (उस्ताद) कौम के मुस्तकबिल से मायूस हो चुके थे, उस वक़्त अफ्रीका के सेहरा नशीनों के झोंपड़ों में ज़िन्दगी के नए वलवले करवटें ले रहे थे। उन्दुलस में उमवी हुकूमत के ज़वाल के साथ बुहैरा-ए-रूम के दूसरे – किनारे एक नई ताक़त उभर रही थी। पांचवीं सदी के निस्फ़ अव्वल (पहली छमाही) में इस्लाम के गुमनाम किसी मुबल्लिग की कोशिशों से अफ्रीका के बरबरों में से एक नामी जंगजू क़बीला के लोग मुसलमान हो गए और उन्होंने मुराबितीन के नाम से एक नई सलतनत की बुनियाद रखी। अबूबकर बिन उमर इस सलतनत का पहले अमीर मुन्तख़ब हुए। अबूबकर की दीनदारी और तक़वा की वजह से मराकश के बाज़ दूसरे क़बाइल ने भी जो पहली सदी हिजरी में मुसलमान हो चुके थे, उसकी क़ियादत तसलीम कर ली। ताहम अलजज़ाइर से लेकर तन्जा तक बेशुमार बरबर क़बाइल अफ्रीका में किसी ताक़तवर सलतनत के जुहूर को अपनी आज़ादी के लिए ख़तरनाक समझते थे। उनमें से जो मुसलमान थे उनके सरदार भी अपनी इनफ़िरादियत को इस्लाम की वहदत (इत्तिहादे मर्कज़) में गुम करने के लिए तैयार न थे। मुराबितीन के अमीर अबूबकर ने उन लोगों को मुत्तहिद करने की मुहिम शुरू की तो उन्होंने मुराबितीन के ख़िलाफ़ एक मुत्तहिद महाज़ तशकील दे दिया। गैर मुस्लिम कबाइल जो अफ्रीका में इस्लाम के उरूज को बराह-ए-रास्त अपने लिए खतरा महसूस करते थे उनके साथ हो गए और उन्होंने जंगलों, सेहराओं और पहाड़ों से निकलकर अफ्रीका के साहिल के साथ-साथ पुर अमन शहरों और बस्तियों में लूट-मार और कत्ल व गारत का तूफ़ान बरपा कर दिया। बरबरों की कबाइली असबियत (तरफ़दारी) ने इस ख़ाना जंगी को फ़रोग दिया। –

इस नाजुक दौर में एक बहादुर और पुर अज्म इनसान नुमूदार हुआ। उसके एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में तलवार थी। शोला और शबनम का यह हसीन इमतिजाज मुराबितीन के अमीर अबूबकर बिन उमर का नौजवान भतीजा यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन था।

उसके साथ एक तरफ़ वे गाजी थे जिनकी तलवारें सरकशों, बागियों और इसलाम के दुशमनों के लिए मौत का पैगाम थीं, तो दूसरी तरफ़ वे उलमा और फुकहा थे जो अफ्रीका के तारीकतरीन गोशों में इस्लाम की किन्दीलें रौशन कर रहे थे।

मुराबितीन की फ़ौज के सिपहसालार की हैसियत से यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन ने शानदार फुतूहात हासिल की और मुराबितीन एक ताकतवर सलतनत बन गई। ताहम अभी उसके सामने बहुत बड़ा काम था, क्योंकि बागी और सरकश लोग अफ्रीका के वसीअ व अरीज़ इलाकों में फैले हुए थे। उन सबको मगलूब करने के लिए लम्बा अरसा चाहिए था। अफ्रीका के पहाड़ों, जंगलों और सेहराओं के अलावा बुहैरा-ए-रूम पर भी अहले बरबर का तसल्लुत कायम था। यूरोप और अफ्रीका के साहिली इलाके उनकी लूट-मार से महफूज़ न थे। बुहैरा-ए-रूम के बाज़ जज़ीरे और साहिल अफ्रीका पर कई छोटी-छोटी बन्दरगाहें उनके कब्जे में थीं। उन लोगों की सरकूबी के लिए यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन ने एक जंगी बेड़ा तैयार करने की ज़रूरत महसूस की।

462 हिजरी में अबूबकर बिन उमर ने वफ़ात पाई और मराकश के उलमा की तहरीक (हरकत) पर बरबर कौम के बड़े लोगों ने मुत्तफ़का तौरपर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन के हाथ पर बैअत कर ली। सबसे पहले बैअत करने वाला उसका चाचा-जाद भाई सयर बिन अबूबकर था।

अमीर यूसुफ ने मुराबितीन का अमीर बनने के बाद अफ्रीका को एक अज़ीमुश-शान सलतनत बनाने की कोशिशें तेज कर दी। चन्द बरसों में अफ्रीका का यह शहसवार उन दूर-दराज इलाकों में अपनी

फुतूहात के परचम लहराता जा रहा था जहां अभी तक कोई दूसरा मुसलमान फ़ातेह नहीं पहुंचा था। अफ्रीका के उन तारीक गोशों में भी अल्लाहु अकबर की अज़ानें गूंज रही थीं जहां अभी तक नीम बरहना इनसान बसते थे।

जब उन्दुलस के मरमरें ऐवानों में बसने वालों पर बेहिस्सी और जमूद (आलसी) तारी था उस वक्त मुराबितीन में मिट्टी के घरों और ख़स व ख़ाशाक के झोंपड़ों में एक सेहतमन्द कौम तख़लीक हो रही थी। उन्दुलसी तारीखदान के क़लम की सियाही खुश्क हो चुकी थी, लेकिन अफ्रीका का मुजाहिद अमीर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन अपनी तलवार की नोक से इस्लाम की तारीख का एक नया बाब लिख रहा था। उसने अफ्रीका में अलजज़ाइर से लेकर दरिया-ए-सैनीगाल तक तमाम कबाइल को एक इस्लामी हुकूमत के मातहत लाने का अज्म कर लिया था।

अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अमीर यूसुफ़ को जिस अज़ीम मकसद के लिए चुन लिया था वह मनज़िल अब क़रीब आ रही थी। गरनाता से एक नौजवान उन्दुलस के लोगों का पैगाम अमीर यूसुफ़ के नाम लेकर पहुंचा। अमीर यूसुफ़ उस वक्त अफ्रीकी कबाइल को एक इस्लामी रियासत के मातहत करने में मसरूफ़ थे। इस मुहिम से फ़ारिग होते ही अमीर यूसुफ़ ने उन्दुलस के मुसलमानों की दरखास्त कबूल करते हुए अपनी फौजों को उन्दुलस की तरफ़ पेशक़दमी के लिए तैयारी का हुक्म दिया।

रवानगी से एक दिन पहले अमीर यूसुफ़ का बड़ा बेटा अचानक बीमार हो गया और अगले दिन उसकी हालत तशवीशनाक हो गई।

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