मलिकुज्जाहिर गियासुद्दीन

मलिकुज्जाहिर गियासुद्दीन

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी के फ़रज़न्दों में मलिकुज़्ज़ाहिर सबसे ज़्यादा बहादुर, फुनूने सिपहगरी में माहिर और अपना सानी (मुकाबिल) न रखने वाला नौजवान था। सुलतान को मलिकुज्ज़ाहिर पर बहुत ज़्यादा एतिमाद था। सुलतान हर जंग में मलिकुज़्ज़ाहिर गियासुद्दीन को अपने साथ रखते थे।

मलिकुज्ज़ाहिर ने मैदान-ए-जंग में बड़े-बड़े सलीबी बहादुरों को ख़ाक चाटने पर मजबूर कर दिया था। उनको फुनून-ए-सिपहगरी में नुमायां मक़ाम हासिल था। शमशीर ज़नी (तलवार की लड़ाई) में तो उनका कोई सानी (मुकाबिल) नहीं था। हर जंग में जब इन्फिरादी मुकाबले होतो तो शमशीर ज़नी में कोई भी सलीबी मलिकुज़ाहिर से जिन्दा बचकर न जा सकता था।

मलिकुज्ज़ाहिर हल्ब के हाकिम थे। मगर हुकुमरानी से ज्यादा मैदान-ए-जंग में रहने का शौक उनकी घुट्टी में पड़ा था। चुनांचे वह
ज्यादा तर मैदान-ए-जिहाद ही में रहते थे।
जर्मनी का लशकर सलीबी जंग में शिरकत के लिए सलाहुद्दीन की तरफ बढ़ रहा था। वह जैसे ही शाम की सरहद में दाखिल हुआ मलिकुजाहिर ने अपनी फ़ौजों के साथ गोरीला जंग का सिलसिला शुरू करके जर्मन लशकर की नाक में दम कर दिया था।

मलिकुज़ाहिर सलाहुद्दीन अय्यूबी के लशकर में फ़तह का निशान थे। लशकर के जिस हिस्से में मलिकुज़ाहिर अपने जवानों के साथ होते वहां जंग का नक्शा ही कुछ और होता था।

वह ऐसे जरी (बेखौफ़) थे कि सलीबि बादशाह कानर्ड के दरबार में पहुंच गए और मौत की परवा किए बगैर उसको इन्फ़िरादी मुकाबले के लिए ललकारा और शिकस्त का मज़ा चखाया। मलिकुज़्ज़ाहिर में दीनी हमीयत (गैरत) बहुत ज़्यादा थी। काश आज के मुसलमान नौजवान मलिकुज़्ज़ाहिर को अपना आइडियल बनाएं ताकि जिस तरह मलिकुज़्ज़ाहिर के नाम से सलीबी ख़ौफ़ खाते थे इसी तरह आज भी आलमे इसाईयत मुसलमानों की तरफ़ मैली आंख से देखने की जुर्भात भी न कर सके।

सलीबी जंग में एक दफ़ा मलिकुज़्ज़ाहिर ने सलीबी बादशाह कानर्ड को देखा कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ अपनी फ़ौजें सफ़आरा कर रहा है तो उन्होंने अपने चन्द जानिसार साथ लिए और ईसाई लशकर की सर्फे उलटते हुए कानर्ड की तरफ बढ़े। कानर्ड के एक सरदार वलैरी ने आहन पोश सवारों के साथ बादशाह को हलके में ले रखा था। यह हलका तोड़ना आसान काम न था, लेकिन शहजादे के सर पर जुनून सवार था।

कानर्ड ने चन्द अरब सवारों को सफें चीरकर अपनी तरफ़ आते देखा तो वलैरी ब्रोसा को इशारा किया। वह अपने आहन पोश सवार लेकर आगे बढ़ा।

मलिकुज़्ज़ाहिर गियासुद्दीन को देखकर कानर्ड हैरान रह गया कि क्या फ़रज़न्द-ए-सुलतान दीवाना हो गया है, या मौत उसे मेरे सामने ले आई है? उसने अपने मुहाफ़िज़ सरदार को ललकार कर हिदायत दी।
‘सरदार वलैरी! सलाहुद्दीन का बेटा अपना सर लिए फिरता है। शायद वह डूअल (द्वंद्वयुद्ध) लड़ने आया है।”

वलैरी ब्रोसा ने बादशाह कानर्ड का मतलब समझ लिया और ललकारता हुआ मलिकुज़्ज़ाहिर के सामने आ गया। बएक वक्त 50 चमकती हुई तलवारें शहज़ादे की तरफ़ लपकीं। यकीनन यह एक बड़ी जंग थी। वलैरी ब्रोसा ने सोचा अगर वह सुलतान सलाहुद्दीन के बेटे का सर काटने में कामयाब हो गया तो इस्लामी दुनिया में उसका नाम रौशन हो जाएगा। इन्ही सुनहरी ख़यालों के जोश में वलैरी अपने सवारों को लेकर झपटा। मलिकुज़्ज़ाहिर ने उन पचास सरदारों में से एक का इन्तिख़ाब कर लिया और बद किस्मत से वह वलैरी ब्रोसा ही था। फिर लोगों ने एक बिजली-सी चमकती देखी और दूसरे लम्हे शहज़ादे का बरछा जिरह की कड़ियां काटता हुआ उसके पेट में धस चुका था। ईसाई सरदार की एक मकरूह और भयानक चीख़ बुलन्द हुई और मौत की खरखराहट में तबदील हो गई। फिर वह लुढ़क कर घोड़े की पीठ से नीचे गिर गया।

सलीबी परचमों के साये में कानर्ड ने अपने सरदार का यह इबरतनाक अन्जाम देख लिया था। वह मुहाफ़िज़ सवारों को ललकारता हुआ आगे
बढ़ा और चीखने लगा कि दुश्मनों को क़त्ल कर दो। मलिकुज़ज़ाहिर ने भी यह कड़क सुन ली थी। उसने कहा, “कानई मैं तुम्हारे साथ डूअल लड़ने आया हूं।”

अपने सिपाहियों की मौजूदगी में यह ललकार सुनकर कानर्ड बेइन्तिहा भड़क गया और तलवार तौलता हुआ आगे बढ़ा। दूसरे ही लम्हे उसने तलवार चला दी, लेकिन जूही मलिकुज़्ज़ाहिर की तलवार उछलकर टकराई और “छन” की आवाज़ बुलन्द हुई। कानर्ड ने घबराकर देखा। उसके हाथ में अपनी तलवार का सिर्फ दस्ता रह गया था। तलवार टूटकर फ़ज़ा में उड़ गई थी।

_ मलिकुज़ाहिर हरीफ़ की तलवार तोड़ने या उसे हवा में उड़ा देने के में माहिर और मिस्र व शाम में शोहरत रखत थे। बड़े-बड़े तजुरबेकार तलवार चलाने वाले उसके सामने बेदस्त हो जाते थे। कानर्ड ने टूटी हुई तलवार का दस्ता शहज़ादे के मुंह पर खींच मारा। (एक दफ़ा पहले भी ऐसा मुकाबला हो चुका था)। पहले की तरह फ़रज़न्द-ए-सुलतान ने अपनी तलवार घुमाकर उसे फ़ज़ा में उड़ा दिया। लेकिन जब उनकी तलवार नीचे आई तो कानर्ड की गरदन पर लटकती हुई जिरह के नीचे खून की लकीर खींचती हुई लौटी। बादशाह तड़प कर रह गया और उसी लम्हे उसने नेज़ा खींचकर अंधा धुन्द हमला कर दिया। मलिकुज़्ज़ाहिर पहले ही तैयार थे। उसने तलवार घुमाई और नेज़ा भी दरमियान से कटकर गिर गया। कानर्ड की आंखों से मौत झांकने लगी अगर वह तेजी के साथ घोड़े की बाग मोड़कर परे न हट जाता तो पुरजोश शहज़ादे की तलवार उसकी पसली काटती हुई निकल जाती। फ़न फौरन ही एक सिपाही ने तलवार कानर्ड की तरफ़ उछाल दी। मगर अब सलीब के पैरौकार में एक मुसलमान शेर से मुकाबले की जुर्भात न थी और उसने भाग जाने में ही आफ़ियत समझी। मलिकुज्जाहिर और उसके बेखौफ़ सवारों ने मारकूईस कानर्ड के तआकुब में घोड़े डाल दिए, लेकिन वह तो हवा से बातें करता उड़ा जा रहा था।। फिर बेशुमार ईसाई सवार, पयादे दरमियान में हायल होते चले गए। जिनकी वजह से “सलीबी हीरो” को भाग निकलने का मौका मिल गया।

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी के इस बहादुर सआदत मन्द बेटे से शायद ही हमारे नौजवान मुतआरुफ़ हों। इल्ला माशाअल्लाह।

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