मलिकुल-आदिल सैफुद्दीन

मलिकुल-आदिल सैफुद्दीन

– मलिकुल-आदिल सैफुद्दीन सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी के भाई थे जिनसे सुलतान को बेहद मुहब्बत थी। मैदान-ए-जिहाद में अक्सर सुलतान के साथ ही रहे। सुलतान को अपने भाई मलिकुल-आदिल पर नाज़े बेज था क्योंकि वह भी कभी सुलतान को मायूस न करते थे।

मिस्री सिपाह की सालारी मलिकुल-आदिल के पास थी। यह बड़ी ख़तरनाक फ़ोर्स और सुलतान की कामयाबी की जमानत थी। सुलतान मलिकुल-आदिल की सिपाह पर बहुत एतिमाद करते थे।

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने बहुत-से इख्तियारात अपने इस होनहार भाई के हवाले किए थे। सलीबी फ़ौज के अक्सर वुफूद से सुलह की शतें मलिकुल-आदिल तय किया करते थे। दराज कद
खूबसूरत चौड़े कंधेवाला यह जवान सलाहुद्दीन अय्यूबी की फौजी ताक़त का एक अहम सुतून था।

2 यरोशलम की फ़तह के बाद सुलतान ने इन्तिहाई रहम दिल का सुलूक करते हुए सलीबियों की न सिर्फ जान बख़्शी कर दी, बल्कि फ़िदया देकर आज़ादी का परवाना देने का हुक्म जारी किया। ऐसे वक्त में सुलतान के इस लाइक़ व फ़ाइक़ भाई ने एक हज़ार कैदी रिहा कर दिए।

मलिकुल-आदिल सुलतान के भाई ही नहीं उनके एक काबिले एतिमाद जरनेल भी थे। उनके साथ मिस्री बहादुरों की एक मजबूत फ़ौज के अलावा बेहतरीन जंगी सामान भी था जिनमें फ़ौलादी मिनजनीकें, तीर बरसाने वाले आहनी गोपिए, बर्क अफ़गुन तारकियात, फ़त्ताब और दीगर जंग के आलात शामिल थे।

सफ़र 586 हिजरी में सलाहुद्दीन अय्यूबी बीमार थे, उनको तबीबों और हकीमों ने आराम और आब व हवा की तबदीली का मशवरा दिया। ख़रूबा के मैदान में सुलतान ने मलिकुल-आदिल को फ़ौज अमीर बनाया और खुद आराम की गर्ज़ से करीब के जंगल में निकल गए ताकि शिकार से जी बहलाएं और कुछ आब व हवा भी तबदील हो।

सलाहुद्दीन अय्यूबी की गैर मौजूदगी में सलीबियों ने मौक़ा से फ़ायदा उठाने की कोशिश की। फ़िरंगी सरदारों और शहसवारों ने तिरकश और कमाने कन्धों पर डालीं। लम्बे-लम्बे नेज़े संभाले और घोड़ों पर सवार होकर अरब सिपाहियों का शिकार करने के लिए छावनी से बाहर निकले। उनके सवार और पयादा लशकर भेड़ियों की तरह गर्राते और हथियार लहराते खरूबा के पहाड़ी टीलों में आ छुपे।

उन्होंने तीन अतराफ़ से इस्लामी छावनी को घेर लिया और अचानक नारे लगाते हुए टूट पड़े।

– लेकिन मलिकुल-आदिल भी फिरंगियों से गाफ़िल न थे। जैसे ही सलीबी दस्ते पहाड़ों की ओट से निकलकर ख़रूबा की वादी के सामने पहुंचे उनपर दो अतराफ़ से तीरों की बारिश होने लगी और ईसाई लशकर में भगदड़ मच गई। घोड़े तेज़ी से अपने सवारों से आज़ाद होने लगे, मलिकुल-आदिल के मिस्री तीर अन्दाज़ों ने दुश्मन के सारे ख्वाब चकना-चूर कर दिए। ख़रूबा के पहाड़ों में एक ख़ौफ़नाक जंग शुरू हो चुकी थी, कोहिस्तानी वादियों में हथियारों के बजने से एक वहशत तारी हो गई। बद किस्मत सलीबियों को मुसलमान तेज़ी से शिकार करने लगे।

मलिकुल-आदिल को अगरचे ऐन वक्त पर सलीबी यलगार की ख़बर मिली थी, लेकिन उन्होंने दिफ़ाई हिसार (किला) कायम करने में देर नहीं लगाई। फिर मिस्री तीर अन्दाज़ बिजली की तेजी के साथ घाटियों और चट्टानों की ओट में छुप गए और जैसे ही हमला आवर उनकी जद में आए, उन्होंने दोनों तरफ़ से खूनी तीर अन्दाजी शुरू कर दी। सामने से मलिकुल-आदिल असदी और बुख़ारी कबीलों को लेकर आगे बढ़े। फिर आन की आन में फ़िरंगी शिकारी खुद शिकार होने लगे। उन्होंने मलिकुल-आदिल का घेरा तोड़ने की पूरी कोशिश की, मगर वे फंस चुके थे और आख़िरकार 2 हज़ार लाशें छोड़कर भाग खड़े हुए, मुसलमानों ने दूर तक उनका तआकुब किया।

सुलतान ईसाई हमलों की खबर सुनते ही उकाब की तरह उड़ते हुए आ पहुंचे, मगर सुलतान को पता चला कि दुश्मन एक जिल्लत को शहर की तरफ़ जाने का रास्ता नहीं देंगे।

शहज़ादा मलिकुल-अफ़ज़ल ने उस रोज़ गैर मामूली बहादुरी दिखाई और सलीबी लशकरों को रोका जो आगे बढ़कर इस्लामी छावनी को तबाह कर देना चाहते थे। फिर मलिकुल-अफ़ज़ल ने दिफ़ाई हैसियत को छोड़कर अपने बहादुरों को हमले का हुक्म दिया। यह हमला इस क़दर शदीद था कि दुशमन के छक्के छूट गए। दुशमन हज़ारों लोशें छोड़कर मैदान से फरार हो गया। मलिकुल-अफ़ज़ल एक कामयाब सिपहसालार था जो सुलतान की फ़ौजों को कामयाबी से लड़ाता। यही वजह थी कि सुलतान अपने बेटों पर बेइन्तिहा भरोसा करते थे और फ़ख़र भी। यही वजह है कि आज भी सुलतान के साथ उनका नाम ज़िन्दा है।

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