मलिकुल-मुजफ्फर तकीउद्दीन उमर

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी फ़ातेहे बैतुल-मुकद्दस जिन्होंने इस्लाम का नाम रौशन और झंडा सरबुलन्द किया, ईसाइयों से सलीबी जंगें लड़ी और कभी भी उन्हें इस्लाम पर हावी नहीं होने दिया। वह इस लिहाज़ से खुशकिस्मत हैं कि उसके तमाम जवान बेटे जिहाद में उनके शाना बशाना रहते थे। उसके भाई और भतीजे भी उनके साथ साथ होते थे। उन्हीं में एक नाम मलिकुल-मुज़फ़्फ़र तकीउद्दीन उमर का है।

सुलतान अपने इस भतीजे पर बजा तौरपर फ़ख़र करते थे, क्योंकि

तकीउद्दीन उमर फतह का निशान था। उसकी जंगी हिकमते अमली सुलतान की फ़ौज की फ़तह का बाइस होती थी। उसका जंग का तरीका ऐसा था कि दुश्मन पर लरज़ा तारी हो जाता था। वह जिधर बढ़ता दुशमन की फौजें पसपा होना शुरू हो जाती थीं और फ़तह व कामरानी उसके कदम चूमती थी।

सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी अपने इस भतीजे से बेइन्तिहा मुहब्बत करते थे। अकसर जंगों में तक़ीउद्दीन उमर सुलतान की फ़ौज में मैमना या मैसरा की कियादत के फ़ाइज़ अन्जाम देता और सुलतान का काबिले एतिमाद सिपहसालार था। आज का नौजवान मलिकुल मुज़फ़्फ़र तकीउद्दीन उमर के नाम से वाकिफ़ नहीं है। मेरी कोशिश नौजवानों को इस्लाम के ऐसे सिपाहियों से मुतआरुफ़ कराना है, ताकि मुस्लिम नौजवान आज जिस अहसासे कमतरी में मुब्तला हैं उससे निकलें और उन्हें यह भी पता चले कि इस्लाम के दामन में कैसे कैसे लाल व जवाहिर हैं और ऐसे-ऐसे मुजाहिदों की औलादें हैं जिनके डंके पूरे यूरोप में बजते थे। उसी यूरोप में जिसकी चका-चौंद से आज के नौजवान की आंखें ख़ीरा (चौंधयाया) हैं।

अक्का की जंग में सुलतान के जासूसों ने खबर दी कि ईसाई लशकर की तादाद एक लाख के करीब पहुंच चुकी है, तो सुलतान बड़े फ़िक्रमन्द हुए। उन्होंने वह रात बड़ी बेचैनी से गुज़ारी। सुबह जब खैमे से निकल कर एक टीले पर चढ़े तो यह देखकर हैरान रह गए कि सलीबी छावनी में ईसाई सवार और पयादे अपनी सफें दुरुस्त कर लेने के बाद बड़ी ख़ामोशी से आगे बढ़ रहे थे। गालिबन उनका इरादा था कि अचानक ही इस्लामी छावनी पर धावा बोल दिया जाए।

सलीबी फ़ौज मारकूईस कानर्ड की क़ियादत में निकली थी। कानर्ड अपने सवारों के साथ भेड़ियों की तरह गर्राता हमला आवर हुआ और
बुलन्द आवाज़ में चिल्लाया, “मुसलमानो! अपने सुलतान को बुलाओ, कहां है वह?” ,

तकीउद्दीन उमर ने यह आवाज़ सुनी तो अपना घोड़ा आगे बढ़ा दिया। लोगों ने उसे रोकना चाहा मगर मलिकुल-मुज़फ़्फ़र का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो रहा था कि क्या ईसाइयों में कोई ऐसा जांबाज़ पैदा हो गया है जो सुलतान को अपने मुकाबले पर आने की दावत दे सके? उससे पहले मलिकुल-मुज़फ़्फ़र से निमटना होगा। तक़ीउद्दीन उमर ने अपना घोड़ा कानर्ड के ख़ास दस्ता के सामने रोका और ललकार कर बोला, “सुलतान-ए-मुअज्जम को किस बदबख़्त ने तलब ” किया था?”

कानर्ड ने भी गैज़ व गज़ब के जोश में घोड़े को एड लगा दी। वह मलिकुल-मुज़फ़्फ़र के सामने आया और आते ही नेज़े से हमला कर दिया। तक़ीउद्दीन ने अपना नेज़ा कुछ इस तरह घुमाया कि कानर्ड का नेज़ा हाथ से निकलकर दूर जा गिरा।

मैमना और मैसरा जंग में उलझे हुए थे और दोनों लशकरों के सिपाही दादे शुजाअत दे रहे थे। लेकिन दोनों फ़ौजों के कल्ब ख़ामोश खड़े अपने सिपहसालारों की लड़ाई देख रहे थे।

कानर्ड ने फ़ौरन ही तलवार निकाली, लेकिन तकीउद्दीन ने अपना नेजा नहीं छोड़ा था। उसने घोड़ा घुमाया और नेजे का फल सीधा कर दिया। कानर्ड ने तलवार से नेज़ा काटने की कोशिश की, मगर नेज़े की अन्नी तो उसकी गर्दन को छूती गुज़र गई थी। फिर लोगों ने देखा कि कानर्ड का आहनी खोद और फ़ौलादी जाली तकीउद्दीन के नेजे पर लटक रही थी और सर पर बंधा रेश्मी रूमाल फ़ज़ा में उड़ रहा था।
तकीउद्दीन ने नेज़ा फेंक दिया, तलवार लहराई और अपने दुश्मन को कहर आलूद निगाहों से घूरता हुआ बोला, “तुमने
को मुबारजत (लड़ाई) के लिए तलब किया था, लेकिन मैं तेरी गर्दन काटे बगैर न जाऊंगा।”

कानर्ड के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। समझ गया कि मलिकुल मुज़फ़्फ़र ने उसके सर से खोद और हिफ़ाज़ती जाली उतार कर गर्दन क्यों नंगी कर दी है। वह तक़ीउद्दीन उमर को जानता था। उसने उसकी शुजाअत के किस्से सुन रखे थे। इस सोच के साथ ही उसकी रीढ़ की हड्डी में ख़ौफ़ की एक लहर सरसराई, चन्द लम्हे तलवारें टकराती रहीं। ऐन उस वक्त जब तकीउद्दीन की तलवार सरसे बुलन्द होकर कानर्ड के कंधे की तरफ़ आ रही थी, उसने अपने घोड़े को एड़ लगा दी। तलवार घोड़े की पुश्त पर पड़ी और वह बड़ी ख़ौफ़नाक आवाज़ में हिनहनाता भाग निकला। उसकी पुश्त पर लटकी हुई हरीरी चादर भीगने लगी। कानर्ड ने फ़रार ही में खैरियत समझी। अगर वही हाथ जो घोड़े की पुश्त पर पड़ा, उसकी गरदन पर पड़ता तो कानर्ड का सर तक़ीउद्दीन के नेज़ पर नज़र आता।

कानर्ड ने आते ही घोड़ा तबदील किया। उसी लम्हे इस्लामी मैसरा की तरफ़ से तकबीर की आवाज़ बुलन्द हुई।
सुलतान फ़ौरन आगे बढ़े, उन्होंने तक़ीउद्दीन का कंधा थपथपाया और मुहब्बत आमेज़ लहजे में बोले. ,
“जान-ए-अम्म। अब वह मुकाबले पर नहीं आएगा। आगे बढ़कर खुद हमला करो।”
तकीउद्दीन ने चाचा का हुक्म सुना और अपने लशकर को लेकर सलीबी कल्ब पर चढ़ दौड़ा। मैसरा के बाद ईसाई मैमना भी शिकस्त खाकर भाग निकला, तो तन्हा कल्ब मैदान में किस तरह जम सकता था? कानर्ड ने भी पसपाई इख्तियार की। उसके दिल पर अरबों की दहशत सवार हो चुकी थी।

तकीउद्दीन से सुलतान की मुहब्बत इस वाकिआ से जाहिर होती है जब अक्का की फ़तह के बाद रिचर्ड ने 2700 मुसलमानों को तलवारों से कत्ल करवा दिया। जिसका असर सुलतान की तबीअत पर एक घाव की तरह हुआ था। इस वाकिआ ने उन्हें गमगीन व रंजीदा कर दिया था।

वह बेकरार थे और इन्तिकाम की आग उनके सीने में भड़क रही थी, फिर भी अक़ल व दानिश का तकाज़ा था कि जल्दी में कोई कदम न उठाए। अचानक मिस्री जर कमाश हाज़िर हुआ। उसने बताया,

आला हज़रत! सितमज़दा खवातीन आपसे मिलना चाहती हैं।

“नहीं! हमारे पास वक़्त नहीं है। हम उनके आंसू नहीं पोंछ सकते। उनसे कह दो सब्र करें और लौट जाएं। यही अल्लाह की रज़ा थी।”

सुलतान का बाजू हवा में लहरा के रह गया और जर कमाश उनका हुक्म सुनते ही बाहर निकल गया। अभी उसे गए एक लम्हा भी नहीं गुज़री थी कि सुलतान के दो बेटे मलिकुल-अफ़ज़ल और मलिकुज़्ज़ाहिर अपने चाचाज़ाद भाई मलिकुल-मुज़फ़्फ़र तक़ीउद्दीन उमर शेर दिल के हमराह आए और सलाम व दुआ के बाद ख़ामोश खड़े हो गए। अगरचे वे तीनों अपने-अपने शहरो के वाली, फौजों के सिपहसालार और लशकर-ए-इस्लाम के मशहूर जरनेल थे। लेकिन सुलतानी रोब के सामने किसी को लब कुशाई की जुर्भात न होती थी। सुलतान सलाहुद्दीन ने खुद ही सिलसिला-ए-कलाम शुरू किया और अपने भतीजे तकीउद्दीन उमर से मुखातिब हुए,

‘बारकअल्लाह, तुम्हें एक साथ देखकर दिल को बहुत खुशी हुई, शायद तुम कुछ कहना चाहते हो।”
“सुलताने मुअज्जम! हम आपके बेटे हैं और दूसरों की बनिस्बत इस्लाम के लिए ज्यादा गैरत रखते हैं……

“बारकअल्लाह!”

16 ‘मगर हमारे दिल घायल हो चुके हैं, हम ज़ख्मों के लिए मरहम के तलबगार हैं।”
“जान-ए-अम! तुम क्या चाहते हो?”

आला हज़रत! सिर्फ इन्तिकाम का मरहम हमारे ज़ख्मों को मुन्दमिल कर सकता है। हम अपने मज़लूम और शहीद भाइयों के खून का बदला चाहते हैं और कुफ्फ़ार पर हमले की इजाज़त तलब करने आए हैं। अल्लाह की कसम! हम तीनों शहीद हो जाएंगे या फिर मैदान-ए-जंग से उस वक्त लौटेंगे जब कुफ्र के परचम ख़ाक व खून में लुथड़े होंगे

“तकीउद्दीन!” सुलतान की आवाज़ बिजली की मानिन्द कड़की और वह तेजी से दरीचा की तरफ़ घूम गए। मआज़ल्लाह! किया तुम हमें कत्ल कर देने का इरादा लेकर आए हो। अल्लाह की कसम! तुम्हारे बाद हम एक लम्हे के लिए भी जिन्दा नहीं रह सकेंगे।”

यह था सुलतान की मुहब्बत का हाल अपने शेर दिल भतीजे से और क्यों न होता कि वह सुलतान का एक होनहार जरनेल था जो जंग की भट्टी में कूदता तो जान हथेली पर रखकर दुश्मन के छक्के छुड़ा देता और उनको भागने पर मजबूर कर देता था।


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