सुलतान टीपू शहीद पार्ट 8

बचाव के सुझाव

जब सुलतान टीपू को महसूस हुआ कि वह अब ज्यादा देर तक अंग्रेज़ फ़ौज को किला में दाखिल होने से नहीं रोक सकेगा, तो उसने अपने सरदारों और अमीरों को तलब करके उनसे सलाह मांगी।

चंद फ्रांसीसी सरदारों ने सुलतान को तीन सुझाव पेश किए,

1. आप अपने बीवी बच्चों और माल व दौलत लेकर आधी रात के वक्त पन्द्रह हज़ार फ़ौज के साथ चीतल वर्ग के किले में चले जाएं।

2. आपके सरदार आप की हार का सबब हैं। चुनांचे तमाम मोरचों से अपने सरदारों को हटाकर मोरचे हमारे हवाले कर दें। हम उन मोरचों को बचाने के लिए जान दे देंगे, लेकिन दुश्मन के आगे सर नहीं झुकाएंगे और किसी सूरत में हथियार नहीं डालेंगे।

3. चूंकि अंग्रेज़ हमारी वजह से आपके दुश्मन हो रहे हैं इस लिए आप हम सब (फ्रांसीसियों) को गिरफ्तार करके अंग्रेजों के हवाले कर दें। फिर उनसे सुलह के लिए बात करें।

फ्रांसीसी सरदारों के सुझाव सुनकर टीपू सुलतान ने फैसलाकुन अन्दाज़ में कहा, “यह कैसे मुम्किन है कि हम तुम्हें दुश्मन के हवाले कर दें जबकि तुम सब हमारे दोस्त हो और अपने मुल्क से यहां आ कर हमारी खिदमत कर रहे हो। मैं हरगिज़ ऐसा नहीं करूंगा।”

इस सभा के बाद सुलतान ने काफ़ी सोच-विचार के बाद फ्रांसीसियों के दूसरे सुझाव पर अमल करने का इरादा करके अपने वज़ीरे आजम
मीर सादिक और वज़ीरे ख़ज़ाना पूरनया को बुलाकर उन्हें फ्रांसीसियों के सुझाव सामने रखा और उनसे पूछा कि तुम लोग राय दो, क्या किला और मोरचे फ्रांसीसियों के हवाले कर दिए जाएं?

पूरनया और मीर सादिक ने फ्रांसीसियों के सुझाव पर गौर किया। वे जानते थे कि अगर किले की सुरक्षा फ्रांसीसी सरदारों के हवाले कर दी गई तो उनकी साज़िश कामयाब न हो सकेगी। इस तरह मुम्किन है अंग्रेज़ शिकस्त खाकर भागने पर मजबूर हो जाएं और वे अंग्रेज़ों से अपनी वफ़ादारी का इनाम हासिल न कर सकें। चुनांचे उन्होंने फ्रांसीसियों के इस सुझाव का विरोध किया और सुलतान को गुमराह करने के लिए कहा, “अंग्रेज़ और फ्रांसीसी एक ही मज़हब और नस्ल के लोग हैं और उन्होंने कभी किसी से वफ़ा नहीं की। मुम्किन है वे आपसे गद्दारी करके अंग्रेजों से मिल जाएं और जंग किए बगैर ही किला अंग्रेजों के हवाले कर दें।”

सुलतान ने पूरनया और मीर सादिक़ की बातों में आकर फ्रांसीसी सरदारों की पहली तजवीज़ (सुझाव) पर अमल करने का फैसला किया कि बीवी-बच्चे, ख़ज़ाना और थोड़ी-सी फ़ौज के साथ चीतल वर्ग के किले में भेज दिया जाए और खुद यहां रहकर अंग्रेजों का भरपूर मुकाबला किया जाए। चुनांचे तमाम तैयारियां मुकम्मल करने के बाद रवानगी के वक्त सुलतान टीपू ने फिर अपने सरदारों और अमीरों से उनकी राय मांगी। –

एक सरदार बदरुज्जमा नायता ने सुलतान के इस इकदाम का विरोध करते हुए कहा कि “आपके खानदान के चीतल वर्ग जाने से मुम्किन है कि उनकी जान बच जाए, लेकिन इस इकदाम का नतीजा यह निकलेगा कि फ़ौज में बददिली फैल जाएगी और वे आपसे
हो जाएंगे कि आपने सिर्फ अपने बीवी-बच्चों को बचाने का इंतिज़ाम किया, दूसरों के बीवी-बच्चों का अहसास नहीं किया। इस लिए आप का यह इकदाम ठीक नहीं समझा जाएगा।

बदरुज्जमा नायता और उसके साथी गद्दारों को सुलतान तो किया सुलतान के बीवी-बच्चों का भी बचकर निकल जाना मंजूर न था। वे सुलतान टीपू और उसके सारे ख़ानदान को मरवाने पर तुले हुए थे। चुनांचे उनके विरोध पर सुलतान ने यह मुआमला खुदा पर छोड़ा और शाही ख़ानदान की रवानगी स्थगित कर दी, हालांकि रवानगी की तैयारी मुकम्मल हो चुकी थी और ज़रूरी माल व असबाब, हाथियों, ऊंटों और गाड़ियों (बैल गाड़ियों) पर लादा जा चुका था। लेकिन गद्दार बदरुज्जमा’ नायता ने ऐसी बात कही थी कि सुलतान को उन्हें रवाना करने का इरादा स्थगित करना पड़ गया।

गद्दारों के लिए सजा

सुलतान टीपू गद्दारों और साजिशियों में घिरा हुआ था। वह उनकी वतन फ़रोशी और नमक हरामी से बेख़बर था, लेकिन एक दिन उसे सब कुछ मालूम हो ही गया। हुआ यूं कि अंग्रेजों की गोलाबारी से किले की दीवार एक जगह से गिर गई। गद्दारों ने दीवार गिरने की ख़बर भी सुलतान तक न पहुंचने दी और अंग्रेजों ने वहां से किले में दाखिल होने के लिए आगे बढ़ना शुरू कर दिया।

लेकिन इससे पहले कि अंग्रेज़ अपने इरादे में सफल होते, किसी तरह सुलतान का एक वफ़ादार सुलतान तक पहुंच ही गया। उसने सुलतान को तमाम गद्दारों और नमकहरामों की साजिशों से आगाह कर दिया। सुलतान को पहले तो सख़्त हैरत हुई। फिर उसे गद्दारों और
नमकहरामों पर बेहद गुस्सा आया और उसने दूसरी सुबह अपने एक वफ़ादार मीर मुईनुद्दीन को एक कागज़ दिया। सुलतान ने उससे कहा कि “आज रात ही इस हुक्म को पूरा किया जाए।” मीर मुईनुद्दीन को पता नहीं था कि कागज़ में क्या लिखा हुआ है। उससे बेवकूफ़ी हुई कि उसने दरबार में ही कागज़ खोलकर पढ़ लिया। करीब ही मौजूद एक गद्दार की कागज़ पर निगाह पड़ गई। उसमें सुलतान ने तमाम गद्दारों के नाम और उनको कत्ल कर देने का हुक्म लिखा था। गद्दारों की सूची में सबसे पहला नाम सादिक था। उस गद्दार ने उसी वक्त मीर सादिक को सुलतान के हुक्म की ख़बर पहुंचाई। इस तरह मीर सादिक और दूसरे गद्दारों व साज़िशियों ने तुरन्त अपनी हिफ़ाज़त और बचाव के इन्तिज़ामात कर लिए।

सुलह की कोशिश

सुलतान फ़तेह अली टीपू ने सलतनते खुदादाद मैसूर को अंग्रेजों के हमले से बचाने की हर मुम्किन कोशिश की थी। लेकिन सलतनत के गद्दारों और वतन फ़रोशों ने उसकी हर कोशिश नाकाम बना दी थी। अब दुश्मन श्रीरंगापटनम पर कब्जा करना चाहता था और सुलतान श्रीरंगापटनम को बचाना चाहता था। इसलिए उसने मुनासिब समझा कि अंग्रेजों से सुलह कर ली जाए। उसने अंग्रेजों के पास सुलह का पैगाम भेजा तो अंग्रेजों ने सुलह के लिए इंतिहाई सख़्त और शर्मनाक शर्ते पेश कीं। उन शर्तों के साथ उन्होंने सुलतान को धमकी भी दी कि 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर इन शर्तों को स्वीकार न किया गया तो श्रीरंगापटनम को बिल्कुल तबाह व बरबाद कर दिया जाएगा। लेकिन सुलतान टीपू एक गैरतमन्द हुकुमरान था और वह अपनी जान बचाने
के लिए श्रीरंगापटनम के लोगों की जिंदगियां दाव पर लगाना बुज़दिली और गुनाह समझता था। इसलिए उसने अंग्रेजों की पेश की हुई शर्ते स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। शर्ते ये थीं:

1. बीस लाख पौन्ड तावाने जंग अदा करें।

2. तमाम साहिली इलाके हमारे हवाले कर दिए जाएं।

3. अपनी फ़ौज के फ्रांसीसी सिपाहियों, जरनेलों और अफ़सरों को तुरन्त हटा दें।

चूंकि अंग्रेजों का पल्ला भारी था और उन्हें अपनी जीत का यकीन था इस लिए उन्होंने इतनी सख्त शर्ते पेश की थीं।

नुजूमियों की पेशगोई

शेरे मैसूर सुलतान टीपू ने 4 मई 1799 ई० को फ़जर की नमाज़ अदा की। फिर घोड़े पर सवार होकर किले की दीवार की तरफ़ रवाना हुआ। वहां सुलतान ने टूटी हुई दीवार का निरीक्षण करने के बाद उसकी मरम्मत का हुक्म दिया और अपने बैठने के लिए दीवार पर साइबान लगाने का हुक्म देकर वापस शाही महल में आ गया। थोड़ी देर बाद चंद नुजूमी सुलतान की ख़िदमत में हाज़िर हुए। उन्होंने सुलतान से कहा कि “आज का दिन आप के लिए बहुत मनहूस है और ख़ास तौर पर दोपहर का वक़्त तो बहुत ही मनहूस है। इसलिए आपके लिए बेहतर यह होगा कि आप यह वक्त अपने सरदारों और वज़ीरों के साथ गुज़ारें और नहूसत टालने के लिए सदका खैरात करें।”

नुजूमियों की बात सुनकर सुलतान टीपू ने गुसल किया, फिर जवाहरात, चांदी और सोना दरवेशों और ब्राह्मणों में बांट दिया जबकि
गरीबों, मोहताजों और मिसकीनों में रुपया और कपड़ा तकसीम किया। उसके बाद सुलतान दस्तरख्वान पर खाना खाने के लिए बैठा। अभी खाना खाना शुरू ही किया था कि शहर की तरफ से चीख व पुकार का शोर बुलन्द होने लगा और सुलतान ने खाना छोड़ दिया। इतने में चंद वफ़ादारों ने आकर ख़बर दी कि सैय्यद गफ्फार तोप का गोला लगने से शहीद हो गए हैं और दुश्मन किसी रोक-टोक के बगैर किले की तरफ बढ़ रहा है। सैय्यद गफ्फार सुलतान टीपू का एक बहुत ही वफ़ादार सरदार था। उसकी शहादत की ख़बर सुन कर सुलतान जल्दी से उठकर बाहर आया और अपने घोड़े पर सवार होकर वफ़ादार सिपाहियों के साथ किले के दरीचा की तरफ़ चल दिया। वह दरीचे से निकला और दुश्मन पर हमला करने के लिए बिला खौफ़ व ख़तर आगे बढ़ता चला गया। इसी लम्हे मीर सादिक दरीचा के करीब आया और उसने दरीचा बन्द कर दिया ताकि सुलतान वापस किले में दाखिल न हो सके।

नमकहराम पूरनया

अंग्रेज़ किले तक पहुंचने की सर तोड़ कोशिश कर रहे थे, लेकिन मोरचों पर सुलतान की वफ़ादार फ़ौज की मुज़ाहमत के सबब उन्हें किले पर कब्जा करना दुश्वार महसूस हो रहा था। उन बहादुर सिपाहियों को मोरचों से हटाने के लिए अंग्रेजों ने पूरनया की मदद हासिल की। चुनांचे जब जंग पूरे जोर पर थी, उस वक्त गद्दार पूरनया ने सुलतान के लश्कर में आकर ऐलान करा दिया कि “सिपाही आकर अपनी अपनी तनख्वाह वुसूल करें।” सिपाही तनख्वाह लेने के लिए मोरचों से हटे तो गद्दारों ने दुश्मन को इशारा कर दिया। मैदान साफ़ ने
देख कर जनरल बेयर्ड अंग्रेज़ी फौज के साथ तेजी से आगे बढ़ा। एक गद्दार मुसलमान अफ़सर मीर कासिम अली ने उनकी रहनुमाई की और सब से पहले दीवार पर चढ़ गया। तब अंग्रेज़ फौज ने दीवार पर चढ़कर अपना झण्डा लहरा दिया।

सुलतान टीपू ने गद्दारों की गद्दारी देखी तो उसे बहुत गुस्सा आया। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। वह अपने वफादारों के साथ वापस चल दिया ताकि किले के अन्दर जाकर अंग्रेज़ी फौज को रोके। लेकिन किले का वह दरीचा बन्द था जिससे गुज़र कर सुलतान बाहर आया था। सुलतान ने दरबानों को दरीचा खोलने के लिए आवाजें दी, लेकिन उन्होंने दरीचा न खोला जबकि दुश्मन फ़ौज का एक दस्ता फायरिंग करता हुआ सुलतान की तरफ बढ़ रहा था।

सुलतान टीपू बहादुर बाप का बहादुर बेटा था। खुद को मौत के मुंह में देखकर भी उसके हौसले पस्त न हुए। वह समझ चुका था कि अब उसकी ज़िन्दगी की आख़िरी घड़ियां हैं। चुनांचे उसने हिम्मत न हारी और मौत से डरने के बजाए आखिरी सांस तक मौत का मुकाबला करने का फैसला कर लिया। दुश्मन गोलियों की बारिश करता हुआ करीब पहुंचा तो सुलतान के जांनिसारों ने सुलतान को सलाह दी कि आप खुद को अंग्रेज़ अफ़सर पर ज़ाहिर कर दें, वह आप के रुतबे (पद) का ख़याल करेगा और आपकी जान बच जाएगी। सुलतान ने उनकी सलाह सुनी तो शेर की तरह गरजदार आवाज़ में कहा,

हरगिज़ नहीं, मुझे दुश्मन से रहम की भीक नहीं चाहिए, शेर की एक दिन की ज़िन्दगी गीदड़ की सौ साल की ज़िन्दगी से बेहतर है।”

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