सुलतान टीपू शहीद पार्ट 4

टीपू की सीरत और किरदार का अध्ययन

सुलतान फ़तेह मुहम्मद टीपू की मरहटों और अंग्रेजों से होने वाली जंगों को बयान करने से पहले उसकी सीरत व किरदार का अध्ययन कर लिया जाए तो हमें उसकी शख्सियत को समझने में बहुत आसानी रहेगी।

बेमिसाल सिपहसालार

सुलतान टीपू एक सिपाही और सिपहसालार का बेटा था। उसमें तमाम सिपाहियाना सलाहियतें मौजूद थीं। वह एक बेमिसाल जरनेल था जिसने अकेले होने के बावजूद तीन दुश्मन ताकतों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और उन्हें कई इबरतनाक शिकस्त दी। बहादुरी और दिलेरी में कोई उसके जैसा नहीं था। बचपन में एक दिन वह एक फ्रांसीसी अफ़सर के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। अचानक एक
शेर सामने आ गया। फ्रांसीसी अफ़सर ने तुरन्त बन्दूक सीधी की और ने शेर का निशाना लेने लगा। लेकिन इससे पहले कि वह गोली चलाता, टीपू ने उससे बन्दूक छीन कर फेंक दी। फिर तलवार लेकर शेर पर टूट पड़ा और ज़रा सी देर में उसने शेर को हलाक कर डाला। इस वाकिआ से उसकी बहादुरी की धूम मच गई।

शेरे मैसूर

सुलतान टीपू ने मरहटों और अंग्रेजों के साथ जिस बहादुरी और बेमिसाल हिम्मत से जंगें कीं, वह इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। लोग अब तक सुलतान टीपू को “शेरे मैसूर” के नाम से याद करते हैं। हकीकत में वह था भी शेर दिल। उसने कई शेर पाल रखे थे और उनसे खेला करता था। उसे शेर की खाल पर रंगदार धारियां बहुत पसन्द थीं, उसने महल के पर्दो और दीवारों पर शेर का रंग कराया हुआ था। उन परदों और दीवारों को देखकर गुमान होता था कि वे शेरों की खालें हैं। और तो और सुलतान टीपू लिबास भी इसी रंग का पसन्द करता था। उसने अपने लिबास के लिए एक ख़ास कपड़ा बनवाया था जिस पर शेर का रंग और धारियां थीं। शुरू-शुरू में यह कपड़ा सिर्फ सुलतान टीपू के लिबास में इस्तेमाल हुआ, , लेकिन फिर यह इतना मकबूल और मशहूर हुआ कि हर आदमी इस्तेमाल करने लगा। इस कपड़े को बबरी कपड़ा कहा जाता था।

टीपू का हुलिया और लिबास

शेरे मैसूर सुलतान फ़तेह अली टीपू के चहरे की बनावट नाजुक और तीखी थी। रोबदार चहरे पर बड़ी-बड़ी चमकदार आंखें थीं, भंवें कमान जैसी और नाक खुमदार जबकि गर्दन छोटी मगर भारी थी।

बदन मोटा-ताज़ा और हाथ-पांव छोटे मगर नाजुक थे। भारी जिस्म पर कंधा गोल और उभरे हुए थे। उसके चहरे से शाही जलाल और वकार टपकता था। सुलतान का लिबास कमीज़, पाजामा, जाकेट और पगड़ी था। शुरू में वह सुर्ख रंग की पगड़ी इस्तेमाल करता था जो भारी और फैली हुई होती थी मगर बाद में वह सब्ज़ रंग की पगड़ी इस्तेमाल करने लगा जिस पर वह एक सफ़ेद रूमाल भी बांधा करता था।

सुलतान टीपू कमर में एक सुनहरी पेटी और पटका बांधता था जबकि पहलू में मियान होती जिसमें खूबसूरत दस्ते वाली तलवार होती थी।

इस्लाम से मुहब्बत

सुलतान टीपू दीन का शैदाई और पक्का मुसलमान था। उसे अपने मज़हब इस्लाम से बहुत मुहब्बत थी। वह नमाज़ रोजे का बहुत पाबन्द था। हमेशा वक्त पर और जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ता था। नमाज़ से उसे इतनी रगबत थी कि उसने श्रीरंगापटनम में एक बहुत शानदार मस्जिद बनवाई जिसमें पहली नमाज़ की इमामत के लिए तय हुआ कि ऐसा शख्स इमामत करे जिसने कभी नमाज़ कज़ा न की हो। उस वक़्त मस्जिद में बड़े-बड़े आलिम, फ़ाज़िल, मुत्तकी और परहेज़गार मौजूद थे, लेकिन इस शर्त पर कोई पूरा न उतरा। सिर्फ टीपू ही एक ऐसा आदमी था जिसने दावा किया कि उसने आज तक कोई नमाज़ कज़ा नहीं की। इस तरह पहली नमाज़ की जमाअत टीपू ने ही कराई, उस मस्जिद का नाम “मस्जिद-ए-आला” था।

हिन्दुस्तान के तारीख में सुलतान टीपू की शर्म व हया का जिक्र भी किया गया है। वह इतना हयादार और शर्मीला था कि सारी उम्र कभी गुसल ख़ाने में भी नंगा नहीं नहाया। नमाज़ पढ़ने के बाद बड़ी अकीदत व लगन से कुरआन की तिलावत करना उसका रोज़ाना का
काम था। समाजी बुराइयों और गैर-शरई बातों का सख्त विरोधी था। उसने अपनी सलतनत में शराब और जुआ पर सख्त पाबंदी लगा रखी थी। उसने ऐसे तमाम मेवे और खजूर के पेड़ कटवा दिए जिनसे शराब बनाई जाती थी।

सुलतान के दरबार में आलिमों और दानिशवरों की भीड़ रहती थी और वहां हमेशा इल्मी, अख़लाकी और सियासी बातचीत की जाती थी। किसी को गन्दी या बेकार बात करने की हिम्मत न थी। सुलतान खुद भी हमेशा सोच-समझ कर बात करता था। –

अदल व इन्साफ

सुलतान टिपू इन्साफ़ पसन्द बादशाह था। इस मुआमले में वह मुसलमानों और हिन्दुओं में कोई फर्क नहीं समझता और हमेशा हक का साथ देता था। वह दूसरी कौमों से भी हमेशा अच्छे अखलाक से पेश आता था। उसने हर धर्म के मानने वालों को अपनी मजहबी रस्में अदा करने की पूरी आज़ादी दे रखी थी। जो सहूलत और आजादी मुसलमानों को हासिल थी, वही हिन्दुओं को भी हासिल थी। उसके दरबार में बहुत से सरदार व वज़ीर और अफ़सर हिन्दू थे।

सुधार की कोशिशें

सुलतान टीपू ने मैसूर का बादशाह बनने के बाद न सिर्फ दुश्मनों का बहादुरी से मुकाबला किया बल्कि जनता की भलाई और बेहतरी के लिए भी बहुत काम किया और सलतनत की तरक्की पर ख़ास ध्यान दिया। उस ज़माने में गुलाम रखने का आम रखाज था। मालिक अपने गुलामों पर बहुत जुल्म करते। सुलतान को आजादी बहुत पसन्द

थी। उसने ऐलान कर दिया कि उसकी सलतनत में कोई व्यक्ति किसी को गुलाम नहीं रख सकता। इस वक्त मुल्क में जितने भी गुलाम हैं, वे बिल्कुल आज़ाद हैं और आइन्दा कोई व्यक्ति तनख्वाह के बगैर किसी को नौकर नहीं रख सकता। इस कानून से मैसूर में मौजूद हज़ारों गुलामों को आजादी मिल गई।

1 सुलतान ने किसानों, ताजिरों और आम लोगों के लिए बहुत- -से बैंक खोले, जिन में लोगों ने शिराकत की बुनियाद पर रुपया लगाया। उस रुपय से बैंक तिजारत करते और मुनाफ़ा हिस्सेदारों में बांट दिया जाता, जबकि ज़रूरतमन्दों को सूद के बगैर कर्जे दिए जाते थे। उन बैंकों से जनता को बहुत फायदा पहुंचा।

सुलतान टीपू जागीरदारी निज़ाम का भी विरोधी था। उसने तमाम बड़े-बड़े ज़मीनदारों की जमीनें जब्त करके छोटे और गरीब किसानों में बांट दी, क्योंकि जमीनदार और जागीरदार किसानों पर बहुत जुल्म करते और उनका हक मार लेते थे। इस तरह सुलतान ने अपनी सलतनत से जागीरदारी निज़ाम का ख़ातमा कर दिया। उसने गांव के इलाकों में झगड़ों और मुकदमों का फैसला करने के लिए पंचायत का निज़ाम कायम किया। इससे गांव के लोगों को यह फ़ायदा हुआ कि वह अपने मुआमलात का खुद ही फैसला कर लेते थे।

बड़े मुकदमों के लिए सुलतान ने पंडित और काजी नियुक्त किए। पंडित हिन्दुओं और काज़ी मुसलमानों के मुकदमों का फैसला करते थे। किसी को उनके फैसले पर एतिराज़ होता तो उसे सुलतान से अपील करने का हक हासिल था।

सुलतान टीपू गैर-मुल्की चीज़ों को पसन्द नहीं करता था। उसने दूसरे देशों से चीजें मंगवाने पर पाबन्दी लगा दी और राष्ट्रीय उद्योगऔर व्यापार की तरक्की के लिए ताजिरों और छोटे दस्तकारों का हर तरह से हौसला बढ़ाया और मदद की। उसका हुक्म था कि सिर्फ अपने मुल्क की बनी हुई चीजें इस्तेमाल की जाएं ताकि मुल्क की दौलत मुल्क में रहे और मुल्क तरक्की की राह पर चले।

इन्तिज़ामी मामलों में पुलिस का निज़ाम भी शानदार था। अपराधों की ज़िम्मेदारी इलाके के पुलिस अफ़सर पर होती थी और जो नुकसान होता वह उस अफ़सर से पूरा किया जाता था। पुलिसवालों को बाकायदा तनख्वाह दी जाती और हर तीन साल बाद उन्हें इनाम के साथ तरक्की भी दी जाती थी जिसके सबब पुलिस को रिश्वत लेने की ज़रूरत ही न पड़ती थी और अपराध भी बहुत कम होते थे।

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