सुलतान टीपू शहीद पार्ट 2



सुलह और वादा खिलाफी

टीपू और हैदर अली की जीतों ने अंग्रेजों को मजबूर कर दिया कि वे हैदर अली से सुलह कर लें वर्ना वे उन्हें मार-मार कर उनका भुरकस निकाल देंगे। चुनांचे उन्होंने हैदर अली से सुलह की दरख्वास्त की। हैदर अली ने इस शर्त पर उनसे सुलह कर ली कि अंग्रेज़ आइन्दा उसके ख़िलाफ़ मरहटों की मदद नहीं करेंगे और अगर हैदर अली के इलाके पर मरहटों ने हमला किया तो अंग्रेज़ हैदर अली की मदद करेंगे।

मरहटे हैदर अली से अपनी हार का बदला लेने के लिए बेताब थे। उन्होंने अंग्रेजों से पूछा कि क्या वे हैदर अली से किए गए सुलह के समझौते के मुताबिक हैदर अली का साथ देंगे? अंग्रेज़ खुद चाहते थे कि मरहटों और हैदर अली में जंग हो ताकि हैदर अली की फौजी ताकत कमजोर हो जाए और बाद में वे हैदर अली से अपनी शर्मनाक हार का बदला ले सकें। उन्होंने हैदर अली से सुलह का जो समझौता किया था वह सिर्फ मदरास को बचाने और अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए किया था। उनके नज़दीक इस समझौते की कोई अहमियत न थी। चुनांचे उन्होंने मरहटों को यकीन दिलाया कि वह समझौते को तोड़ देंगे और हैदर अली की मदद नहीं करेंगे। ।

अंग्रेजों की तरफ़ से संतुष्ट होकर 1769 ई० में मरहटों ने मैसूर पर चढ़ाई कर दी। हैदर अली ने अंग्रेज़ों से मदद मांगी लेकिन अंग्रेज़ों ने उनकी मदद करने से साफ़ इन्कार कर दिया। हैदर अली को अंग्रेज़ों पर बहुत गुस्सा आया क्योंकि उन्होंने वादा ख़िलाफ़ी की थी। उन्होंने फैसला कर लिया कि वह अंग्रेज़ों को इस वादा ख़िलाफ़ी की इबरतनाक सज़ा देंगे और आइन्दा कभी भी उनके वादे पर भरोसा करने की गलती नहीं करेंगे।

सुलतान टीपू शहीद मरहटों की हार

फ़तेह अली टीपू को हैदर अली ने फ़ौज देकर रवाना किया और हिदायत की कि वह मरहटों को मैसूर की सरहदों से हट जाने पर मजबूर कर दे। चुनांचे बहादुर टीपू अपनी फ़ौज के साथ तेजी से आगे बढ़ा और सैयद नूर के करीब जा पहुंचा। मरहटा रियासत की राजधानी पूना से मरहटा फ़ौज का हर अव्वल लश्कर आ रहा था। टीपू ने सैयद नूर से बाहर रहकर रास्ते में ही मरहटा लश्कर को रोकने की कोशिश की, लेकिन मरहटे मैसूर की सरहदों से हटने पर तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी ताकत पर घमण्ड था और यह भी यकीन था कि अंग्रेज़ हैदर अली की मदद नहीं करेंगे। इसलिए वे मैसूर को आसानी के साथ जीत लेंगे।

जब हैदर अली को वहां की सूरतेहाल का पता चला तो उन्होंने टीपू को हुकुम भेजा कि मरहटों की पेशकदमी रोक कर उन्हें शिकस्त दी जाए। लेकिन उस वक्त तक हालात टीपू के बस से बाहर हो चुके थे। मरहटे आगे बढ़ते रहे और हैदर अली की फ़ौज पीछे हटती चली गई। मरहटे श्रीरंगापटनम की तरफ बढ़ रहे थे। हैदर अली की फौज को नुकसान पहुंच रहा था। मरहटा फौजें श्रीरंगापटनम के बिल्कुल करीब पहुंच गई। उन्हें यकीन था कि श्रीरंगापटनम को जीतना उनके लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं, चुनांचे वे मैसूर की फ़ौज के छोड़े हुए माले गनीमत और जंगी साजोसामान को तकसीम करने में लग गए। हैदर अली और टीपू के लिए यह अच्छा मौका था जिससे वे फायदा उठा सकते थे। चुनांचे जब मरहटा माले गनीमत की तकसीम में उलझी हुई थी, उस वक्त हैदर अली ने तेजी के साथ श्रीरंगापटनम की सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर और मजबूत बना लिया। मरहटों को हैदर अली के
इन इक़दामात की खबर न हो सकी। वे श्रीरंगापटनम के आस-पास के इलाकों को लूटने और माले गनीमत की तकसीम से फ़ारिग होकर श्रीरंगापटनम के किले के सामने पहुंचे तो अचानक ही हैदर अली ने अपनी फ़ौज के साथ किले से निकल कर मरहटों पर भरपूर हमला कर दिया।

मरहटों के लिए यह हमला इतना उम्मीद के ख़िलाफ़ था कि उनके कदम उखड़ गए और वे बेशुमार लाशें छोड़कर श्रीरंगापटनम से पीछे हटने लगे। वे हारकर भागने लगे तो टीपू ने उनका पीछा किया। मरहटे बिजनौर की तरफ़ भाग रह थे और बहादुर टीपू मौत का फ़रिश्ता बनकर अपनी फ़ौज के साथ उनका पीछा कर रहा था। आखिर उन्होंने घबराकर हैदर अली से सुलह की दरख्वास्त कर दी। हैदर अली की फ़ौज को इस जंग में काफी नुकसान पहुंच चुका था। इसलिए उन्होंने मरहटों से सुलह करना बेहतर समझा।

इस जंग में मरहटों ने हैदर अली के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था। वे जानते थे कि अगर उन्होंने मुकाबला जारी रखा तो हैदर अली और उनका शेर दिल बेटा टीपू उन्हें हर जंग में शिकस्त देकर अपने इलाके वापस ले लेंगे। इसलिए उन्होंने हैदर अली से सुलह की थी। हैदर अली भी चाहते थे कि मरहटों के साथ बेहतर सम्बंध कायम करने की कोशिश की जाए ताकि दोनों ताकतें मिल कर अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकाल दें। दूसरा वे यह भी देख चुके थे कि उनकी फ़ौज कमजोर हो चुकी है और वे मरहटों से अपने इलाके वापस नहीं ले सकते, चुनांचे उन्होंने मरहटों से सुलह कर ली कि अपनी फ़ौजी ताकत बढाने के बाद उन इलाकों को आजाद कराया जाएगा जिनपर मरहट कब्जा कर चुके थे।

टीपू और मरहटे

फ़तेह अली टीपू भी हैदर अली की तरह मरहटों और अंग्रेजों के नापाक इरादों के रास्ते में एक बड़ी रुकावट था। हैदर अली को उसकी सिपाहियाना सलाहियतों और बसीरत व जहानत का खूब पता था। बड़ा बेटा होने की वजह से टीपू उनका जानशीन भी था। हैदर अली के बाद उसी ने मैसूर के तख्त पर राज करना था। इसलिए हैदर अली ने उसे हर फ़ौजी मुहिम में अपने साथ रखा और कई जंगों पर उसे अकेले भेजा जहां टीपू ने काबिले फखर कारनामे अन्जाम दिए।

1773 ई० में मरहटों का सरदार माधवराव मर गया तो मरहटों की मुत्तहिदा ताकत बिखर गई और उनमें इन्तिशार पैदा हो गया। हैदर अली को ऐसे ही मौका का इन्तिज़ार था ताकि वह मरहटों से अपने वे इलाके वापस छीन सकें जिनपर मरहटों ने कब्जा कर रखा था। उनका इरादा था कि पहले मरहटों से अपने इलाके वापस लेकर अपनी सलतनत को मजबूत बनाएं और फिर वादा ख़िलाफ़ और दगाबाज़ अंग्रेजों से निमटें। चुनांचे माधवराव के मरने के बाद उन्होंने अपने बहादुर बेटे टीपू के साथ मरहटों पर हमला कर दिया।

मरहटा फ़ौजों ने हर जंग पर हैदर अली और टीपू की फ़ौजों का मुकाबला करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। वे हैदर अली और टीपू के तूफ़ानी हमले के सामने न ठहर सके और मैसूर के इलाके उनके हाथ से निकलते चले गए। हैदर अली ने मरहटों से अपने इलाके वापस लेने के बाद 1775 ई० में चिनार यादगार पर हमला किया और वह इलाका भी मरहटों से छीन लिया। इसी साल उन्होंने हिलारी के मरहटा से अपनी वह जागीर भी वापस छीन ली जो मरहटों से सुलह के वक्त हैदर अली ने मसलहत के तहत हिलारी के हवाले कर दी थी।

हैदर अली और टीपू ने मरहटों की कमजोरी और नाइत्तिफ़ाकी से फायदा उठाते हुए मरहटों के कुछ नए इलाके भी फ़तह करके अपनी सलतनत में शामिल कर लिए। 1774 ई० से 1778 ई० तक हैदर अली की सलतनत दरिया-ए-तंग भद्रा तक फैल गई और उससे आगे कृष्णा तक का मरहटा इलाका भी जीत लिया गया।

अंग्रेज़ और मैसूर

अंग्रेज़ हिन्दुस्तान पर कब्जा करके अपनी हुकूमत कायम करना चाहते थे। लेकिन जब “सलतनते खुदादाद मैसूर” इस्लामी रियासत बनने के बाद मरहटों को एक के बाद एक शिकस्त देकर और अपने इलाके वापस लेकर दोबारा इलाके की एक ताकतवर सलतनत बन रही थी तो वे हैदर अली और उसके नौजवान बेटे टीपू को अपने मकासिद और इरादों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट समझने लगे।

हैदर अली अंग्रेजों के नापाक इरादों की राह में एक नाकाबिले तसखीर चट्टान बन चुके थे जिसे ताकत के ज़रिए हटाना तनहा अंग्रेजों के बस की बात न थी। इस लिए उन्होंने इस चट्टान को गिराने के लिए हैदर अली और उनकी रियासत के ख़िलाफ़ नई साज़िशें और जोड़-तोड़ शुरू कर दी। इस साज़िश में उन्होंने निज़ाम हैदराबाद और मरहटों को भी शामिल किया जो पहले ही अंग्रेजों के मददगार और हैदर अली के मुखालिफ़ थे। –

अंग्रेजों से जंग

मैसूर की सलतनत में एक बन्दरगाह थी। उसका नाम माही था और हैदर अली ने यह बन्दरगाह फ्रांसीसियों को दे रखी थी जहां
फ्रांसीसी कारोबार करते थे और उनकी तिजारती कम्पनियां थीं। अंग्रेजों ने हैदर अली से जंग करने की योजना बनाई। इस योजना के तहत उन्होंने माही बन्दरगाह पर कब्जा करने के लिए 1780 ई० में हैदर अली के इलाके से अपनी फ़ौज गुज़ारी। अंग्रेजों की योजना थी कि हैदर अली को मुख्तलिफ जंगों में उलझा कर उसकी फौजी ताकत को कमज़ोर किया जाए और फिर मैसूर पर हमला करके उसपर कब्जा कर लिया जाए। इसी लिए उन्होंने हैदर अली के इलाके से फौज गुज़ारने की इजाजत हासिल न की ताकि वह भड़क जाए। उनकी यह चाल कामयाब रही और उनकी इस हिम्मत पर हैदर अली गज़बनाक हो गए।

हैदर अली समझते थे कि अगर उन्होंने अंग्रेजों की इस हिम्मत को नज़रअन्दाज़ कर दिया और उन्हें सज़ा न दी तो उनके हौसले बढ़ जाएंगे। अगर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कार्यवाई न की तो यह इस्लाम और इस्लामी सलतनत मैसूर से गद्दारी होगी। चुनांचे उन्होंने अपनी फ़ौज के साथ इस तेजी से हमला किया कि अंग्रेज़ सोच भी न सकते थे। वे बोखला गए। उनके लिए इस तूफ़ान को रोकना बहुत मुश्किल था जो हैदर अली की शक्ल में उनकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था।

अंग्रेज़ी फ़ौज का सालार जनरल हैक्टर बेबस हो गया। वह हैदर अली के मुकाबले में अपनी हार महसूस करने लगा तो उसकी बेबसी देख कर अंग्रेजों ने करनल बैली के नेतृत्व में मजीद फ़ौज जनरल हैक्टर की मदद के लिए रवाना कर दी।

टीपू और करनल बैली
टीपू हैदर अली के साथ था। हैदर अली को पता चला कि
करनल बैली को जनरल हैक्टर की मदद के लिए भेजा जा रहा है तो उन्होंने फ़ौरन टीपू को फ़ौज देकर रवाना कर दिया ताकि वह रास्ते में ही करनल बैली को रोक दे और जनरल हैक्टर तक सहायक फौज न पहुंच सके। बाप का हुक्म मिलते ही बहादुर टीपू आंधी तूफ़ान की तरह आगे बढ़ा और उसने रास्ते में ही करनल बैली की फौज को रोक लिया।

करनल बैली की फ़ौज के दो हिस्से हो गए। एक हिस्सा टीपू सुलतान की फ़ौज के घेरे में आ गया जबकि दूसरा हिस्सा अपने बचाव के लिए जंग करने लगा। लेकिन जल्द ही अंग्रेज़ी फ़ौज को शिकस्त हो गई। करनल बैली बचे-खुचे सिपाहियों के साथ मैदाने जंग से भाग गया। इस जंग में अंग्रेज़ी फ़ौज के पचास अफ़सर और डेढ़ सौ सिपाही गिरफ्तार कर लिए गए।

जनरल हैक्टर के लिए करनल बैली की मदद बहुत ज्यादा अहमियत रखती थी। लेकिन टीपू ने उस सहायक फौज का रास्ते में ही सफ़ाया कर दिया था। चुनांचे हैदर अली के मुकाबले में हार कर जनरल हैक्टर अर्काट की तरफ़ भाग गया। हैदर अली ने आगे बढ़ कर अर्काट का मुहासिरा कर लिया जबकि टीपू को छोटी-सी फ़ौज देकर भागे हुए अंग्रेजों पर छापे मारने और उन्हें परेशान करते रहने की हिदायत की ताकि भागे हुए अंग्रेज़ मद्रास तक न पहुंच सकें।

टीपू जंगल में

फ़तेह अली टीपू अपने बाप हैदर अली के हुक्मों को पूरा करने के लिए रवाना हुआ। हारी हुई अंग्रेज़ी फ़ौजी छुप कर मद्रास का रुख कर रहे थे। हैदर अली चाहते थे कि उनको मद्रास पहुंचने से पहलेरास्ते में ही खत्म कर दिया जाए ताकि अंग्रेजों की ताकत टूट जाए। टीपू ने भागे हुए अंग्रेज़ दस्तों का पीछा किया और जंगल बट के इलाके में भागती और बिखरती हुई अंग्रेज़ी फ़ौज के कई दस्तों पर छापा मार हमले करके उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।

उधर हैदर अली ने अर्काट का मुहासिरा कर रखा था, लेकिन अर्काट को फ़तह करना मुश्किल नज़र आ रहा था। चुनांचे हैदर अली ने टीपू को अर्काट पहुंचने का हुक्म भेजा। वह हर कीमत पर अंग्रेजों के इस ख़ास शहर को जीतने का इरादा कर चुके थे। अर्काट अंग्रेज़ों की बहुत बड़ी छावनी थी और यहां अंग्रेज़ी फ़ौज की तादाद भी बहुत ज्यादा थी। अंग्रेज़ इस खुश फ़हमी में मुबतला थे कि हैदर अली अर्काट जीत न सकेगा।

लेकिन जब टीपू अपनी फ़ौज के साथ अर्काट पहुंचा तो हैदर अली और टीपू की फ़ौजों ने ताबड़-तोड़ हमले करके अंग्रेजों के हौसले पस्त कर दिए। अंग्रेजों को शिकस्त हुई और हैदर अली ने अर्काट पर कब्जा करके जीत का झण्डा लहरा दिया। अर्काट की जीत अंग्रेजों के लिए बहुत बेइज़्ज़ती थी। उन्हें डर हुआ कि अब हैदर अली को मद्रास जीतने से रोकना उनके बस की बात नहीं रही। हैदर अली और उनका बेटा टीपू सुलतान बड़ी बहादुरी से उनके ख़ास शहरों और किलों को जीतते जा रहे थे। उनके हमले को रोकने की ख़ातिर अंग्रेज़ों ने सुलह के लिए एक वफ़्द (प्रतिनिधि मंडल) हैदर अली के ने पास भेजा।

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