हैदर अली पार्ट 5

हैदर अली व टीपू सुलतान की मजीद फुतूहात
सुलह से इन्कार

अरकाट की फ़तह हैदर अली के लिए बहुत अहम और अंग्रेजों के लिए बड़ी ज़िल्लतआमेज़ थी। इस फ़तह से हैदर अली के हौसले बुलन्द हो गए। अरकाट के बाद हैदर अली एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा शहर फ़तह करता चला गया। उसने अंग्रेजों के बहुत-से अहम मकबूज़ा इलाके और किले फ़तह कर लिए। इन जंगों में उसका बहादुर बेटा टीपू सुलतान भी हिम्मत व बहादुरी के कारनामे अंजाम दे रहा था।

हैदर अली की लगातार फुतूहात ने अंग्रेजों को परेशान कर दिया और हालात से मजबूर होकर उन्होंने एक बार फिर पुरानी चाल चलने का फैसला किया यानी सुलह। उन्होंने हैदर अली के पास सुलह के लिए एक वपद (प्रतिनिधि मंडल) भेजा। वफ़्द ने सुलह की दरख्वास्त की तो हैदर अली सोच में पड़ गया। उसने अंग्रेज़ वफ़्द की आवभगत की और उनके आराम का पूरा ख़याल रखा। चन्द दिन गुज़र गए। वपद



सुलतान हैदर अली का फैसला सुनने के लिए बेताब था, लेकिन हैदर अली तो बहुत पहले फैसला कर चुका था कि वह आइन्दा कभी अंग्रेजों की चाल में न आएगा और न उनके वादों पर भरोसा करेगा। चुनांचे वपद की चन्द दिन मेहमानदारी के बाद हैदर अली ने अपने फैसले का ऐलान कर दिया। इसका फैसला सुन कर अंग्रेज़ वपद को बहुत मायूसी हुई।

हैदर अली ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि मैं सुलह के लिए हरगिज़ तैयार नहीं हूं। अंग्रेजों से मेरी कभी सुलह नहीं हो सकती क्योंकि वे बद अहद और मक्कार हैं। सुलह करके मैं उनकी मक्कारी के जाल में फंसने के लिए तैयार नहीं।

कुडनूर की फतह

अरकाट और उसके बाद की फुतूहात में हैदर अली ने अंग्रेज़ फ़ौज के सालार कर्नल ब्रेथ वैट को जिस बुरी तरह हराया था वह अंग्रेजों के लिए बहुत जिल्लतआमेज़ थी। इस जंग में कर्नल ब्रेथ वैट की तकरीबन सारी फ़ौज मारी गई थी और उसने जान बचाने के लिए हैदर अली से बाकायदा अमान व सलामती की दरख्वास्त की थी क्योंकि गिरफ्तारी के बाद कर्नल को यकीन था कि हैदर अली उसे कत्ल कर देगा, लेकिन हैदर अली और टीपू सुलतान ने उसकी जान M बख्शी कर दी। कर्नल ने जान बचाने के लिए अपने फ़ौजी मरतबा, शिकस्त और कौमी वकार का भी ख़याल न रखा था। उसकी शिकस्त ने अंग्रेज़ों को बुरी तरह हिला कर रख दिया और जब हैदर अली ने उनकी दरख्वास्त पर सुलह करने से साफ इन्कार कर दिया तो उन्हें मद्रास को बचाने की फिक्र पड़ गई जो उनकी अहम छावनी थी। अंग्रेज़ मद्रास की सुरक्षा को मजबूत बनाने में लगे हुए थे कि
हैदर अली ने कुडनूर को फतह कर लिया जो अंग्रेजों का अहम केन्द्रह

और फौजी छावनी थी। कुडनूर की फ़तह के बाद अंग्रेजों को यकीन हो गया कि अब हैदर अली मद्रास का रुख करेगा।

अरनी पर कब्जा

अरनी भी अंग्रेजों के लिए बहुत अहम था। वहां जनरल सर आयरकोर्ट अंग्रेज़ फ़ौज के साथ मौजूद था। हैदर अली ने कुडनूर को
फ़तह करने के बाद अरनी का रुख किया। सर आयरकोर्ट को हैदर अली के आने का पता चला तो वह दहशत ज़दा हो गया। उसने यही !
बेहतर समझा कि मुकाबला करने की बजाए अपनी फ़ौज को बचा कर निकल जाए। उसका यह फैसला अंग्रेजों के लिए हार से ज्यादा

लतआमेज़ था। जब हैदर अली और टीपू सुलतान अरनी के करीब पहुंचे और आस-पास के इलाकों को फतह किया तो जनरल आयरकोर्ट अपनी फ़ौज के साथ अरनी से निकल कर मद्रास की तरफ भाग गया और हैदर अली ने अरनी पर कब्जा कर लिया।

fs अरनी से निकल कर अंग्रेज़ फौज मद्रास पहुंची और दूसरी अंग्रेज़ी फौजी से मिल कर मद्रास की फ़ौज व सुरक्षा की हालत को मजबूत बनाने लगी। अरनी की फ़तह के बाद अंग्रेजों ने अपनी पालीसी में यह ये बदलाव किए – (1) मद्रास की सुरक्षा को मजबूत से मजबूत – में से तर बनाया जाए, (2) हैदर अली को दूसरे इलाकों में उलझा दिया जाए ताकि उसे मद्रास का रुख करने की फुरसत ही ही न मिले।

मालाबार की गड़बड़

अंग्रेजों ने अपनी नई पालीसी के तहत मालाबार के साहिली इलाकों में गड़बड़ फैला दी और कर्नल हैमरस्टोन के नेतृत्व में फौज मालाबार में की तरफ रवाना कर दी ताकि मालाबार के इलाकों में हैदर अली की फौजों को हरा कर तमाम साहिली इलाके पर कब्जा कर ले। यह इलाका
अंग्रेजों और हैदर अली दोनों के लिए बहुत अहमियत रखता था। हैदर अली की बीमारी

► और इरादे मजबूत उन ही दिनों सुलतान हैदर अली, जिसकी सारी ज़िन्दगी अंग्रेजों, मरहटों से जंगें और मैसूर के साज़िशियों, गद्दारों और दुश्मनों की सरकूबी करने में गुज़र गई थी, उसपर कैन्सर के मर्ज़ ने हमला कर दिया लेकिन बीमारी के बावजूद उसके हौसले बुलन्द और इरादे थे। मैसूर के राजा की फ़ौज में सिपाही भर्ती होने के बाद मैसूर की फौज का सिपहसालार और फिर हुकुमरान बनने तक का सफ़र उसने अपनी अपनी इसी जवां हिम्मती और जुरअत व बहादुरी से तय किया था। उसके हौसलों को शिकस्त देना इस्लाम के दुश्मनों के बस की बात नहीं थी। बीमारी के दौरान उसे जब मालाबार में गड़बड़ की खबर मिली

तो उसने टीपू सुलतान को फ़ौज देकर मालाबार के हालात दुरुस्त करने और गड़बड़ पर काबू पाने के लिए रवाना कर दिया। उसकी फौज का एक मशहूर और माहिर फ्रांसीसी जरनेल भी इस मुहिम में टीपू सुलतान के साथ था। .

सोनापति का मुहासिरा

टीपू सुलतान फ्रांसीसी जरनेल और फ़ौज के साथ मालाबार पहुंचा तो वहां अंग्रेज़ अपनी साजिशों और मक्कारियों से काफी बदअमनी फैला चुके थे। वहां के लोग मुख्तलिफ़ गिरोहों में बटकर ख़ानाजंगी में मसरूफ़ थे। लेकिन टीपू सुलतान ने अपनी हिम्मत, बहादुरी और दानिशमन्दी से जल्द ही हालात पर काबू पा लिया और अंग्रेजों की यह चाल भी नाकाम हो गई। कर्नल हैमरस्टोन के नेतृत्व में अंग्रेज़ फ़ौज बहुत ज्यादा तादाद में बम्बई से रवाना होकर मालाबार के साहिली इलाके में पहुंची हैदर अली

तो उन्हें वहां टीपू सुलतान की फ़ौज का सामना करना पड़ा। उन्हें बम्बई से चलते वक़्त यह पता न था कि टीपू. सुलतान वहां पहुंच कर हालात पर काबू पा चुका है। चुनांचे जब मालाबार के करीब पहुंच कर उन्हें मैसूर की फ़ौज की मौजूदगी का पता चला तो करनल हैमर स्टोन ने मालाबार के इलाके से निकल जाने में ही बेहतरी समझी और अपनी फ़ौज लेकर सोनापति नदी पर वाके (अवस्थित) किले का रुख किया।

टीपू सुलतान ने फौरी तौरपर अंग्रेज़ी फ़ौज का पीछा किया, लेकिन अंग्रेज़ी फौज तेज़ी से फासले तय करके सोनापति पहुंच गई। इससे पहले कि टीपू सुलतान सोनापति पहुंचता, कर्नल हैमरस्टोन अपनी फौज के साथ सोनापति के किले में पनाह ले चुका था। टीपू सुलतान ने वहां पहुंचते ही सोनापति के किले का मुहासिरा कर लिया। वह किले को फतह करने और कर्नल हैमरस्टोन को शिकस्त देने के लिए किले पर बार-बार हमले करने लगा और मुहासिरा लम्बा होता चला गया। .

हैदर अली की मृत्यु

हैदर अली श्रीरंगापटनम में बीमार पड़ा था और उसकी बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। बेहतरीन इलाज के बावजूद उसकी सेहत ठीक होने की बजाए और ख़राब होती जा रही थी।

अंग्रेजों को हैदर अली की बीमारी का पता न था। वे तो उस समय का इंतिज़ार कर रहे थे कि हैदर अली कब अपनी पूरी ताकत और फ़ौज के साथ मद्रास पर हमला करेगा और क्या वह मद्रास को फ़तह करके हिन्दुस्तान से अंग्रेजों के कदम उखाड़ देगा?

बीमारी के हालात में भी हैदर अली के यही संकल्प थे कि वह ठीक होते ही मद्रास पर हमला कर देगा। इसके लिए वह अपने सेहत ठीक होने का इंतिज़ार कर रहा था। लेकिन कुदरत को कुछ
और मंजूर था। मौत का फ़रिश्ता उसकी ज़िन्दगी के आखरी लम्हे का इंतिज़ार कर रहा था। मौत और ज़िन्दगी में कश्मकश लम्बी होती जा रही थी। एक दिन बीमारी की शिद्दत में कुछ कमी आई तो हैदर अली बिस्तर से यूं उठा जैसे बिल्कुल ठीक हो गया हो। उस दिन उसके हुक्म पर मैसूर की फौजें मैदान में आरास्ता हुईं। हैदर अली ने अपने घोड़े पर बैठ कर फ़ौज का मुआयना किया। वापसी पर वह घोड़े से उतर कर बिस्तर तक पहुंचा तो बीमारी का शदीद दौरा पड़ा। उसने बिस्तर पर बैठते ही अपने ख़ास ख़िदमतगार को बुला कर हुक्म दिया

“टीपू को ख़बर दो कि तुरन्त मेरे पास आ जाए। तेजतरीन कासिद रवाना किए जाएं।”

तेज़ रफ़्तार कासिद फ़ौरन टीपू सुलतान की तरफ रवाना कर दिया गया। लेकिन इससे पहले कि कासिद सोनापति में टीपू सुलतान तक पहुंचता, सुलतान हैदर अली ने कलिमा-ए-शहादत पढ़ते हुए अपनी जान मालिके हकीकी के सुपुर्द कर दी। यह 6 दिसम्बर 1782 ई. का दिन था जब हैदर अली की मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु की खबर सुन कर टीपू सुलतान तुरन्त सोनापति से रवाना हुआ और श्रीरंगापटनम पहुंच गया। हैदर अली की मृत्यु के बीस दिन बाद यानी 26 दिसम्बर 1782 ई. को टीपू सुलतान मैसूर का हुकुमरान बन गया।

हैदर अली की सीरत

सुलतान हैदर अली किसी जरनेल के बेटे थे न किसी सुलतान के रिश्तेदार और न ही उनकी रगों में किसी फातेह का खून था। वह एक मामूली सिपाही थे। एक ऐसी रियासत के सिपाही जिसकी न तो बहादुरी की दास्तानें थीं और न ही उसके निज़ाम व इंतिज़ाम की कोई शोहरत थी। इस रियासत का नसीब तो उस वक्त जागा जब नवाब हैदर अली यहां के हुकुमरान बने और उनकी बहादुरी के चर्चे आम हुए। उनकी दूरअंदेशी और समझदारी ने अपना रंग दिखाया और उनकी हैदर अली

फौजी ताकत का चारों तरफ़ डंका बजने लगा। इस सरज़मीन (मैसूर) की अजमत और शान व शौकत में चार चांद लग गए और तारीख़ के पन्ने उन के कारनामों से सज गए।

हैदर अली ने एक आम सिपाही की हैसियत से अपनी अमली ज़िन्दगी की शुरूआत की। उन्होंने अपनी जाती और खुदा की दी हुई सलाहियतों के बलबूते पर जंगों में हिस्सा लिया और अपनी दिलेरी व बहादुरी के जौहर दिखाए। उन्होंने ऐसी बेमिसाल जांबाज़ी व जानिसारी का मुज़ाहिरा किया कि मैदान-ए-जंग के अन्दर और बाहर हर आदमी उनकी शख्सियत का गिरवीदा (चाहनेवाला) हो गया और उनकी अज़मत व शौकत के गुन गाने लगा। हर जरनेल, सूबादार, मैसूर के राजा के अलावा प्रधानमंत्री नन्दराज भी उनका ऐसा दीवाना हुआ कि हमेशा अपने करीब रखता और उनकी कोई बुराई बर्दाश्त न करता था। उनको तमाम सिपाहियों और फ़ौज के सरदारों पर तरजीह दी गई और उनकी ख़िदमत के बदले में उन्हें नवाब हैदर अली ख़ान, फ़तेह हैदर बहादुर और ख़ान के ख़िताबात दिए गए।

हैदर अली ने अपनी हैरत अंगेज़ सलाहियतों के बल पर तरक्की की मंज़िलें तय की और एक दिन रियासत के नवाब बन गए। उनकी कदिन रियासत के मां किसी बादशाह की मलिका न थी लेकिन उसने जिस हैदर अली को जन्म दिया, वह बादशाहों का बादशाह और ताजदारों का ताजदार बना। हैदर अली जैसी शख़्सियात रोज़-रोज़ पैदा नहीं होती। जमाना हज़ारों साल गरदिश में रहता है फिर कहीं हैदर अली जैसे मशहूर लोग पैदा होते हैं और जब पैदा होते हैं तो तारीख का रुख मोड़ देते हैं।

हिन्दुस्तान की तारीख में नवाब हैदर अली ख़ान हर लिहाज से मुनफ़रिद (अद्वितीय) और हर एतिबार से एक अनोखी और निराली शख्सियत हैं जो अपनी ज़िन्दगी के शुरू के 17 सालों में गरीबी व बेचारगी और इफलास व जहालत के अंधेरों में भटकते रहने के बावजूद

किसी माद्दी वसीले और सहारे के बगैर सिर्फ अपनी सलाहियत और काबलियत से सब से पहले पचास सवारों के कायद बने। फिर आहिस्ता आहिस्ता ऊपर को उठते, माहौल की रुकावटों को फलांगते और तूफ़ानों और हौलनाक मसाइल का मुकाबला करते हुए मैसूर की फौजों के

सिपहसालार बने। हैदर अली बड़े गैरतमन्द, बुलन्द हौसला और कुशादा दिल इन्सान थे। दुश्मनों ने उनके ख़िलाफ़ साजिशों का जाल बिछाया, मैसूर के राजा और रानी ने उनकी जान लेने की कोशिश की, लेकिन ताकत व कुदरत हासिल होने के बावजूद उन्होंने राजा के खून से हाथ नहीं रंगे। वह हिन्दुओं और मुसलमानों से बराबरी का सुलूक करते थे। उन्होंने न कभी हिन्दुओं की हुरमती की और न उनके मन्दिरों और पवित्र स्थानों पर कोई हमला किया। उन्होंने अपने वक्त की दो मज़बूत ताकतों मरहटों और अंग्रेजों का जिस बहादुरी से मुकाबला करके उन्हें शर्मनाक शिकस्तों से दो-चार किया, तारीख़ में बेमिसाल हैं। अगर आख़िरी मुहिम के दौरान पीठ पर कैन्सर का फोड़ा निकलने के कारण वह बीमार न हो जाते तो शायद अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकाल कर ही दम लेते।

हैदर अली का अंदाज-ए-हुकुमरानी हैदर अली बेशक पिछले बादशाहों, अमीरों और वज़ीरों से मुमताज़ शख्सियत के मालिक थे। जाह व जलाल और अज़मत व शौकत में कोई उनके जैसा न था। उनकी महफ़िल भी एक ख़ास शान रखती थी जिसमें कोई दूसरा बहुत कम कुछ कह पाता था। हैदर अली जो कुछ चाहते वह खुद ही कहते, दूसरों को सिर्फ हां कहने की हिम्मत होती M थी। उनकी महफ़िल और दरबार में आमतौर पर मुल्क के इंतिज़ाम, जंग के वाकिआत, तलवारों, बन्दूकों, जवाहिरात, हाथियों और खुश रंग व तेज़ रफ़्तार घोड़ों का जिक्र रहता था। वह गैर-मामूली ज़िहानत और सूझ-बूझ के मालिक थे। उनके ख़यालात बहुत ऊंचे थे।
सलतनत के मामलों और हुकुमरानी में बहुत होशियार और बाख़बर रहते थे। उन्होंने हर शहर, हर कसबा और हर सूबा में खबर लिखनेवालों के अलावा खुफ़िया खबरें भेजने वाला और होशियार जासूसों को अलग-अलग नियुक्त कर रखा था और उनके ज़रिए वह हर जगह की ख़बरें मंगवा कर हालात से बाख़बर रहने की कोशिश करते थे। उनमें काम को बेहतरीन ढंग से करने की बड़ी हैरत अंगेज़ सलाहियत थी। वह इतने महनती थे कि सुबह से शाम तक एक लम्हा भी फारिग रहकर बर्बाद न करते थे। तजुरबेकार, दिलेर और बहादुर लोगों, चाहे उनका सम्बंध किसी भी कौम से हो, की बड़ी कदर और हौसला अफजाई करते थे। जो आदमी भी कोई कारनामा या ख़ास काम अंजाम देता, उसके दरजे और मरतबे में इज़ाफ़ा व तरक्की देने से मुंह न मोड़ते थे।

सुलतान हैदर अली अवाम का बहुत ख़याल रखने वाले, इन्साफ़ पसन्द और मुखलिस हुकुमरान थे। वह अवाम के दुख-दर्द का बहुत ख़याल रखते और हर एक की सहायता करते थे। मैसूर को “सलतनते खुदादाद” का नाम देकर उन्होंने इस्लाम से अपनी दीनी लगाव का सुबूत दिया और इस्लाम दुश्मन मरहटों और अंग्रेजों पर वाजेह. कर दिया कि उनकी जंग एक मुसलमान हुकुमरान से है और मैसूर पर उनका हमला दरअसल इस्लाम और इस्लामी रियासत पर हमला समझा जाएगा। उन्होंने एक मुसलमान सिपहसालार की हैसियत से अंग्रेज़ों पर साबित कर दिया कि इस्लाम का सिपाही बातिल ताकतों की तादाद व ज्यादती से नहीं डर सकता और वह शिकस्त पर शहादत की मौत को तरजीह देता है। वह जब इस्लाम के दुश्मनों के मुकाबले में जंग के मैदान में उतरता है तो फ़तह व शिकस्त उसके लिए बेमतलब हो जाते है और उसकी ज़िन्दगी का मकसद शहादत के सिवा कुछ नहीं होता। –

शहादत है मतलूब व मकसूदे मोमिन न माले गनीमत, न किश्वर किशाई

हैदर अली औलाद और जानशीन

सुलतान हैदर अली के दो बेटे थे। फ़तेह अली टीपू और करीम। करीम फतेह अली टीपू से छोटा था। जब हैदर अली की मृत्यु हो गई, उस वक्त फतेह अली टीपू सोनापति में अंग्रेजों से जंग कर रहा था। चुनांचे सलतनत के उमरा ने इस ख़याल से फौरी तौरपर शहज़ाद करीम को कुछ दिन के लिए मैसूर का हुकुमरान बना दिया कि तख्त खाली न रहे और हुकूमत का इतिज़ाम चलता रहे।

जब फतेह अली टीपू वापस आया तो करीम खुद ही उसके हक में तख़्त से हट गया और उसने ताज-ए-शाही टीपू के हवाले कर से । दिया। चुनांचे 26 दिसम्बर 1782 ई० को फ़तेह अली टीपू सुलतान ने अपने बाप हैदर अली के जानशीन की हैसियत से मैसूर पर हुकुमरानी की शुरूआत की और फौरी तौरपर अपने मरहूम वालिद सुलतान हैदर अली के उस मिशन को पूरा करने में लग गया जो उनकी मृत्यु के कारण अधूरा रह गया था, जिसने टीपू सुलतान को तारीख में हैदर में अली से ज्यादा अजमत और शोहरत बख्शी।

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