तबरी(839 ई० 933 ई.)

तबरी
(839 ई० 933 ई.)

तबरी का पूरा नाम अबू जाफ़र मुहम्मद इब्ने जरीर था। वह अपने युग के महान इतिहासकार, धर्मशास्त्री और यात्री गुज़रे हैं। उनका जन्म 839 ई. में तबरिस्तान के इलाक़े आमिल में हुआ। उन्हें बचपन से ही लिखने-पढ़ने और सैर करने का शौक़ था। तबरी की आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। सात वर्ष की आयु में उन्होंने कुरआन हिफ़्ज़ (कंठस्थ) कर लिया। उनके पिता एक धनी व्यक्ति थे। इसलिए तबरी को घूमने-फिरने के लिए पैसे की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने इस्लामी जगत के सभी शिक्षा केन्द्रों का दौरा किया। घूमते-घूमते वह बग़दाद पहुँचे जहाँ इमाम अहमद बिन हंबल पढ़ाते थे लेकिन तबरी के वहाँ पहुंचने से पहले ही इमाम अहमद का निधन हो गया।

– अरबों के रहन-सहन और संस्कृति के बारे में उन्होंने बचपन से ही काफ़ी जानकारी प्राप्त कर ली थी जिससे उन्हें अरबों का इतिहास लिखने में बड़ी मदद मिली। इतिहास के अलावा वह गणित, आयुर्विज्ञान, नीतिशास्त्र और अरबी साहित्य में भी दक्ष थे।

इतिहास पर उन्होंने एक प्रामाणिक पुस्तक ‘अल रुसूल-वल-मुलूक’ लिखी। इस पुस्तक में विश्व इतिहास का बारह खण्डों में वर्णन है। बाद में आने वाले सभी इतिहासकारों ने इस पुस्तक से फ़ायदा उठाया। ‘अल-रुसूल-वल-मुलूक’ में धरती और आकाश की उत्पत्ती, आदम के जन्म, नबियों और बादशाहों के हालात विस्तार से लिखे हैं।

तबरी को इतिहास का पितामह माना जाता है। उन्होंने एक पुस्तक ‘तारीख़ुल रिजाल’ भी लिखी है। इस पुस्तक में हदीस (हज़रत मुहम्मद सल्ल० के कथन) का वर्णन करने वाले लोगों के बारे में जानकारी दी गई है। तबरी हर बात शोध और खोजबीन के पश्चात् ही लिखा करते थे। उन्होंने जीवन का बड़ा भाग खोजबीन में गुजारा।

यह तबरी की कोशिशों का नतीजा है कि हम इतिहास के उन कालखण्डों से परिचित हैं जो विश्वसनीय समझे जाते हैं।

तबरी का अन्तिम समय बग़दाद में पुस्तक लेखन में गुजरा और वहीं 933 ई० में देहांत हुआ।

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