मूसा अलैहिस्सलाम का मुक्का

मूसा अलैहिस्सलाम का मुक्का

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जब तीस साल के हो गये तो एक दिन फ़िरऔन . के महल से निकल कर शहर में दाखिल हुए। आपने दो आदमी आपस में लड़ते झगड़ते देखे । एक तो फिरऔन का बावरची था और दूसरा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की कौम यानी बनी-इस्राईल में से था। फ़िरऔन का बावरची लकड़ियों की गट्ठर उस दूसरे आदमी पर लाद कर उसे हुक्म दे रहा था कि वह फ़िरऔन के बावरचीख़ाने तक वह लकड़ियां लेकर चले। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने यह बात देखी तो फ़िरऔन के बावरची से फ़रमाया : इस गरीब आदमी पर जुल्म न कर । लेकिन वह बाज़ न आया और बदजुबानी पर उतर आया । हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे एक मुक्का मारा तो उस एक ही मुक्के से उस फ़िरऔनी का दम निकल गया और वह वहीं ढेर हो गया।

(कुरआने करीम पारा २० रुकू ५ रूहुल ब्यान जिल्द २ सफा ६२५) सबक : अंबियाए किराम मज़लूमों के हामी बनकर तशरीफ लाये हैं। यह भी मालूम हुआ कि नबी सीरत व सूरत और ज़ोर व ताक़त में भी सबसे बुलंद व बाला होता है। नबी का मुक्का एक इम्तियाज़ी मुक्का था कि एक ही मुक्के से ज़ालिम का काम तमाम हो गया।

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