अहमद बिन अबी याकूबी(834 ई० 897 ई.)

अहमद बिन अबी याकूबी
(834 ई० 897 ई.)

याकूबी का पूरा नाम अहमद बिन अबी याकूबी था। उन्हें याकूबी के नाम से ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने भूगोलशास्त्री की नींव रखी। इसलिए उन्हें भूगोलशास्त्री का अन्वेषक कहा जाता है। उनके बाद आने वाले मुस्लिम भूगोलशास्त्री इदरीसी और अबुल फ़िदा उनकी पुस्तकों से लाभान्वित हुए।

याकूबी ने वर्षों पर्यटकों से मिलकर विभिन्न क्षेत्रों और नगरों की जानकारी प्राप्त की और अपनी विश्व विख्यात पुस्तक किताबुल बलदान 891 ई० में लिखी। इस पुस्तक में उस समय के शहरों और क्षेत्रों के फ़ासले, वहाँ के हालात और रहन-सहन का बड़ा दिलचस्प विवरण किया। अपनी पुस्तक में उन्होंने विभिन्न नगरों में लगने वाले टैक्स के बारे में भी लिखा।

किताबुल बलदान में वह लिखते हैं, “युवावस्था के प्रारम्भ से ही मुझे विभिन्न नगरों और वहाँ के रहन-सहन के बारे में जानने की इच्छा हुई। मुझे देशों का इतिहास जानने का बड़ा शौक़ था। मैंने बचपन में दूर-दूर देशों की यात्रा की थी। वह लिखते हैं, “किसी क्षेत्र के लोगों से मिलने का अवसर मिलता तो मैं उनके देश के हालात और संस्कृति के बारे में जाने बगैर न रहता। मैं उनके देश की राजनैतिक और भोगोलिक स्थिति के अलावा उनके पड़ोसी राज्यों और वहाँ के लोगों के बारे में पूछता अगर बताने वाला विश्वसनीय होता तो मैं सारी बातें नोट कर लेता। याकूबी की एक विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में कल्पित कथाओं और अपूर्ण कहानियों को कोई स्थान नहीं दिया। वह हज के दिनों में मक्का जाते और वहाँ विभिन्न देशों से आने वाले यात्रियों से उनके देश का हाल पूछते और सारी जानकारी नोट कर लेते। इस प्रकार आपके पास जानकारी का इतना खजाना जमा हो गया कि उसे पुस्तक के रूप में लिख दिया। उस जमाने में हज एक ऐसा अवसर होता था जब पूरी दुनिया से मुसलमान एक स्थान पर एकत्रित
अल मसऊदी एक अनुभवी यात्री भी थे। दुर्भाग्यवश उनका सफ़रनामा नष्ट हो गया फिर भी उनकी पुस्तकों में यात्राओं का संक्षिप्त वर्णन मिलता है।
मसऊदी भूगोल को इतिहास का एक भाग मानते हैं। अत: उनके लेखों में भूगोल के साथ-साथ इतिहास का समावेश भी मिलता है उन्होंने अपनी पुस्तकों में विदेश यात्राओं और जहाजरानी से भी लाभ उठाया।

मसऊदी ने अपने युग के कई भूगोल शास्त्रियों के सिद्धांतों और अवधारणाओं की आलोचना करते हुए भूगोलशास्त्र के विकास में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने मानव व प्राकृतिक भूगोल के क्षेत्र में अपने अनुभव के आधार पर इस तथ्य पर जोर दिया कि जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों और मनुष्य की शरीर रचना और कार्यशैली पर भूगोलिक परिस्थितियों का असर पड़ता है। यह तथ्य उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज़ वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक Evolution of Species में प्रकट किये।

ख़लीफ़ा मामून रशीद के ज़माने में अस्सौतुल मामूनिया के नाम से संसार का मानचित्र तैयार हुआ जो अल मसऊदी के कथन के अनुसार यूनानी खोजकर्ता मारीनूस के मानचित्र से बेहतर था।

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