मौला की नसीहतें

जिसने अपने और अल्लाह के बीच के मुआमलात को ठीक रखा तो अल्लाह , उसके और लोगों के मुआमलात सुलझाए रखेगा और जिस ने अपनी आख़िरत को सँवार लिया तो ख़ुदा उसकी दुनिया भी सँवार देगा और जो खुद अपने आपको हक़ कहने और हक़ पर अमल करने वाला बना ले तो अल्लाह की तरफ़ से उसकी हिफाज़त होती रहेगी।

जो हम अहलेबैत से मुहब्बत करे उसे परेशानियाँ उठाने और जुल्म सहने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

तन्हाईयों में अल्लाह की मुखालिफ़त करने से डरो, क्योंकि जो गवाह है वही हाकिम है।

• सब्र दो तरह का होता है , एक नागवार बातों पर सब्र , दूसरा पसंदीदा बातों पर सब्र। be

ऐ लोगों ! उस अल्लाह से डरो कि अगर तुम कुछ कहो तो वह सुनता है , दिल में छिपाकर रखो तो वह जान लेता है । उस मौत की तरफ़ बढ़ने का सर ओ सामान करो कि जिस से भागे तो वह तुम्हें पा लेगी .

, अगर ठहरे तो तुम्हें गिरफ्त में ले लेगी और अगर तुम उसे भूल भी जाओ तो वह तुम्हें याद रखेगी।

वह गुनाह जिस का तुम्हें रंज हो , अल्लाह के नज़दीक उस नेकी से कहीं अच्छा है जो तुम्हें खुद पसंद बना दे।

. हुकूमत लोगों के लिए आज़माईश का मैदान है।

आँखों का देखना हकीकत में देखना नहीं है, क्योंकि आँखें कभी-कभी गलत बयानी भी कर जाती हैं। मगर अक्ल उस शख्स को कभी फरेब नहीं देती जो उससे नसीहत चाहे।

• इंसान की खुद पसंदी, उसकी अक्ल के दुश्मनों में से एक दुश्मन है।

अगर दुश्मन पर काबू पाओ और वो हार मान ले तो उसे, अल्लाह के नाम पर माफ़ कर दो।

समझने के लिए पूछो, उलझने के लिए ना पूछो, क्योंकि जाहिल जो सीखना चाहता है वह मिस्ल ए आलिम है और आलिम जो उलझना चाहता है वह मिस्ल ए जाहिल है।

बुर्दबारी और सब्र का हमेशा हमेशा का साथ है और यह दोनों बुलंद हिम्मती का नतीजा हैं।

• ज़िल्लत उठाने से बेहतर है,तकलीफ़ उठाओ

अपने इल्म को जल और अपने यकीन को शक ना बनाओ. जब जान लिया तो अमल करो और जब यकीन आ गया तो आगे बढ़ो।

किसी को उसके हक़ से ज़्यादा सराहनाचापलूसी है और हक़ में कमी करना हसद है।

• दुनिया एक दूसरी मंजिल के लिए पैदा की गई है , ना की अपने लिए पैदा की गई है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम से पूछा गया कि अगर किसी शख्स को * घर में छोड़कर दरवाजा बंद कर दिया जाए तो उसकी रोजी किधर से आएगी, आपने फ़रमाया, “जिधर से उसकी मौत आएगी।”

• फख्र व सर बुलन्दी को छोड़ो, तकब्बुर ओ गुरूर को मिटाओ और कब्र को याद रखो।

• जो शख़्स ज़रा सी मुसीबत को बड़ी अहमियत देता है , अल्लाह उसे बड़ी मुसीबतों में मुब्तला कर देता है।

दोस्त उस वक्त तक दोस्त नहीं समझा जा सकता जब तक कि वह अपनी दोस्ती की तीन मौकों पर हिफाज़त ना करे, मुसीबत के मौके पर, उसकी पीठ के पीछे और उसके मरने के बाद।

अल्लाह से कुछ तो डरो, चाहे वो कम ही हो और अपने और अल्लाह के दरमियान कुछ तो पर्दा रखो चाहे वो बारीक ही हो ।

• मैंने अल्लाह को पहचाना, इरादों के टूट जाने, नियतों के बदल जाने और हिम्मतों के पस्त हो जाने से ।

दुनिया की तल्खी , आखिरत की खुशगवारी है और दुनिया की खुशगवारी,आखिरत की तल्खी है।

इरो डरो। इस लिए कि बाखुदा उस अल्लाह ने इस हद तक तुम्हारी पर्दापोशी की है गोया उस ने तुम्हें बख़्श दिया हो ।

• ऐ आदम के बेटे । जब तू देखे कि अल्लाह तुझे लगातार नेमतें अता कर रहा है और तू उसकी नाफरमानी करता जा रहे है तो उस से डरते रहना।

जिसकी जुबान पर कभी ये जुम्ला ना आए कि “मैं नहीं जानता”, तो वह चोट खाने की जगहों पर चोट खाकर ही रहता है।

जो अमल तक़वा के साथ अंजाम दिया जाए वह थोड़ा नहीं समझा जा सकता और मकबूल होने वाला अमल थोड़ा क्यों कर हो सकता है 1

. बहुत से पढ़े लिखों को दीन से बेख़बरी तबाह कर देती है और जो इल्म उन के पास होता है उन्हें ज़रा भी फायदा नहीं पहुँचाता ।

दो ऐसे ख़्वाहिशमंद हैं जो कभी सेर / आसूदा नहीं होते, तालिब ए इल्म और तालिब ए दुनिया।

बहुत से लोग इस वजह से फित्नों में मुब्तला हो जाते हैं कि उनके बारे में अच्छे ख्यालों का इजहार किया जाता है।

• अगर तुम देखो , तो तुम्हें दिखाया जा चुका है और अगर तुम हिदायत हासिल करो तो हिदायत की जा चुकी है।

• ऐ फ़र्ज़न्द ए आदम ! तूने अपनी ज़रूरत से ज्यादा जितना भी कमाया है, उस पर दूसरों का हक है।

• अपनी सोच को पानी के कतरों से भी ज्यादा साफ़ रखो क्योंकि जिस तरह कतरों से दरिया बनता है उसी तरह सोच से ईमान बनता है।

• सदका देकर अपने ईमान की हिफाज़त करो, ज़कात देकर अपने माल की हिफाज़त करो और दुआओं से मुसीबत की लहरों को दूर करो।

• जो शख्स अपनी नफ्स का मुहासिबा करता है, वह फायदा उठाता है और जो गफ़लत बरतता है, वह नुक्सान में रहता है। जो डरता है, वह अजाब से महफूज़ हो जाता है और जो इबरत हासिल करता है, वह बीना हो जाता है। जो बीना होता है, वह बा-फ़हम हो जाता है और जो बा-फहम होता है उसे इल्म हासिल हो जाता है।

. किसी शख्स का तुम्हारे हुस्न-ए-सुलूक पर शुक्र गुजार ना होना, तुम्हें नेकी और भलाई से बद दिल ना बना दे। इस लिए कि कभीकभी तुम्हारी इस भलाई की वह कद्र करेगा जिस ने उससे फायदा भी नहीं उठाया और उस ना-शुक्रे ने जितना तुम्हारा हक़ जाए किया है, उस से कहीं ज़ियादा तुम एक कद-दान की कद्रदानी हासिल कर लोगे और खुदा नेक काम करने वालों को दोस्त रखता है।

यह दुनिया मुँह जोरी करने के बाद फिर हमारी तरफ़ झुकेगी, जिस तरह काटने वाली ऊँटनी अपने बच्चों की तरफ़ झुकती है।

. हर इन्सान के साथ दो फ़रिश्ते होते हैं जो उस की हिफाज़त करते हैं और जब मौत का वक्त आता है तो वह उस के और मौत के बीच से हट जाते हैं और बेशक इंसान की मुकर्रर उमर उस के लिए एक मजबूत सिपर है।

• जयादा खामोशी रौब व हैबत का बाइस होती है और इंसाफ़ से दोस्तों में इजाफा होता है। लुत्फो करम से कद्र ओ मंज़िलत बुलंद होती

है। झुककर मिलने से नेमत तमाम होती है। दूसरों का बोझ बटाने से लाज़िमन सरदारी हासिल होती है और खुश रफ्तारी से कीनावर और दुश्मन भी हार जाता है और सर-फिरे आदमी के मुकाबले में अपने तरफ़दार ज़्यादा हो जाते हैं।

मोमिन के चेहरे पर खुशी, दिल में ग़म होता है। हिम्मत उसकी बुलंद होती है लेकिन दिल में खुद को ज़लील ओ खूवार समझता है। सरबुलंदी को बुरा समझता है, शोहरत से नफ़रत करता है। उस का ग़म और हिम्मत बुलंद होती है। बहुत खामोश और हमेशा कामों में मश्गूल रहता है। शाकिर, साबिर, फिक्रमंद और नर्म तबीयत होता है। किसी के सामने दस्ते तलब बढ़ाने में कंजूसी करता है, रब से माँगने में जल्दी करता है। खुश खुलक होता है। उस का नफ्स पत्थर से ज़्यादा सख़्त होता है। गुलाम से ज़्यादा गुलाम होता है।

लोगों ने पूछा कि जब इतनी तादाद में मखलूक है और रब उन्हें रिज़क देता है तो वो हिसाब क्यों लेगा जबकि मख्लूक उसे देखेगी नहीं?, मौला ने जवाब दिया, “ठीक ऐसे ही, जिस तरह रब, उन्हें रिजूक देता है और वो देखते नहीं”

अगर अल्लाह ने गुनाहों के अजाब से डराया ना होता तब भी, उसकी नेमतों पर शुक्र का तकाजा यह था कि गुनाह ना किए जाएँ।

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