बाग ए फ़दक

बाग ए फ़दक, शिया और सुन्नी के बीच बनी खाई में सबसे बड़ा इख़्तिलाफ़ है। बड़े से बड़े आलिम भी इस मसले पर कहने से बचते हैं। एक ओर, कुछ लोगों को लगता है कि इससे सहाबा राज़िअल्लाह की बेहुर्मती होगी तो वहीं दूसरी ओर, कुछ लोगों को लगता है कि इससे अहलेबैत की बेहुर्मती होगी। बाकि ज्यादातर लोगों को तो पता ही नहीं है कि बाग ए फ़दक क्या है या अहलेबैत और सहाबा किन्हें कहते हैं?

हमने दुनिया कमाने के चक्कर में दुनियावी इल्म तो खूब हासिल किया लेकिन हम, दीन से दूर हो गए. बाग ए फ़दक का मसला अपने आप में बहुत इख्तिलाफ़ समेटे हुए है। सुन्नियों की अपनी दलील हैं, शियाओं की अपनी दलील हैं हालाँकि सबसे पहले तो मैं बात करूँगा, कुरआन की, जब नसारा ने कुरआन की दलीलों को तक झुठला दिया था, तब रब ने पंजतन को आगे कर दिया था, आयते मुबाहला, खुद देख सकते हैं।

मैं तारीख़ और दलीलों से हटकर कहूँ तो भी ये ही कहूँगा कि फ़दक, फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का था। ये कहने के लिए इतना काफी है कि जिसने माँगा था वह रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की बेटी थीं और उससे भी बढ़कर बात ये कि वह जुज़ ए रसूल थीं। अब मैं ये नहीं

मान सकता कि जुज़ ए रसूल से ज़्यादा किसी सहाबा को पता होगा कि हक़ क्या है, क्या नहीं?

अब तारीख़ में जो हो गया, उसे बदला तो नहीं जा सकता लेकिन हक़ कह देने, उसे मान लेने से, कोई छोटा नहीं हो जाता। बेशक, हम सबको ये मानना चाहिए कि फ़दक, फातिमा सल्लललाहु अलैहा का ही था और उन्हें इसके हक़ से दूर रखना, ग़लत था, है और ग़लत ही रहेगा।

आइए, देखते हैं कि फ़दक का मसला दरअसल था क्या, फिरकों से खुद को आजाद करके, इस्लाम की जमीं पर, कुरआन के साए में बैठकर, खुद पढ़िए और सोचिए कि “मसला ए फ़दक” , दरअसल है क्या?

सबसे पहले तो ये बता दूं कि इसे बाग़ ए फ़दक कहा जाता है लेकिन हकीकत में फ़दक एक बड़ा सरसब्जो शादाब इलाके का नाम था जो यहूदियों की मिल्कियत में था। फत्ह ए खैबर के बाद यहूदियों ने इसे पैगम्बर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को दे दिया था।

इस्लाम की शरीयत ये भी कहती है कि अगर कोई माल ए गनीमत, बिना जंग किए, दुश्मन की तरफ़ से मिल जाए तो उस पर सिर्फ नबी का हक़ है यानी दूसरों का उस मामले में दख़ल नहीं। इस बात में किसी को भी इख्तिलाफ़ नहीं है कि ये फ़दक, सिर्फ रसूलुल्लाह का था यानी उनकी जाती मिल्कियत में था।

ये फ़दक भी बड़ा अजीब था, कभी छीना गया तो कभी लौटाया भी गया, कभी फातिमा सलामुल्लाह अलैहा, दरबार से खाली हाथ लौटीं, तो कभी औलाद ए फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को खुद दरबार बुलाकर लौटाया गया।

सबसे पहले तो ये जनाब ए फातिमा सलामुल्लाह अलैहा से छीना गया, कई सालों बाद, उमर बिन अब्दुल अजीज़ ने फ़दक, इमाम बाकिर

को लौटा दिया। इसके बाद ये सादात के पास ही रहा, काफी दिनों बाद यजीद बिन अब्दुल मुल्क बिन मारवान ने इसे फिर छीना, जब अब्बासी हुकूमत का दौर आया तो अहमद सफ्फाह ने खौफ ए खुदा की बुनियाद पर फ़दक, फिर फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की औलादों के हवाले कर दिया।

इसके बाद फिर फ़दक, औलाद ए फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के पास रहा लेकिन मंसूर दवानकी के ज़माने में फिर छीना गया। मंसूर के बेटे मेंहदी अब्बासी ने खौफ ए इलाही की बुनियाद पर, फिर से फ़दक लौटा दिया। इसके बाद जब उसके बेटे हादी ने हुकूमत पाई तो फिर से फ़दक छीन लिया।

जब मामून की हुकूमत का वक्त आया तो उसने बड़े-बड़े आलिमों को इकट्ठा करके बहस करवाई, सबूत देखे और फैसला लिया कि फ़दक, फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का ही है लिहाजा उसने इमाम अली रजा को सौंप दिया।

आख़िरकार, मुतवक्किल ने एक बार फिर, फ़दक को छीना लेकिन फिर कभी दोबारा फ़दक को वापिस नहीं दिया गया।

सोचने वाली बात ये है कि कुछ लोगों का दावा है कि फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का फ़दक पर हक़ ही नहीं था। तो फिर क्यों बार-बार हुकूमत में बैठे लोग खौफ ए खुदा के डर से, फ़दक वापिस लौटाते थे, एक शायर ने फारसी में बड़ा गहरा शेर कहा है

ख़श्त अव्वल चूंनहद मेमार ए कज तासिरयाई रूद ए दीवार एकज

यानी जब मेमार की पहली ईंट ही टेढ़ी रख देता है तो अगर दीवार आसमान तक भी जाए तो टेदी ही रहती है। यानी अगर बुनियाद ही सही

ना रखी हो तो इमारत सही बन ही नहीं सकती।

अब कोई मुझ पर इल्जाम लगाने के पहले ये याद रखे कि सबको अपनी सोच रखने का इतियार है। अगर आप मानते हो कि फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का फ़दक पर हक नहीं था तो भी आप ये याद रखो कि कई हुकूमतों ने बार-बार, फ़दक लौटाया यानी वह भी मानते थे कि फ़दक बिन्ते रसूल का ही है।

फ़दक सिर्फ रसूलुल्लाह की ही मिल्कियत था। जैसा कि मैंने पहले बताया कि चूंकि वह जंग करके नहीं मिला था इसलिए वह रसूलुल्लाह की मिल्कियत था, आप चाहते तो अपने पास रखते और आप चाहते तो बाँट सकते थे। बहरहाल आपने फ़दक, अपने पास ही रखा।

शियाओं की सारी ही किताबों में ये बात मौजूद है लेकिन अहले सुन्नत में भी इब्ने कसीर, इब्ने हष्शाम, हलबी वगैरह ने ये माना है कि फ़दक सिर्फ रसूलुल्लाह की ही मिल्कियत में था।

सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि फ़दक, मिल्कियत ए ज़हरा था या फिर मीरास ए रसूल था?

मीरास वह माल या जायदाद है जो मालिक के दुनिया से जाने के बाद उसके अपनों में तक्सीम हो जाती है और मिल्कियत के मायने, मालिकाना हक़ से है। फ़दक के मामले में अगर देखें तो दोनों ही हालात में फ़दक, फातिमा ज़हरा को ही मिलता।

हमारे अकीदे के मुताबिक, फ़दक, रसूलुल्लाह की मिल्कियत थी लेकिन उन्होंने अपनी हयात में ही इसे, फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को दे दिया था यानी रसूलुल्लाह जब दुनिया में थे तब ही वह मालिकाना हक, फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को दे चुके थे।

कुरआन में जब ये आयत नाज़िल हुई, “जातल कुर्बा हक्कहु वल मिस्कीन व इब्नुल लैल” यानी, “और ऐ पैगम्बर! क़राबतदारों और मिस्कीनों और मुसाफिरों को उनका हक दे दीजिए.”

जब आयत में ये हुक्म आया कि कराबतदारों को उनका हक़ दे दीजिए, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को फ़दक दे दिया।

अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की सदाकत पर किसी को शक नहीं है और ना ही होना चाहिए क्योंकि अगर जुज़ ए रसूल की सच्चाई पर ही शक है तो मतलब आप फिलहाल मुहम्मदुर्-रसूलउल्लाह तक ही नहीं पहुंचे हैं।

कुरआन की आयत ए ततहीर इस बात की गवाह है कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम हर ऐब ओ बुराई से पाक हैं यानी ना आप झूठ बोलते हैं, ना ही कोई नाहक़ बात, ना ही आप में किसी तरह का लालच है और ना दुनिया को पाने कि ख़्वाहिश।

जाहिर-सी बात है कि जिसके सदके में दुनिया बनी हो वह दुनिया से कुछ नहीं चाहेगा। अगर आप हदीसें भी उठाकर देखेंगे तो फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की फजीलतें इतनी मिलेंगी कि खुद रसूलुल्लाह भी आपको आता देखकर, आप सलामुल्लाह अलैहा की ताजीम और मुहब्बत में खड़े हो जाया करते थे। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, आपको उम्मे अबीहा कहा करते थे। ये कम है क्या?

बीबी, बार-बार दरबार में फ़दक माँगने जाती रही लेकिन आपको नहीं मिला। जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ कि इसमें भी बहुत गहरा राज छिपा है, जो बहुत कम लोगों को समझ आएगा।

ये कह देना आसान है कि फ़दक फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का नहीं था लेकिन हकीकत में आप फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने कुरआन की दलीलों से साबित करके अपना हक़ वापिस माँगा था, वह फ़दक जिसे रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के दुनिया से जाते ही के साथ मुसलमानों ने, आपकी बेटी से छीनकर, अपने कब्जे में कर लिया था।

आपको ये जानकर भी ताज्जुब होगा कि इल्म ए शहर की बेटी और इल्म के दरवाज़े की जौजा ने, दो मुकदमे दर्ज करके अपना हक़ वापिस माँगा था। जी हाँ एक मुकदमा खारिज़ होने पर भी आपने अपने इल्म से दूसरा मुकदमा दायर किया लेकिन अफसोस दूसरा भी खारिज कर दिया गया।

मुझे आज तक ये ही समझ में नहीं आया कि अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा, दरबार में कुछ माँगने गईं थीं या फिर हमारे लिए कुछ सबक और तारीख़ छोड़ने के लिए दरबार गईं थीं क्योंकि मैंने जितनी बार भी फ़दक के मसले को सोचा, मुझे कुछ ना कुछ सीख ज़रूर मिली और तारीख़ भी खुलकर सामने आई।

जब अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा, दरबार में आईं और अपना हक़ तलब किया तो हज़रत अबु बक़र रज़िअल्लाह ने कहा कि ये रसूलुल्लाह की मिल्कियत में है लिहाजा ये उम्मत का होगा।

_फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने कुरआन की आयत पढ़कर, दोबारा सवाल किया कि अल्लाह ने जब फरमाया, “ऐ रसूल! अपने कराबतदारों को उनका हक़ दे दीजिए.” , तब ये फ़दक मुझे, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने दे दिया था।

जवाब में हज़रत अबु बक़र रजिअल्लाह ने हदीस बयान करके फरमाया कि “मैंने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को ये कहते हुए सुना कि हम गिरोहे अम्बिया ना वारिस होते हैं, ना ही वारिस बनाते

फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने इसे हदीस मानने से इंकार करते हुए ये कहा कि मेरे बाबा सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, कुरआन के खिलाफ़ एक बात भी नहीं बोल सकते। इसके बाद आपने कुरआन से ही कई आयतें पढ़ीं जो साबित करती हैं कि अंबिया के वारिस होते हैं।

यहाँ दो-चार बातें बड़ी ताज्जुब वाली हैं, पहली तो ये कि रसूलुल्लाह ने अपने घरवालों को ये नहीं बताया कि उनके घरवाले उनके वारिस नहीं बल्कि एक सहाबा रज़िअल्लाह को बताकर गए, क्या ऐसा हो सकता है?

दूसरी बात ये कि इस हदीस को भी चुपचाप से एक सहाबा को बताया, सारे सहाबियों के सामने इतनी बड़ी बात बताना ज़रूरी नहीं समझा?

तीसरी सबसे ज़रूरी बात ये कि अगर कोई हदीस पेश करे और सामने वाला कुरआन की आयत, अगर हदीस, कुरआन की आयत पर सही नहीं बैठती तो उसे रद्द कर दिया जाता है यानी जाली हदीस मान लिया जाता है।

और चौथी बात ये कि कुरआन में वाकई में अम्बियों के वारिस पर आयतें आई हैं, अगर आपने कुरआन पढ़ा है तो आप समझ रहे होंगे।

अगर फ़दक फातिमा सलामुल्लाह अलैहा का ना होता तो आप कभी फ़दक माँगने दरबार या मस्जिद नहीं जाती। आपका दरबार में जाना ही मेरे ये मानने के लिए काफी है कि फ़दक पर सिर्फ आपका हक़ था। जाहिर-सी बात है कि आप जैसी पाक़ खातून, अपने शौहर से इजाज़त लिए बगैर नहीं जाएगी, आपको मौला अली अलैहिस्सलाम ने नहीं रोका ये दूसरी दलील है कि आप ही हक़ पर थीं।

आप बार-बार हक़ माँगने आती रहीं, आप कुरआन की आयतें सुनाकर हक़ तलब करती रहीं बदले में आपको वही एक हदीस बयान की जाती रही।

एक रोज़ जब आप अपना हक़ माँग रहीं थीं तो ख़लीफा अबुबकर रजिअल्लाह ने फरमाया कि मैंने रसूलुल्लाह को ये कहते हुए सुना था कि, “जहरा सिर्फ मेरी जिन्दगी में ही फ़दक तसरूफ़ करेंगी, लेकिन मेरे बाद ये मुसलमानों का हो जाएगा।”

ताज्जुब की बात है कि ऐसी अजीब ओ गरीब-सी वसीयत कैसे की गई और अफ़सोस को बात ये है कि ये भी रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने तसर्रुफ़ करने वाली या उसके शौहर से ना कहकर, हज़रत अबुबकर रज़िअल्लाह से कही।

मैंने पूरी तारीख़ पढ़कर देखी लेकिन मुझे ऐसा कहीं नहीं मिला कि हज़रत अबु बकर रज़िअल्लाह ने किसी और को पेश करके कहा हो या कोई खुदसे निकलकर सामने आया हो और ये दावा किया हो कि हाँ मैंने भी रसूलुल्लाह को ऐसा कहते सुना है।

अगर ऐसी कोई बात होती तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम अपनी बेटी से साफ़ कहते कि मैं ये कुछ वक्त के लिए आपको दे रहा हूँ, यूँ ना कहते कि यह फ़दक तुम्हारी मिल्कियत है।

“कालन नबी बा फातेमता लका फ़दक” , ताज्जुब है कि रसूलुल्लाह ने अपनी बेटी से “लका फ़दक” बस कहा। अगर सिर्फ अपनी हयात तक के लिए देते तो आप आगे, “एला फी हयाती”, ज़रूर जोड़ देते।

जब हज़रत अबुबकर रज़िअल्लाह ने कहा कि अम्बिया के वारिस नहीं होते तब हज़रत अली, इमाम हसन, इमाम हुसैन, उम्मे ऐमन, असमा और इब्ने अब्बास ने, मस्जिद आकर गवाही दी कि हमारी

मौजूदगी में रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फ़दक, फातिमा ज़हरा को दिया लेकिन एक बार फिर अफ़सोस कि इनकी गवाही भी कुबूल ना हुईं।

सबसे पहली बात तो ये कि अल्लाह के रसूल, ऐसी ज़रूरी बातें, किसी एक शख्स को नहीं कहते बल्कि आपकी हिदायतें और हदीसें तो सबके लिए होती हैं। फिर जमीन और वारिस का मसला, सिर्फ सोचने वाली बात ये है कि इतने बड़े मसले सिर्फ एक सहाबा रजिअल्लाह को ही क्यों बताएँगे?

अगर अंबिया के वारिस नहीं होते तो क्या अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा, झूठा दावा करती थीं, ‘मआज़ अल्लाह’ रसूलुल्लाह का जुज़ झूठा नहीं हो सकता भले ही सारी दुनिया भी मुकाबिल में आकर उन्हें ग़लत कह दे।

हज़रत अली, जिनकी गवाही हजारों कि गवाही से अफ्ज़ल थी, उस गवाही को ये कहकर रद्द कर दिया कि अगर फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को ज़मीन मिलती है तो अली का भी फायदा है।

जनाबे असमा की गवाही रद्द कर दी और उम्मे ऐमन जो उम्मेहातुल मोमिनीन हैं, जिनकी गवाही को रसूलुल्लाह ने दो के बराबर बताया था, उसे भी रद्द कर दिया गया। क्या शान है मेरे आका कि आप रसूलुल्लाह ने उम्मे ऐमन की गवाही को पहले हीदो के बराबर बता दिया, आपको ख़बर होगी आगे क्या कुछ होने वाला है।

हसनैन अलैहिस्सलाम की गवाहियाँ, बच्चा कहकर कुबूल नहीं की हालाँकि रसूलुल्लाह ने तो बचपने में ही उन्हें जन्नत की सरदारी मिलने की खुशखबरी दे दी थी।

इस सब से हटकर, मुझे तो ये ही बात चुभती है कि कोई भी शखस, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की बेटी से गवाह लाने की कैसे कह सकता है?

मेरे हिसाब से तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की बेटी से गवाह लाने की कहना भी एक बड़ी गलती थी। ताज्जुब होता है कभीकभी कि अब लोगों को ये बोलने में भी सोचना पड़ता है कि फातिमा सलामुल्लाह अलैहा एक पल के लिए भी हक़ से दूर नहीं हो सकी क्योंकि वह जुज़ ए रसूल हैं।

बाकि अगर फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को फ़दक मिलने से अली अलैहिस्सलाम को फायदा होता, तो ये भी हक़ है कि फ़दक, खलीफा के पास रहने से ख़लीफा को फायदा होता लेकिन ना कोई ये कहने वाला था और नाख़लीफा से गवाह लाने की किसी ने तलब ही की।

रिवायतों में ये भी मिलता है कि जब फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के गवाहों को झुठला दिया गया तो आप ततहीरा बतूल ने दूसरा मुकदमा किया और एक बेटी की हैसियत से बाप की जाँगीर में हिस्सा माँगा, सुन्नियों की रिवायत में ये भी मिलता है कि हज़रत अबु बकर राज़िअल्लाह से जब ये कहा गया कि आपकी विरासत में तो आपकी बेटी को हिस्सा है पर रसूल की बेटी को उनके बाप की जाँगीर में कोई हिस्सा नहीं तो आपने फ़दक, बीबी के नाम लिख दिया जिसे बाद में हज़रत उमर राज़िअल्लाह ने फाड़ दिया।

हालाँकि मुझे इस हदीस पर उतना यकीन नहीं लेकिन तारीख़ और हदीस उठाकर देखो तो ये एहसास ज़रूर होता है कि चाहे जानबूझकर किया गया हो, अनजाने में किया गया हो, किसी के बहकावे में किया गया हो या दुनिया की गिरफ्त में आकर किया हो लेकिन अहलेबैत अलैहिस्सलाम के साथ हर दौर में ग़लत ज़रूर हुआ है।

शायद लड़ाई और इखख्तिलाफ़ की एक बड़ी वजह ये भी है कि एक तबका तो ये तक साबित करने की कोशिश करता है कि अहलेबैत पर जुल्म हुआ ही नहीं है। कुछ तारीखों में मैंने खुद पढ़कर देखा है, यजीद को इतना नेक बताने की कोशिश की जाती है, जिसकी हद नहीं।

यजीद का जिक्र इसलिए करता हूँ क्योंकि जिस तारीख़ ने इब्ने अली को कत्ल करवाने वाले को नेक लिखा हो, उससे कितनी सच्ची तारीख की उम्मीद की जा सकती है?

भी आज के दौर में चारों तरफ़ से फित्ने भी बढ़ रहे हैं और दुश्मन हमारे खिलाफ़ साजिश रच रहे हैं, आपस में लड़ने-भिड़ने से बेहतर है कि हम एक दूसरे को समझने की कोशिश करते रहें और हक़ को हक़ कहना सीखें।

फातिमा सलामुल्लाह अलैहा यानी रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की प्यारी बेटी। जिन्हें रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम उम्मे अबीहा कहा करते थे। आप रसूलों के सरदार की बेटी हैं। हमारे अकीदे के मुताबिक, आप फातिमा सलामुल्लाह अलैहा, बाद ए रसूल, सबसे अफ्ज़ल हैं। आप बतूल हैं, पाक़ हैं, ततहीरा हैं और नेक खातून हैं।

आप जन्नत की औरतों की सरदार हैं और आपके लिए रसूलुल्लाह ने फरमाया कि खुदा उससे राजी है, जिससे फातिमा राजी हो। रसूलुल्लाह सबसे ज्यादा मुहब्बत अपनी बेटी से किया करते थे और आपके बेटों को अपना बेटा कहा करते थे। आपके दोनों बेटे, जन्नत के जवानों के सरदार हैं।

जब रसूलुल्लाह ने आपका निकाह किया तो, अली से किया यानी आपके शौहर वलियों के सरदार हैं। आप कुल्ले ईमान के निस्फ़ ईमान की मालकिन हैं। आपके मर्तबे और बुलंदी का अंदाजा लगा पाना, ना मुमकिन है।

आप फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की शान में मैंने कुछ लिखने की कोशिश की थी। आप सबके सामने रख रहा हूँ।

दो रकात की नमाज़ में शब सारी गुजार दी ऐसा भी रब से इश्क करती हैं फातिमा । जन्नत से जिसके वास्ते, रब ने भेजा है जोड़ा हुस्न ओ जमाल , पर्दगी में पाक फातिमा । उम्मत के लिए रहमत बन के आए मेरे नबी नबी के घर की रहमत बनके आईं फातिमा । अली कुल ए ईमान , शुजाअत के फर्द हैं तू उनकी मोहब्बत, निफ्स ए ईमान फातिमा । जन्नत के जवाँ सरदार हसन हैं और हुसैन कदमों में उनकी जन्नत रखती है फातिमा। वो खुश्क हवाओं में भी मुरझाते नहीं कभी सब फूल हैं गुलशन के तू है बाग फातिमा । ख्वाजा की नज़र में हक “हुसैन” दीन हैं हैराँ की तूने दीन को पाला है फातिमा।

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